मन, आत्मा और परमात्मा के मिलन की दिव्य यात्रा
मुक्ता माथुर. जोधपुर
योग केवल शरीर की क्रियाओं तक सीमित कोई साधना नहीं, बल्कि यह आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का वह सेतु है जिसके द्वारा साधक स्वयं में स्थित ईश्वर को अनुभव कर सकता है। योग का वास्तविक उद्देश्य ‘अद्वैत अवस्था’ तक पहुँचना है — जहाँ मनुष्य आत्मा और परमात्मा के भेद को समाप्त कर देता है।
भगवान श्रीकृष्ण, जिन्हें योगेश्वर कहा जाता है, स्वयं योग के मूर्तिमान स्वरूप हैं। भगवद गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन के परम रहस्य बताते हुए योग के विविध स्वरूपों का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि “सभी नाम और रूप से परे आत्मा की सर्वोच्च सत्ता की प्राप्ति ही योग है।”
आत्मा का स्वरूप
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है –
“ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख रासी।”
अर्थात — प्रत्येक जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है। आत्मा अमर, अविनाशी और शुद्ध चेतना है। शरीर तो परिवर्तनशील है, पर आत्मा सनातन है। यही आत्मा जब अपनी दिव्यता को पहचान लेती है, तो योग से योगेश्वर तक का सफर पूर्ण होता है।
योग क्या है?
श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा:
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
(अर्थात — कुशलता से कर्म करना ही योग है।)
योग केवल आसनों या प्राणायाम तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संतुलन बनाए रखना, मन को शुद्ध करना, इन्द्रियों पर नियंत्रण स्थापित कर भक्ति के साथ ईश्वर से जुड़ना ही वास्तविक योग है।
योग की यात्रा के पड़ाव
1️⃣ ज्ञान योग
ज्ञान योग का आधार शुद्ध अंतःकरण है। वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों और धर्म ग्रंथों के अध्ययन से प्राप्त होने वाला ईश्वरीय ज्ञान ही साधक को उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचाता है।
“वह जानता है कि मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ।”
2️⃣ कर्म योग
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा –
“समत्वं योग उच्यते।”
(सुख-दुख, हानि-लाभ, जय-पराजय सभी को समभाव से स्वीकार करना ही योग है।)
कर्म योग का सार है — निष्काम कर्म। किसी भी फल की अपेक्षा किए बिना अपने कर्तव्यों का पालन करना।
3️⃣ भक्ति योग
भक्ति योग में साधक पूर्ण समर्पण के साथ भगवान के चरणों में अपने को अर्पित कर देता है। निष्काम प्रेम ही भक्ति का स्वरूप है। श्रीकृष्ण ने कहा —
“भजते मां समत्वेन भक्त्या स युक्ततमः मतः।”
(सभी योगों में जो भक्ति से मेरे में लीन रहता है, वही श्रेष्ठ योगी है।)
4️⃣ राज योग (अष्टांग योग)
पतंजलि के योगदर्शन में आठ अंगों वाला योग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि — साधक को अंततः समाधि तक ले जाता है।
जब मन पूर्ण रूप से शांत और स्थिर हो जाता है तो साधक ईश्वर के साथ एकाकार हो जाता है।
ध्यान और समाधि
ध्यान, मन को एकाग्र कर परमात्मा के स्वरूप में स्थिर कर देता है। यह अवस्था अत्यंत दिव्य होती है — जहां साधक और ईश्वर के बीच का भेद समाप्त हो जाता है।
योग से योगेश्वर तक का वास्तविक अर्थ
योग से योगेश्वर तक की यात्रा केवल एक शारीरिक साधना नहीं, यह आंतरिक जागरण की वह यात्रा है जिसमें साधक “मैं” के बंधन से मुक्त होकर “तू ही तू” के अनंत स्वरूप में विलीन हो जाता है।
जब एक योगी अहंकार, वासना, और ममता जैसे बंधनों से मुक्त होकर प्रेम, करुणा और समर्पण से पूर्ण हो जाता है, तभी वह योगेश्वर के साक्षात्कार में सक्षम होता है।
निष्कर्ष:
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार सच्चा योग वही है जिसमें –
ज्ञान हो — आत्मा का स्वरूप समझने का।
कर्म हो — निष्काम भाव से, बिना फल की कामना के।
भक्ति हो — ईश्वर के प्रति पूर्ण प्रेम और समर्पण भाव से।
ध्यान हो — मन को ईश्वर में स्थिर करने का।
योग से योगेश्वर तक की यह यात्रा वास्तव में ‘स्व’ से ‘परम’ की यात्रा है।









