सरकार की ये नीतियां रही हैं कि रिटायर अफसरों को विभिन्न विभागों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनकी काबलियत देखकर सौंपती है और वाहवाही लूट लेती है, मगर बाद में सरकार उन्हें अपने डंडे से हांकती है। यही हाल पूर्व डीजीपी एमएल लाठर को लेकर हुआ, उन्हें सूचना आयुक्त से प्रमोशन देकर भजनलाल सरकार ने प्रमुख सूचना आयुक्त बना दिया, लेकिन परिणाम उत्साहजनक सामने नहीं आए, जोधपुर के एक प्रमुख आरटीआई कार्यकर्ता ने तो यहां तक कह दिया कि सूचना के अधिकार की हत्या हो गई है और अब उन्होंने आरटीआई लगाना ही बंद कर दिया है…
डीके पुरोहित. जोधपुर
राजस्थान में सूचना का अधिकार (RTI) कानून, जिसे पारदर्शिता और जवाबदेही का सबसे बड़ा उपकरण माना गया है, आज स्वयं ही अंधेरे में भटकता प्रतीत हो रहा है। राज्य सूचना आयोग में 400 से अधिक मामले लंबित होने के बावजूद, मुख्य सूचना आयुक्त एम.एल. लाठर की कार्यशैली को लेकर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
कांग्रेस की नियुक्ति, भाजपा की पुष्टि
पूर्व डीजीपी एम.एल. लाठर को कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार ने 13 जनवरी 2023 को सूचना आयुक्त नियुक्त किया था। यह निर्णय तब भी राजनीतिक चश्मे से देखा गया, जब सेवानिवृत्ति के कुछ ही समय बाद उन्हें एक संवैधानिक पद सौंप दिया गया।
परंतु इस नियुक्ति को वास्तविक स्वीकृति उस समय मिली जब भाजपा की भजनलाल शर्मा सरकार ने उन्हें जुलाई 2024 को राज्य का मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्त कर दिया। तब भाजपा सरकार ने इसे “प्रशासनिक अनुभव को उपयोग में लाने की नीति” बताया था, लेकिन एक वर्ष के भीतर ही यह निर्णय उलटा पड़ता दिख रहा है।
नियुक्ति का मकसद: पारदर्शिता की मजबूती
जब लाठर को मुख्य सूचना आयुक्त की जिम्मेदारी सौंपी गई, तब राज्य सूचना आयोग पर 400 से अधिक RTI अपीलें और शिकायतें लंबित थीं। आयोग की क्षमता, गति और पारदर्शिता को सुधारना, नागरिकों को समय पर जानकारी दिलाना और सूचना प्रणाली को डिजिटल व सरल बनाना—ये सब प्रमुख अपेक्षाएं थीं।
सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया था कि लाठर के नेतृत्व में आयोग को “क्लियरेंस मिशन मोड” में कार्य करना है। लेकिन एक वर्ष बाद भी मामलों की संख्या में कोई महत्वपूर्ण गिरावट नहीं आई है।
लाठर की निष्क्रियता पर उठे सवाल
स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार:
- लाठर ने अपने कार्यकाल में बहुत सीमित जनसुनवाई की हैं।
- कई RTI अपीलें महीनों से बिना सूचीबद्ध हुए पड़ी हैं।
- केस निस्तारण की मासिक दर औसत से भी कम है।
- आयोग की वेबसाइट पर अपडेट रुक-रुक कर होते हैं और कई मामलों में सुनवाई की तिथि भी समय पर नहीं डाली जाती।
RTI कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज के संगठनों का आरोप है कि आयोग अब “न्याय का प्रतीक” न रहकर “अस्थायी ठहराव का स्थल” बन चुका है।
पारदर्शिता को लग रही है चोट
सूचना का अधिकार अधिनियम का मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता को सुनिश्चित करना है। जब एक सूचना आयुक्त — विशेषकर एक पूर्व पुलिस अधिकारी — इस जिम्मेदारी को निभाने में असफल होता है, तो यह केवल प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी कुठाराघात माना जाता है।
RTI कार्यकर्ता नंदलाल व्यास कहते हैं: आरटीआई एक्ट की हत्या हो गई है
“हमने उम्मीद की थी कि एक वरिष्ठ अफसर पारदर्शिता को बल देगा। लेकिन आरटीआई एक्ट की हत्या हो गई है। आज से दस साल पहले अफसरों में सूचना के अधिकार का जो डर था वो खत्म हो गया है। ।”
सरकार की चुप्पी भी सवालों के घेरे में
भाजपा सरकार, जिसने लाठर की नियुक्ति को उचित ठहराते हुए पारदर्शिता की बात की थी, आज उनकी निष्क्रियता पर मौन है। कोई समीक्षा बैठक नहीं हुई, न ही आयोग के प्रदर्शन पर कोई सार्वजनिक रिपोर्ट आई है।
यदि यही स्थिति रही तो RTI जैसा ऐतिहासिक कानून केवल “कागजी अधिकार” बनकर रह जाएगा।
विश्लेषण बॉक्स:
| बिंदु | स्थिति |
|---|---|
| लंबित मामले (जुलाई 2024 में) | 400+ |
| वर्तमान लंबित मामले (अनुमानित) | 500+ |
| मासिक निस्तारण औसत | 12-15 मामले |
| तय लक्ष्य | 40+ मामले/माह |
| सुनवाई में पारदर्शिता | कम |
| वेबसाइट पर सूचना अद्यतन | अनियमित |
निष्कर्ष
पूर्व डीजीपी एम.एल. लाठर की नियुक्ति के पीछे राजनीतिक संतुलन साधने की भावना स्पष्ट थी। लेकिन जब प्रशासनिक दक्षता और जवाबदेही की परीक्षा आई, तो वे उस कसौटी पर खरे नहीं उतर सके। यह न केवल RTI कानून की आत्मा के साथ विश्वासघात है, बल्कि सरकार की पारदर्शिता के वादों पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
राज्य सरकार को अब यह तय करना होगा कि वह सूचना आयोग को निष्क्रिय बनाए रखेगी या फिर वहां कर्तव्यनिष्ठ, स्वतंत्र और जवाबदेह नेतृत्व लाकर लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करेगी।




