डॉ. के प्रियंका शर्मा. नई दिल्ली
विश्व प्रख्यात व सेलिब्रिटी ज्योतिष, माँ बगलामुखी साधक, स्पिरिचुअल साइंटिस्ट, पैरा साइकॉलोजिस्ट, पास्ट लाइफ़ रिग्रेशन एक्सपर्ट
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोपरि है। ‘गुरु’ शब्द स्वयं में गहन अर्थ समेटे हुए है, जहाँ ‘गु’ का अर्थ अंधकार या अज्ञान है, और ‘रु’ का अर्थ उस अंधकार को दूर कर प्रकाश की ओर ले जाने वाला है यह परिभाषा गुरु को केवल एक शिक्षक से कहीं अधिक, एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करती है जो शिष्य के जीवन से अज्ञानता का आवरण हटाकर ज्ञान का आलोक भरता है।
प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र अवसर है । हमारे धर्मग्रंथों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है, और उन्हें साक्षात् परम ब्रह्म का स्वरूप कहा गया है । ऐसी मान्यता है कि सद्गुरु की कृपा के बिना ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव नहीं है । गुरु ही वह सेतु हैं जो शिष्य को भौतिक जगत की मोह-माया से निकालकर आध्यात्मिक मुक्ति की ओर ले जाते हैं।
यह पर्व हमें उन सभी गुरुजनों के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर देता है, जिन्होंने हमें न केवल किताबी ज्ञान दिया, बल्कि जीवन के सही मूल्यों, संस्कारों और सिद्धांतों से भी परिचित कराया । गुरु का मार्गदर्शन एक दीपक के समान है जो जीवन के पथ को आलोकित करता है, हमें गलत मार्ग पर चलने से बचाता है और जीवन को सही दिशा प्रदान करता है । गुरु के बिना जीवन की कल्पना करना भी असंभव है, क्योंकि वे चरित्र निर्माण में भी सहायक होते हैं । गुरु पूर्णिमा का यह पावन दिन हमें स्मरण कराता है कि ज्ञान की प्राप्ति और जीवन की सार्थकता के लिए गुरु का आशीर्वाद और उनकी शिक्षाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं।
(जैसा कि राइजिंग भास्कर को बताया )








