एक विधायक ने सुझाव दिया था कि विवि अपनी संपत्तियां बेचकर पेंशन भुगतान करे मगर यह स्थाई समाधान नहीं है, दूसरी ओर 30 करोड़ का लोन भी विवि को अभी तक नहीं मिला है। देखने वाली बात यह है कि सरकार से लोन लेकर कब तक पेंशन और देनदारियां चुकाई जाएगी? राइजिंग भास्कर यहां कुछ सुझाव बता रहा है, जिसे अपनाकर स्थाई समाधान निकाला जा सकता है…
डीके पुरोहित. जोधपुर
मरुस्थलीय शहर जोधपुर की शान, शिक्षा के गढ़ जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (JNVU) इन दिनों एक गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है। विश्वविद्यालय के सैकड़ों सेवानिवृत्त कर्मचारी बीते 48 दिनों से अपनी पेंशन की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं, लेकिन अब तक न तो राज्य सरकार की ओर से कोई ठोस कदम उठाया गया है और न ही विश्वविद्यालय प्रशासन ने कोई सकारात्मक पहल की है।
धरना स्थल पर बैठे वरिष्ठ नागरिकों की आंखों में उम्मीदें हैं, लेकिन स्वास्थ्य और सम्मान को लेकर बढ़ती चिंता भी साफ देखी जा सकती है। “हमने जीवन का सबसे सुनहरा समय विश्वविद्यालय को समर्पित किया। अब जब हमें अपने बुढ़ापे में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है तो विश्वविद्यालय और सरकार दोनों ही आंख मूंदे बैठे हैं,” एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर ने रुआंसी आंखों से कहा।
विवि प्रशासन की लाचारी: 30 करोड़ का लोन भी नहीं मिला
विश्वविद्यालय प्रशासन ने पेंशन भुगतान के लिए 30 करोड़ रुपये के लोन की मांग सरकार से की थी, लेकिन अभी तक उस पर कोई स्वीकृति नहीं मिल पाई है। इससे यह स्पष्ट हो रहा है कि सरकार की प्राथमिकताओं में विश्वविद्यालयों का वित्तीय संकट सबसे निचले पायदान पर है। विवि के कुलगुरु और रजिस्ट्रार इस मामले पर मौन साधे हुए हैं। बार-बार ज्ञापन, ईमेल, मीटिंग्स और मीडिया कवरेज के बावजूद प्रशासनिक चुप्पी पेंशनर्स की पीड़ा को और भी बढ़ा रही है।
संकट का अस्थायी नहीं, स्थायी समाधान ज़रूरी
जानकारों का मानना है कि अगर विश्वविद्यालय को हर साल ऐसे ही पेंशन संकट का सामना करना पड़ेगा, तो यह केवल सामाजिक ही नहीं, संस्थागत पतन की ओर ले जाएगा। पेंशनर्स की संख्या हर साल बढ़ेगी, लेकिन विश्वविद्यालय की आय के साधन स्थिर या सीमित ही रहेंगे। ऐसे में केवल सरकार या ऋण पर निर्भर रहना विवेकपूर्ण नहीं है। एक स्थायी और आत्मनिर्भर समाधान अपनाना होगा, जिससे हर साल इस तरह के आंदोलन या अपमानजनक हालात पैदा न हों।
स्थाई समाधान के लिए राइजिंग भास्कर के प्रस्ताव : कैसे आत्मनिर्भर बन सकता है विवि?
इस संकट का समाधान केवल आर्थिक नहीं बल्कि व्यवस्थागत बदलावों में है। निम्नलिखित कदम विवि को दीर्घकालीन समाधान की ओर ले जा सकते हैं:
1. पेंशन मित्र भामाशाह योजना की शुरुआत
राजस्थान की भामाशाह परंपरा बहुत पुरानी और समृद्ध रही है। व्यापार, उद्योग, समाजसेवा से जुड़े कई लोग शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए दान करते आए हैं। विश्वविद्यालय को एक विशेष अभियान चलाकर ‘पेंशन मित्र भामाशाह’ तैयार करने चाहिएं।
- ऐसे भामाशाहों को हर साल विशेष सम्मान समारोह में आमंत्रित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- सामाजिक प्रतिष्ठा और योगदान की भावना को जोड़कर विश्वविद्यालय एक नवीन सामाजिक आंदोलन शुरू कर सकता है।
- JNVU के पूर्व छात्रों, उद्योगपतियों, और एनआरआई भामाशाहों को जोड़ना चाहिए।
2. विश्वविद्यालय की संपत्ति को किराये पर देना
JNVU के पास जोधपुर शहर में बहुमूल्य जमीनें और भवन हैं। कई भवनों का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। इन्हें निम्नलिखित ढंग से रेंटल मॉडल पर उपयोग में लिया जा सकता है:
- विवि परिसर के कुछ हिस्से को प्राइवेट स्कूलों, कोचिंग संस्थानों या स्टार्टअप्स को किराए पर देना।
- विश्वविद्यालय के कुछ हिस्से को गेस्ट हाउस, कांफ्रेंस हॉल, मैदान, गार्डन आदि को सामुदायिक आयोजनों के लिए किराए पर देना।
- विवि की गैर-शैक्षणिक भूमि का कृषि, वेयरहाउस या पार्किंग जैसे कामों में व्यावसायिक उपयोग करना।
इससे हर माह एक स्थिर आय अर्जित की जा सकती है जो पेंशन फंड में नियमित योगदान कर सके।
3. एल्युमिनी नेटवर्क से आर्थिक सहयोग
JNVU के देश-विदेश में हजारों पूर्व छात्र हैं जो आज प्रतिष्ठित पदों पर हैं। विश्वविद्यालय को एक सशक्त एलुमिनाई नेटवर्क बनाकर उनसे नियमित आर्थिक सहयोग जुटाना चाहिए।
- ऑनलाइन पोर्टल और मोबाइल ऐप के माध्यम से डोनेशन गेटवे तैयार किया जाए।
- पूर्व छात्रों के लिए ‘पेंशन सहयोग कार्ड’ जैसी योजनाएं लाकर उन्हें जोड़ना।
- सफल एलुमिनाई को ‘पेंशन संरक्षक’ जैसे सम्मान प्रदान करना।
4. पेंशनर्स को विवि की संपत्ति से जोड़ना
पेंशनर्स को विवि की रियल एस्टेट संपत्तियों से जोड़ने का विचार भी किया जा सकता है। इसका एक मॉडल यह हो सकता है:
- पेंशनर्स को विश्वविद्यालय की संपत्ति जैसे गेस्ट हाउस, लॉज, कैंटीन आदि किराये पर उपलब्ध कराना और उनकी आय को पेंशन में समायोजित करना।
- इससे पेंशनर्स को न केवल आत्मनिर्भरता मिलेगी, बल्कि विवि पर सीधी आर्थिक निर्भरता भी कम होगी।
5. जमीन बेचने का सुझाव: क्यों यह स्थायी समाधान नहीं?
कुछ पूर्व शिक्षकों और एमएलए द्वारा यह सुझाव भी आया कि विश्वविद्यालय को अपनी कुछ जमीनें बेचकर पेंशन संकट से उबरना चाहिए। लेकिन यह एक अल्पकालिक समाधान होगा।
- जमीन बेचने से मिली राशि कुछ सालों में खर्च हो जाएगी।
- भविष्य में फिर वैसी ही स्थिति उत्पन्न होगी, लेकिन तब विवि के पास कोई और संपत्ति नहीं होगी।
इसलिए जमीन बेचने की बजाय उसे आय के स्रोत में बदलना कहीं अधिक विवेकपूर्ण और दीर्घकालिक समाधान है।
सामाजिक और नैतिक पहलू
इस संकट का एक गंभीर सामाजिक पहलू यह भी है कि हमारे वरिष्ठ नागरिकों के साथ अन्याय हो रहा है। जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्र निर्माण की शिक्षा प्रणाली में बिताया, वे आज पेंशन के लिए धरने पर बैठे हैं, भूख हड़ताल कर रहे हैं, और अपमानित महसूस कर रहे हैं। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का पतन भी है। यदि हम अपने बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन नहीं दे सकते, तो हमारी शिक्षा प्रणाली की नैतिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगते हैं।
क्या JNVU निकालेगा कोई सकारात्मक पहल?
जयनारायण व्यास यूनिवर्सिटी, जो कभी शिक्षण और अनुसंधान का केंद्र रहा है, आज एक वित्तीय अव्यवस्था और नैतिक दुविधा के दौर से गुजर रहा है। धरने पर बैठे पेंशनर्स की मांगें न तो असंभव हैं, न ही अत्यधिक। जरूरत है केवल संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टिकोण और दूरदर्शी योजना की। अगर विश्वविद्यालय प्रशासन, सरकार और समाज मिलकर उपरोक्त उपायों को अपनाएं, तो यह संकट न केवल टल सकता है बल्कि JNVU पूरे देश के लिए आत्मनिर्भर विश्वविद्यालय मॉडल बन सकता है।
JNVU के आर्थिक संकट से उबरने के उपाय
- ‘पेंशन मित्र भामाशाह’ योजना
- विश्वविद्यालय की संपत्ति को किराए पर देना
- पूर्व छात्रों से आर्थिक सहयोग
- पेंशनर्स को विवि संपत्तियों में रोजगार
- जमीन बेचने के बजाय व्यावसायिक इस्तेमाल










