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Thursday, July 9, 2026, 2:36 am

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अरणी मंथन से प्रज्वलित होगी महामृत्युंजय कोटी रुद्र हवन की अग्नि

(अरणी मंथन की सामग्री। इसी से यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित होगी।)
प्रकृति का दिव्य स्वरूप है ईश्वर महाकीर्ति यज्ञशाला

भरत जोशी. जोधपुर 

परमहंस स्वामी ईश्वरानंद गिरि महाराज द्वारा दईजर लाछा बासनी में स्थापित संवित धाम आश्रम में 12 जुलाई से प्रारंभ हो रहे महामृत्युंजय कोटि रुद्र हवन के पहले दिन यज्ञ मंडप प्रोक्षण, विभिन्न देवताओं की पीठ की स्थापना के साथ ही संवित धाम आश्रम परिसर में मंगल कलश शोभा यात्रा निकाली जाएगी। 13 जुलाई को प्रातःकालीन सत्र में गणपति पूजन, गुरु पूजन के बाद द्वितीय सत्र में अरणी मंथन से अग्नि प्रज्ज्वलित की जाएगी। यज्ञ का शुभारंभ संत सरोवर, सोमाश्रम, माउंट आबू के महंत स्वामी संवित सच्चिदानंद गिरि महाराज और श्रीनंद गोकुल आश्रम, श्रीनिवासपुरम, बैंगलोर के महंत स्वामी सुधीरानंद गिरि महाराज की उपस्थिति में होगा।

सोमयाजी अग्निहोत्री पंडित नवरतन व्यास के आचार्यत्व में होने वाले हवन के लिए पहले दिन वैदिक ब्राह्मणों की वरणी होगी। उससे एक दिन पहले जोधपुर की अधिष्ठात्री मेहरानगढ़ में विराजित मां चामुंडा, संवित धाम आश्रम में विराजित अधिष्ठात्री भगवती गिरि राजेश्वरी, भगवान गिरीश्वर सहित समस्त देवी देवताओं, ऋषियों, संत महात्माओं की पूजा, अर्चना कर आज्ञा लेकर इस दिव्य अनुष्ठान महामृत्युंजय कोटि रुद्र हवन का शुभारंभ किया जाएगा।

जोधपुर संवित साधनायन सोसायटी की अध्यक्षा रानी उषा देवी और सचिव भरत जोशी ने बताया कि कोटि रुद्र हवन की अग्नि माचिस से नहीं बल्कि दो विशेष प्रकार की लकड़ी अरणी का मंथन करके अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसी अग्नि से हवन कुंड में अग्नि का आह्वाहन किया जाएगा। यज्ञ आचार्य अग्निहोत्री पंडित नवरतन व्यास ने ईश्वर महाकीर्ती यज्ञशाला के कुंडों के बारे में बताया कि 24 समचौरस प्रकृति कुण्ड बनाए गए हैं। कुंड के स्वरूप को प्रकृति का स्वरूप माना गया है। कुंड का पूर्व दिशा में सिर कहा गया तथा ईशान कोण और अग्नि कोण में दो भुजाएं कही गई। वहीं वायव्य कोण और नैऋत्य कोण में दो जंघाएं एवं कुंड उसका उदर पेट है। कुंड की नाभि मध्य भाग है इसी पर अग्नि स्थापित की जाती है। कुण्ड के बाहर तीन मेखला शुरू होती है जो त्रिदेवों ब्रह्मा विष्णु महेश की प्रतीक है तथा इनका तीन रंग सफ़ेद, लाल व काला तीन गुणों सत रज तम का प्रतीक है । बाहर योनि बनाई जाती है जिसके ऊपर से यजमान घृत की आहुति देते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor