खेल के साथ भी खेल हो रहा हैं. खेलों को नेताओं ने अपनी जागीर समझ कर अपने पुत्रों को कमान सौंप कर खेलों का कबाड़ा कर दिया. पहले अशोक गहलोत ने अपने पुत्र वैभव गहलोत को आरसीए का अध्यक्ष बनाया और अब चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर अपने बेटे धनंजय सिंह को आरसीए का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं. इससे खेल का भला नहीं होने वाला… पेश हैं पड़ताल करती रिपोर्ट–
डी के पुरोहित. जोधपुर
राजस्थान में क्रिकेट को राजनीति की बैसाखियों पर खड़ा कर देने की कोशिशें कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन अब जिस तरह से राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (RCA) में ‘नेता पुत्रों’ की बाढ़ सी आ गई है, उसने इस गंभीर सवाल को एक बार फिर सतह पर ला खड़ा किया है—क्या क्रिकेट, खिलाड़ियों और खेल भावना को तिलांजलि देकर, सिर्फ राजनीतिक वारिसों का मंच बनता जा रहा है?
ताज़ा घटनाक्रम में राजस्थान के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के बेटे धनंजय सिंह खींवसर को RCA की एडहॉक कमेटी में शामिल किया गया है। उनके अलावा तीन अन्य नेता पुत्रों को भी कमेटी में जगह दी गई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या RCA की कमान फिर किसी ‘नेता पुत्र’ को सौंपने की तैयारी है? और यदि हां, तो इसका असर राजस्थान क्रिकेट पर क्या पड़ेगा?
राजनीति बनाम क्रिकेट: RCA की बदलती पहचान
राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना खिलाड़ियों के हितों, क्रिकेट को बढ़ावा देने और राज्य में प्रतिभाओं को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंच देने के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन समय के साथ RCA की पहचान एक राजनीतिक अखाड़ा बनकर रह गई है। इसमें सत्ता की साजिशें, गुटबाज़ी और पारिवारिक विरासत अब हावी होती दिख रही है।
पहले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को RCA का अध्यक्ष बनाया गया था। उनका कार्यकाल विशेष उपलब्धियों से नहीं भरा रहा। क्रिकेट की बुनियादी संरचना और खिलाड़ियों के लिए जरूरी संसाधन, सुविधाएं व पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर उनकी भूमिका गंभीर सवालों के घेरे में रही।
अब गजेंद्र सिंह खींवसर के बेटे की बारी?
अब एक बार फिर वही कहानी दोहराई जा रही है। इस बार केंद्र में हैं भाजपा सरकार के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर, जिनके पुत्र धनंजय सिंह खींवसर को RCA की एडहॉक कमेटी में शामिल किया गया है। सूत्र बताते हैं कि मंत्री खींवसर पूरी योजना के तहत अपने पुत्र को RCA का अगला अध्यक्ष बनवाने की रणनीति में जुटे हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि भाजपा की सत्ता और खुद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सक्रियता के चलते यह प्रयास सफल हो सकता है। भजनलाल शर्मा स्वयं RCA विवादों में हस्तक्षेप कर चुके हैं और उनकी नज़दीकी खींवसर से मानी जाती है।
अन्य नेता पुत्र भी मैदान में
धनंजय सिंह खींवसर के अलावा तीन और राजनीतिक चेहरों के बेटे भी इस बार RCA की नई एडहॉक कमेटी का हिस्सा बने हैं:
- आशीष तिवाड़ी – वरिष्ठ भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी के पुत्र; वर्तमान में सीकर क्रिकेट एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष हैं।
- पिंकेश पोरवाल – भाजपा मीडिया सेल के सदस्य; प्रतापगढ़ क्रिकेट संघ के सचिव हैं।
- मोहित यादव – जसवंत यादव के पुत्र; अलवर जिला क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं।
इसके अलावा, जयपुर जिला क्रिकेट संघ की एडहॉक कमेटी के सदस्य रहे पूर्व क्रिकेटर डीडी कुमावत को एडहॉक कमेटी का कन्वीनर बनाया गया है। उन्होंने जयदीप बिहानी का स्थान लिया है, जो स्वयं RCA की पुरानी राजनीति के समीकरणों में सक्रिय रहे हैं।
रजिस्ट्रार का निर्देश और चुनाव की तैयारी
RCA के रजिस्ट्रार ने वर्तमान एडहॉक कमेटी को तीन महीने में चुनाव कराने का आदेश दिया है। चुनाव की तैयारी के नाम पर नई कमेटी बनाई गई है, मगर इसके गठन में जिस प्रकार नेता पुत्रों को प्राथमिकता दी गई है, वह खुद में एक संदेहपूर्ण संकेत है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि यह पूरी कवायद RCA की अध्यक्षता फिर से किसी राजनीतिक घराने के हाथों सौंपने की मंशा से हो रही है।
सवाल: क्या यह क्रिकेट के साथ अन्याय नहीं?
राज्य के क्रिकेट प्रेमी, कोच, खिलाड़ी और खेल पत्रकार यह सवाल लगातार उठा रहे हैं कि यदि RCA की कमान ऐसे लोगों के हाथ में जाती रही जिनका क्रिकेट से कोई वास्तविक जुड़ाव नहीं है, तो खिलाड़ियों की प्रतिभा, चयन प्रक्रिया, और क्रिकेट के ढांचे को सीधा नुकसान होगा।
एक पूर्व रणजी खिलाड़ी का कहना है:
“राजनीतिक चेहरों को क्रिकेट का अध्यक्ष बनाना मतलब क्रिकेट को सिर्फ मंच बनाना—not for talent but for power. खिलाड़ियों के लिए यह मनोबल तोड़ने वाला है।”
वैभव गहलोत की असफलता बनी मिसाल
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत के कार्यकाल को क्रिकेट विश्लेषक एक ‘नॉन-इवेंट’ के रूप में याद करते हैं। उनके कार्यकाल में RCA में विवाद, गुटबाज़ी, चयन विवाद और भ्रष्टाचार के आरोप बढ़े। कोई ठोस योजना मैदानों के विकास की नहीं आई, न ही खिलाड़ियों की प्रतिभा को नया मंच मिला।
ऐसे में यह सवाल वाजिब है कि राजनीति से जुड़े लोग जब RCA जैसे खेल संगठनों की कमान संभालते हैं, तो क्या वह क्रिकेट का हित कर सकते हैं या केवल सत्ता का विस्तार करते हैं?
मीडिया और शक्तियाँ भी एकमत?
सूत्रों की मानें तो इस बार सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि राजनीतिक मीडिया, संघ से जुड़े संगठन, और कुछ प्रभावशाली व्यापारी वर्ग भी इस ‘नेता पुत्र मिशन’ के समर्थन में खड़े हैं। RCA के अध्यक्ष पद की दौड़ में यदि धनंजय सिंह खींवसर को आगे बढ़ाया जाता है, तो यह महज़ चुनाव नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सत्तात्मक योजना का हिस्सा होगा।
खिलाड़ी हाशिए पर, राजनीति हावी
इस समय RCA के परिदृश्य पर गौर करें तो क्रिकेटर कहीं नहीं दिखते। न कोई पूर्व राष्ट्रीय खिलाड़ी, न कोई सक्रिय कोच, और न ही कोई खेल प्रशासक। चारों ओर बस राजनीतिक चेहरों के बेटे और उनके करीबी।
राजस्थान के एक युवा क्रिकेटर तो यहां तक कहते हैं:
“हम चाहते हैं कि RCA का अध्यक्ष कोई क्रिकेटर हो, जो हमारी समस्याएं समझे, मैदान की स्थिति को जाने, चयन प्रक्रिया को साफ-सुथरा रखे। लेकिन यहां राजनीति ही क्रिकेट को दबा रही है।”
क्या समाधान है?
विशेषज्ञों और पूर्व खिलाड़ियों का मानना है कि RCA के अध्यक्ष पद पर ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए जो खुद क्रिकेट से जुड़ा हो, जिसने मैदान पर संघर्ष किया हो, और जो इस खेल की बारीकियों से वाकिफ हो। इसके लिए एक स्वतंत्र और पारदर्शी चयन प्रक्रिया की जरूरत है, जहाँ न राजनीतिक दबाव हो, न सत्ता की साजिश।
क्रिकेट को राजनीति से बचाना होगा
राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन पर छाया यह ‘नेता पुत्र मॉडल’ आने वाले समय में राज्य की क्रिकेट प्रतिभाओं को बर्बाद कर सकता है। सरकार और राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि खेलों का प्रशासन उनके राजनीतिक वंशवाद का विस्तार नहीं होना चाहिए। RCA का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो क्रिकेट का सच्चा सेवक हो, न कि किसी राजनेता का वंशज।
यदि मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव नहीं आया और RCA फिर किसी नेता पुत्र की जागीर बन गई, तो यह तय है कि राजस्थान क्रिकेट को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
अब देखना यह है कि क्या चिकित्सा मंत्री अपने पुत्र धनंजय सिंह को अध्यक्ष बनवा पाते हैं, या कोई क्रिकेटर इस लड़ाई को जीत कर खेल भावना की जीत सुनिश्चित करता है।










