उड़ान भरने से पहले रेजिडेंट डॉक्टर की मौत कई सवाल छोड़ गई. बेरहम सिस्टम में क्या राकेश को न्याय मिलेगा?..
डी के पुरोहित. जोधपुर
“डॉक्टर जीवन देता है, लेकिन जब वही डॉक्टर अपने जीवन को समाप्त कर ले, तो यह समाज और व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय बन जाता है।”
डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज, जोधपुर के रेजिडेंट डॉक्टर राकेश विश्नोई की आत्महत्या ने न केवल चिकित्सा जगत को झकझोर दिया है, बल्कि यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या संस्थागत दमन और उपेक्षा इतनी गहरी है कि एक युवा डॉक्टर को जीवन समाप्त करने के लिए विवश होना पड़े?
यह मामला केवल एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक ऐसी त्रासदी है जिसमें सिस्टम, पदाधिकारी, प्रशासन और पुलिस सभी कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं। न्याय की आस में तड़पते परिजन, सड़कों पर आक्रोशित डॉक्टर, और दूसरी ओर दबाने की कोशिशें – यह सब एक सच्चे न्याय की मांग करता है।
घटना की पृष्ठभूमि
रेजिडेंट डॉक्टर राकेश विश्नोई, जोधपुर के एसएन मेडिकल कॉलेज में अपनी सेवा दे रहे थे। एक मेहनती, ईमानदार और संवेदनशील युवा डॉक्टर, जिसकी उम्र अभी उड़ान भरने की थी, ने हाल ही में आत्महत्या कर ली। राकेश ने इलाज के दौरान बयान भी दिया. परिजनों का आरोप हैं कि संस्थान के अतिरिक्त प्राचार्य डॉ. राजकुमार राठौड़ की कार्यशैली और मानसिक उत्पीड़न की वजह से राकेश ने ख़ुदकुशी की.
उनकी मृत्यु के बाद परिजनों ने आरोप लगाया है कि राकेश को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था, और उन्हें बार-बार अपमानित किया जाता था। यह सिर्फ व्यक्तिगत अवसाद का मामला नहीं, बल्कि एक डॉक्टर को व्यवस्था द्वारा मारा जाना प्रतीत हो रहा है।
परिजनों का दर्द
मृतक के परिजनों का साफ साफ कहना है कि
“राकेश हमारे घर का सपना था। उसने डॉक्टर बनने तक का सफर संघर्ष से तय किया। लेकिन जिस संस्था में वह सेवा कर रहा था, वहीं उसे तोड़ दिया गया।“
परिजनों की मांग है कि अतिरिक्त प्राचार्य डॉ. राजकुमार राठौड़ के खिलाफ तुरंत आपराधिक मामला दर्ज हो और न्यायिक जांच हो। वे स्पष्ट कहते हैं –
“राकेश ने अंतिम बयान में जिनका नाम लिया है, वह उसके कातिल हैं। अब अगर सरकार और पुलिस भी आंख मूंद लेगी, तो आम आदमी कहां जाएगा?“
रेजिडेंट डॉक्टरों का आंदोलन
एसएन मेडिकल कॉलेज के रेजिडेंट डॉक्टरों ने इस आत्महत्या को संस्थागत हत्या करार देते हुए कॉलेज प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वे तीन प्रमुख मांगों पर अड़े हैं:
- दोषी अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हो
- निष्पक्ष न्यायिक जांच हो
- मृतक के परिवार को मुआवजा और परिजन को नौकरी दी जाए
एक प्रदर्शनकारी डॉक्टर ने कहा:
“आज राकेश गया है, कल कोई और जाएगा। अगर हमने अभी आवाज नहीं उठाई, तो यह सिस्टम हम सबको खा जाएगा।“
कर्मचारियों की ‘डैमेज कंट्रोल’ कोशिशें
कुछ कॉलेज प्रशासनिक कर्मचारी और सहयोगी, पूरे मामले को “डिप्रेशन” से जोड़कर प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका कहना है कि राकेश पहले से ही मानसिक रूप से परेशान था, और यह आत्महत्या व्यक्तिगत कारणों से हुई।
यह प्रवृत्ति चिंताजनक है क्योंकि अक्सर संस्थागत उत्पीड़न के मामलों में इस तरह के बहाने देकर दोषियों को बचाने की कोशिश की जाती है।
एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक ने टिप्पणी की:
“डिप्रेशन हो भी तो यह पूछना जरूरी है कि डिप्रेशन का कारण क्या था? जब कोई आत्महत्या से पहले नाम लेकर आरोप लगाए, तो उस पर कानूनी कार्यवाही होनी ही चाहिए।“
पुलिस की निष्क्रियता और सवालों के घेरे में जांच
स्थानीय पुलिस इस पूरे मामले में निष्क्रिय नजर आ रही है।
- राकेश के अंतिम समय में दिए बयान के बावजूद कार्रवाई सुस्त हैं.
- जिन लोगों पर आरोप हैं, उनसे पूछताछ तक नहीं हुई।
- परिजनों की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं तो क्या है?
हाईकोर्ट को लेना चाहिए स्वत: संज्ञान
मामला इतना गंभीर है कि राजस्थान हाईकोर्ट की अवकाशकालीन खंडपीठ को इस पर स्वत: संज्ञान लेकर न्यायिक जांच के आदेश देने चाहिए। यह न केवल न्याय की दिशा में एक कदम होगा, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में भी मार्गदर्शक बनेगा।
यदि अंतिम बयान में किसी को दोषी ठहराया गया है, तो वह दस्तावेज न्यायिक दृष्टि से डाइंग डिक्लेरेशन माना जाना चाहिए, जो आपराधिक मुकदमे की मजबूत आधारशिला होता है।
राजनीतिक और सामाजिक ताना-बाना सुस्त
राजनीतिक दलों ने भी इस मामले को गंभीरता से नहीं उठाया बल्कि दबाने में लगे हैं.
विपक्षी नेताओं ने मांग की है कि राज्य सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय को मामले की गंभीरता को समझते हुए उच्च स्तरीय जांच समिति गठित करनी चाहिए।
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे “सिस्टम का शोषणकारी चेहरा” बताते हुए दोषियों की गिरफ्तारी की मांग की है।
मृतक के अंतिम शब्दों पर टिका हैं केस
राकेश के अंतिम शब्दों पर केस टिका हैं. राकेश के साथी बताते हैं कि राकेश अक्सर कहता था –
“मैं थक गया हूँ… रोज अपमानित होता हूँ… मेरी मेहनत को दबाया जा रहा है… मुझे इंसाफ चाहिए…“
ये शब्द सिर्फ आत्महत्या नहीं, बल्कि सिस्टम के खिलाफ एक करुण चीख हैं। क्या हमारी व्यवस्था इतनी निष्ठुर हो गई है कि एक प्रतिभाशाली डॉक्टर की अंतिम पुकार को भी अनसुना कर दे?
संवेदनशीलता की मांग करता विषय
यह कोई सामान्य मामला नहीं है। जब डॉक्टर, जो दूसरों की जान बचाता है, खुद को असहाय महसूस कर जीवन समाप्त कर ले, तब यह सिर्फ व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि सामूहिक संस्थागत हत्या है।
इसलिए, यह समय है संवेदनशील निर्णयों का –
- निष्पक्ष न्यायिक जांच
- दोषियों की गिरफ्तारी
- मानसिक उत्पीड़न को लेकर सख्त दिशा-निर्देश
- मेडिकल कॉलेजों में परामर्श और शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना
कब मिलेगा न्याय?
यह सवाल हर उस आंख से पूछा जाना चाहिए, जो राकेश के जनाजे को देखकर रोई है।
- क्या यह मामला भी अन्य संस्थागत उत्पीड़न की तरह दबा दिया जाएगा?
- क्या राकेश के दोषी खुलेआम घूमते रहेंगे?
- क्या न्याय बस एक शब्द बनकर रह जाएगा?
या फिर
- न्यायिक व्यवस्था एक उदाहरण पेश करेगी?
- न्याय की रोशनी राकेश की आत्मा को शांति देगी?
जवाब हमें, आपको और पूरे समाज को देना है।
अफ़सोस ये भी…
–संस्थागत उत्पीड़न को लेकर भारत में अब तक कितने डॉक्टरों ने आत्महत्या की, इस पर कोई आधिकारिक डेटा नहीं है।
–मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिकित्सा पेशेवरों में बढ़ते दबाव को पहचानना ज़रूरी है।
–हर कॉलेज में “ग्रीवांस रिड्रेसल सेल” और “मेंटल हेल्थ काउंसलिंग सिस्टम” अनिवार्य हो।
राकेश को न्याय नहीं मिला तो विश्वास की मौत होगी
यदि राकेश विश्नोई को न्याय नहीं मिला, तो यह सिर्फ एक डॉक्टर की मौत नहीं होगी, यह एक विश्वास की मौत होगी – उस विश्वास की जो लोग न्यायपालिका, प्रशासन और संस्थाओं से करते हैं।
समय की मांग है कि न्याय हो – और होता हुआ दिखे।







