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योग-क्षेम की राह पर चलकर योगेश्वर की प्राप्ति संभव

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को लेकर राइजिंग भास्कर रोज एक आलेख प्रकाशित कर रहा है. आज पढ़िए डी के पुरोहित का विशेष आलेख

डी के पुरोहित. जोधपुर

मनुष्य का जीवन अनंत संभावनाओं का संगम है, परंतु इन संभावनाओं की पूर्णता केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं होती। जीवन की अंतिम सार्थकता उस परम तत्व की प्राप्ति में निहित है जिसे हम “योगेश्वर” कहते हैं — वह परमेश्वर, जो योग का अधिपति है, जो जीवन की संपूर्ण गति और रहस्य को जानता है। योग-क्षेम की धारणा भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त एक दिव्य सिद्धांत है, जो बताती है कि यदि हम परमात्मा पर निष्ठा रखते हैं और अपने धर्म, कर्तव्य और योग की साधना में लगे रहते हैं, तो जीवन में आवश्यक वस्तुएँ स्वयं प्राप्त होती हैं। यही मार्ग हमें अंततः योगेश्वर की प्राप्ति की ओर ले जाता है।

योग-क्षेम का अर्थ और भगवद्गीता में उल्लेख

भगवद्गीता के 9वें अध्याय के 22वें श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं:

“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”

अर्थात् — “जो मनुष्य निरंतर मेरा चिन्तन करते हैं और मुझमें एकनिष्ठ भाव से लगे रहते हैं, उनके योग (जो उनके पास नहीं है उसे प्राप्त करना) और क्षेम (जो उनके पास है उसकी रक्षा करना) का भार मैं स्वयं वहन करता हूँ।”

यह श्लोक भक्त और भगवान के बीच संबंध की गहराई को दर्शाता है। जब मनुष्य अपने हृदय, कर्म और विचार से ईश्वर में लीन हो जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और उसे मार्गदर्शन देते हैं।

योग क्या है?

“योग” केवल आसनों या शारीरिक कसरत तक सीमित नहीं है। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का माध्यम है। पतंजलि योगसूत्र के अनुसार:

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः”
अर्थात् — चित्त की वृत्तियों का निरोध करना ही योग है।

योग एक ऐसी अवस्था है जहाँ मन स्थिर, शांत और परम सत्ता से एकाकार होता है। यह केवल शांति नहीं, अपितु समत्व, समर्पण, सत्य और साधना का मार्ग है।

क्षेम क्या है?

“क्षेम” का अर्थ है – जो उपलब्ध है उसकी सुरक्षा, उसका संरक्षण और उसे बनाए रखना। यह आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन के भौतिक व आध्यात्मिक संसाधनों की रक्षा की प्रक्रिया है।

योग और क्षेम मिलकर एक ऐसे जीवन-पथ की ओर इशारा करते हैं जहाँ मनुष्य ईश्वर में लीन होकर कर्म करता है, और उसका जीवन चिंता, भय और मोह से मुक्त होता है।

योग-क्षेम की राह: आत्मा से परमात्मा की यात्रा

1. श्रद्धा और भक्ति का आरंभ
योग-क्षेम की राह श्रद्धा और भक्ति से आरंभ होती है। जब व्यक्ति अपने भीतर की आवाज़ सुनता है और उसे अनुभव होता है कि जीवन केवल भोग नहीं, साधना का अवसर है, तभी उसकी यात्रा शुरू होती है।

2. कर्मयोग – निष्काम कर्म की साधना
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा –

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
मनुष्य को केवल अपने कर्म पर अधिकार है, फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ देनी चाहिए।

3. ज्ञानयोग – आत्मबोध की ओर

जब हम सत्संग, स्वाध्याय और चिंतन के माध्यम से अपने भीतर की चेतना से जुड़ते हैं, तो धीरे-धीरे आत्मा का ज्ञान प्रकट होता है। यही ज्ञानयोग है जो योगेश्वर की ओर अग्रसर करता है।

4. भक्तियोग – प्रेम और समर्पण का मार्ग
अनन्य भक्ति, जहां साधक और ईश्वर के बीच कोई पर्दा नहीं होता, वह स्थिति ही “भक्तियोग” है। यही वह मार्ग है जिस पर चलते हुए ईश्वर स्वयं योगक्षेम का वहन करते हैं।

व्यवहारिक जीवन में योग-क्षेम का महत्व

1. आध्यात्मिक विश्वास की शक्ति
जो व्यक्ति अनन्य भाव से ईश्वर में विश्वास करता है, उसे जीवन में अद्भुत संतुलन मिलता है। वह जानता है कि जो कुछ आवश्यक है, वह समय पर मिलेगा — चिंता करना व्यर्थ है।

2. सकारात्मक जीवन दृष्टिकोण
योग-क्षेम की अवधारणा एक मानसिक स्वास्थ्य की संजीवनी है। व्यक्ति आशावादी, सहनशील और प्रेरणादायक बनता है।

3. निर्भयता और आत्मबल
जब ईश्वर पर पूर्ण विश्वास होता है कि “वह हमारे योग-क्षेम का वहन कर रहे हैं”, तब भय, चिंता और असुरक्षा समाप्त होती है।

4. विरक्ति और संतोष
मनुष्य अपने भोगों को परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देता है। धीरे-धीरे संतोष की स्थिति उत्पन्न होती है जो योगेश्वर की प्राप्ति की भूमि तैयार करती है।

समाज में योग-क्षेम की अवधारणा का प्रभाव

जब एक व्यक्ति योग-क्षेम की राह पर चलता है, तब वह न केवल स्वयं के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक आदर्श बनता है। ऐसा व्यक्ति स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा, करुणा और सहयोग का जीवन जीता है।

1. नशा, भ्रष्टाचार और लालच से मुक्ति
ईश्वर पर विश्वास और साधना का मार्ग मनुष्य को लालच, भोग और भ्रष्टाचार से दूर करता है।

2. कर्मशील समाज की स्थापना
जब हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन ईश्वर के लिए करता है, तब समाज में नैतिकता और दायित्व की भावना प्रबल होती है।

3. धार्मिक सहिष्णुता और एकता
योग-क्षेम की राह धर्म के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करती है — जहाँ न कोई जाति, न मजहब, केवल आत्मा और परमात्मा का संबंध होता है।

योगेश्वर की प्राप्ति: अंतिम लक्ष्य

योग-क्षेम की राह का अंतिम फल “योगेश्वर” की प्राप्ति है। यह केवल सैद्धांतिक या दार्शनिक बात नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है।

योगेश्वर की प्राप्ति का अर्थ है:

जीवन के परम उद्देश्य को जानना।

मृत्यु के भय से मुक्ति।

संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर उठ जाना।

अंतर्मन में निरंतर शांति और आनंद की स्थिति।

आध्यात्मिक महापुरुषों के उदाहरण

1. श्री रामकृष्ण परमहंस – उन्होंने भक्ति और योग के माध्यम से ईश्वर को साक्षात अनुभव किया और अपने शिष्य विवेकानंद को योगेश्वर के दर्शन कराए।

2. संत तुकाराम – वे कहते थे, “विठ्ठल मेरे घर का सदस्य है, उसके भरोसे मेरा सारा कार्य चलता है।” यह योग-क्षेम की साक्षात स्थिति थी।

3. महर्षि अरविंद – उनका जीवन इस सिद्धांत का उदाहरण है कि योग, कर्म और भक्ति से योगेश्वर को पाया जा सकता है।

कुछ प्रेरणात्मक पंक्तियाँ (बॉक्स)

“जहाँ विश्वास है, वहाँ भय नहीं। जहाँ योग है, वहाँ क्षेम है। जहाँ क्षेम है, वहाँ परमात्मा है।”

“ईश्वर पर समर्पण करो, और शेष उसका कार्य है।”

“न चिंता, न द्वंद्व – केवल एकत्व, यही है योग-क्षेम की अनुभूति।”

जीवन की भागदौड़, अपेक्षाएँ और इच्छाएँ अक्सर मनुष्य को भ्रमित कर देती हैं। वह भूल जाता है कि जो कुछ आवश्यक है, वह ईश्वर प्रदान कर सकता है — यदि हम अपने हृदय से उनकी ओर बढ़ें। “योग-क्षेम की राह पर चलना” केवल एक आध्यात्मिक सिद्धांत नहीं, अपितु एक पूर्ण जीवन दर्शन है।

ईश्वर कहते हैं — “जो मेरी ओर निष्ठा से आता है, मैं उसका योगक्षेम वहन करता हूँ।” यही वह दिव्य वचन है जो हमें आत्मविश्वास, शांति और अंततः योगेश्वर की प्राप्ति की ओर ले जाता है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor