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टूटते संयुक्त परिवार और एकाकी बचपन : आधुनिक समाज की चुनौती

राखी पुरोहित. जोधपुर

संयुक्त परिवार भारतीय समाज की आत्मा रहा है। यह वह व्यवस्था थी जहाँ दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन और माता-पिता सब एक छत के नीचे रहते थे, एक-दूसरे का सहारा बनते थे और मिलजुल कर जीवन जीते थे। परंतु आज के दौर में यह व्यवस्था तेजी से टूट रही है और उसके साथ ही टूट रहा है बचपन का वो रंगीन संसार, जिसमें रिश्तों की मिठास और अनुभव की सीख भरी होती थी। आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, आर्थिक स्वावलंबन की चाह और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की ओर बढ़ते कदमों ने संयुक्त परिवार की जड़ों को कमजोर कर दिया है।

इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा है बचपन पर। वह बचपन जो पहले घर के आंगन में खेलता था, अब मोबाइल की स्क्रीन में खो गया है। वह जो पहले चार बुजुर्गों के आशीर्वाद में पलता था, अब सिर्फ माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या के बीच अस्तित्व खोजता है।


संयुक्त परिवार क्या था, और क्यों था ज़रूरी?

संयुक्त परिवार केवल एक सामाजिक व्यवस्था नहीं थी, यह एक संस्कार केंद्र था। इसमें:

  • बच्चों को दादा-दादी से कहानियाँ और नैतिक शिक्षाएं मिलती थीं।
  • चाचा-चाची से अनुशासन और सहयोग की भावना।
  • भाई-बहनों से साझेदारी और दोस्ती।
  • पूरे परिवार से सामूहिक जिम्मेदारी और सामाजिक संतुलन की सीख मिलती थी।

संयुक्त परिवार में बच्चे हमेशा किसी न किसी की निगरानी में रहते थे। माँ अगर व्यस्त भी हो, तो दादी साथ होती थीं। अगर पिता गुस्से में हों, तो चाचा समझाने वाले होते थे। हर बच्चा एक भावनात्मक सुरक्षा कवच में रहता था।


आधुनिकता का दबाव: एकल परिवार की बढ़ती प्रवृत्ति

जैसे-जैसे शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार के अवसर बड़े शहरों में केन्द्रित हुए, वैसे-वैसे परिवारों में विघटन की प्रक्रिया तेज हुई।
आज के युवा:

  • करियर के लिए बड़े शहरों में जाते हैं,
  • विवाह के बाद खुद का स्वतंत्र घर बसाना चाहते हैं,
  • जीवन में निजी स्पेस और निर्णय की स्वतंत्रता चाहते हैं।

यह प्रवृत्ति किसी हद तक स्वाभाविक है, लेकिन इसका असर जब बच्चों की भावनात्मक, सामाजिक और मानसिक परवरिश पर पड़ता है, तब यह चिंताजनक हो जाता है।


एकाकी बचपन: क्या खो गया, क्या बदल गया?

संयुक्त परिवार के टूटने के बाद आज का बचपन:

  1. भावनात्मक रूप से अकेला है:
    माता-पिता दोनों कामकाजी हैं। बच्चे दिनभर घर में अकेले या नौकरानी के सहारे रहते हैं। वे सहज संवाद और स्नेह की कमी महसूस करते हैं।
  2. डिजिटल दुनिया में कैद है:
    पहले बच्चे मैदान में दोस्तों के साथ खेलते थे। अब वे मोबाइल, टैब या टीवी से चिपके रहते हैं। इससे शारीरिक विकास और सामाजिक संवाद की क्षमताएं घट रही हैं।
  3. मानसिक तनाव और अवसाद:
    अकेलेपन से ग्रस्त बच्चे असुरक्षा, डर और चिड़चिड़ापन का शिकार होते हैं। छोटे-छोटे मानसिक दबाव उन्हें अवसाद तक ले जाते हैं।
  4. सामाजिक व्यवहार की कमी:
    संयुक्त परिवार में बच्चे हर उम्र के लोगों के साथ रहना सीखते थे। अब सीमित संपर्क के कारण वे अन्य लोगों के साथ संवाद, सहनशीलता और सहयोग नहीं सीख पाते।

बचपन पर दादा-दादी की अनुपस्थिति का प्रभाव

  • कहानियाँ सुनने की परंपरा खत्म हो रही है। अब दादी की कहानियों की जगह यूट्यूब और ओटीटी ने ले ली है।
  • बुजुर्गों की उपस्थिति बच्चे को संस्कार, परंपरा, धैर्य और नैतिक मूल्यों की सीख देती थी, जो अब दुर्लभ हो गई है।
  • बुजुर्ग बच्चे के मन का सहारा होते हैं। माँ-पिता की डांट के बाद बच्चे उनके पास शरण लेते थे। अब वह आश्रय नहीं रहा।

क्या केवल परिवार ज़िम्मेदार है? समाज और व्यवस्था की भूमिका

संयुक्त परिवार की टूटन केवल व्यक्तिगत निर्णयों का परिणाम नहीं है, इसके पीछे समाज की संरचना और नीतियाँ भी जिम्मेदार हैं:

  • शहरीकरण ने रहन-सहन की जगहों को सीमित कर दिया। अब एक घर में 3-4 पीढ़ियाँ नहीं रह सकतीं।
  • महंगाई और आर्थिक दबाव के कारण दोनों पति-पत्नी को काम करना पड़ता है, जिससे बच्चों के लिए समय नहीं बचता।
  • परिवारिक विवाद भी संयुक्त परिवार की टूटन के पीछे एक प्रमुख कारण है।

संयुक्त परिवार की वापसी क्यों आवश्यक है?

यह कहना संभव नहीं कि हम पुराने समय की तरह पूरी तरह संयुक्त परिवार में लौट आएं, परंतु संयुक्तता की भावना और संरचना का पुनर्निर्माण ज़रूरी है:

  • परिवार के सदस्य रिश्तों को प्राथमिकता दें, संवाद बढ़ाएं, सहनशीलता रखें।
  • दादा-दादी को अलग न करें, उन्हें बच्चों की परवरिश में सहभागी बनाएं।
  • छुट्टियों, त्योहारों या सप्ताहांत पर सामूहिक पारिवारिक मिलन हो।
  • इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों से अधिक समय बच्चों को परिवार के साथ बिताने दें।

बचपन को कैसे बचाएं? कुछ व्यावहारिक सुझाव

  1. संवाद का पुल बनाएं:
    बच्चे से हर दिन कुछ समय बात करें। केवल “क्या खाया?” या “होमवर्क किया?” तक सीमित न रहें। उसकी रुचियों, समस्याओं, कल्पनाओं पर बात करें।
  2. बुजुर्गों को बच्चे की परवरिश में शामिल करें:
    दादी-दादा की कहानियाँ, जीवन अनुभव और ममता बच्चे को संतुलित व्यक्तित्व देती है।
  3. खेल और गतिविधियों को बढ़ावा दें:
    बच्चों को मोबाइल नहीं, बल्कि मैदान और किताबें दें। क्रिएटिव गतिविधियों में व्यस्त रखें।
  4. संयुक्त पारिवारिक मिलन को प्रोत्साहित करें:
    परिवारिक मेल-मिलाप, त्योहार एक साथ मनाना, रिश्तों को मजबूती देता है।
  5. पैतृक गांवों या पारिवारिक जड़ों से जोड़ें:
    बच्चे को उसकी संस्कृति, परंपरा और पारिवारिक इतिहास से अवगत कराएं।

आधुनिक संयुक्त परिवार: एक नया मॉडल

आज आवश्यकता है ‘मॉडर्न संयुक्त परिवार’ की – जिसमें स्वतंत्रता और सामूहिकता का संतुलन हो। उदाहरण के तौर पर:

  • भले ही एक ही छत के नीचे न रहें, परंतु नियमित वीडियो कॉल, ग्रुप चैट, पारिवारिक ट्रिप आदि से जुड़े रहें।
  • आर्थिक रूप से स्वतंत्र रहकर भी संवेदनात्मक रूप से एक-दूसरे के करीब रहें।
  • दादा-दादी को बच्चों की ऑनलाइन क्लास, प्रोजेक्ट्स में शामिल करें – इससे उनका भी समय कटेगा और बच्चों को सहारा मिलेगा।

बचपन बचाना जरूरी:

संयुक्त परिवार की टूटन और एकाकी बचपन, आधुनिक समाज के दो बड़े संकट बनकर उभरे हैं। इस समय केवल भौतिक सुख-सुविधा नहीं, संवेदनशीलता और सामाजिक पुनर्रचना की आवश्यकता है।

बचपन अगर अकेलेपन, डिजिटल निर्भरता और भावनात्मक शून्यता में पलेगा, तो आने वाला समाज स्वार्थी, असंवेदनशील और टूटे रिश्तों का होगा।
इसलिए, हर अभिभावक, शिक्षक, नीति-निर्माता और समाज को मिलकर प्रयास करना होगा कि हम संयुक्त परिवार की भावना को फिर से जीवित करें और बचपन को फिर से रिश्तों की गोद में खिलखिलाने का अवसर दें।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor