आज से कुछ साल पहले हमने उपरोक्त दोनों टॉयलेट को लेकर प्रतियोगिता आयोजित की थी, और लोगों के दोनों टॉयलेट को लेकर लोगों के अनुभव जाने थे…80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वेस्टर्न टॉयलेट शरीर के लिए घातक है। बीस प्रतिशत लोगों ने वेस्टर्न टॉयलेट का समर्थन किया…कुछ लोगों ने लिखा कि बीमार और शारीरिक रोगों से ग्रस्त कुछ लोगों के लिए वेस्टर्न टॉयलेट वरदान है…
राखी पुरोहित. एडिटर इन चीफ राइजिंग भास्कर
अमेरिका के एक प्रतिष्ठित एनजीओ ने 20 साल की लंबी रिसर्च के बाद दुनिया को चौंका देने वाले नतीजे पेश किए हैं। इस शोध का केंद्र था—टॉयलेट सिस्टम का मानव शरीर पर प्रभाव। अध्ययन में यह चौंकाने वाला निष्कर्ष सामने आया है कि वेस्टर्न टॉयलेट का लगातार उपयोग करने से पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के घुटने समय से पहले कमजोर हो जाते हैं, हॉर्मोन निर्माण धीमा पड़ जाता है और बच्चों का शारीरिक विकास रुकने लगता है। यह शोध अब भारत की राजनीति और नीति दोनों के केंद्र में आ चुका है।
वेस्टर्न टॉयलेट से “धीमे ज़हर” जैसा असर
शोध में पाया गया कि वेस्टर्न टॉयलेट में बैठने की मुद्रा शरीर को निष्क्रिय करती है। लंबे समय तक इसका उपयोग करने से:
- घुटनों की ताकत 40% तक कम हो जाती है, जिससे समय से पहले जोड़ों का दर्द शुरू हो सकता है।
- टेस्टोस्टेरोन और अन्य हार्मोन का स्राव कम हो जाता है, जिससे शारीरिक ऊर्जा, यौन स्वास्थ्य और इम्यूनिटी प्रभावित होती है।
- बच्चों में ग्रोथ हार्मोन का स्तर गिरता है, जिससे उनकी हाइट, मांसपेशियों और मानसिक विकास पर असर पड़ता है।
- लंबे समय तक इसका प्रयोग करने वाले व्यक्ति जल्दी बूढ़े दिखने लगते हैं। वेस्टर्न टॉयलेट की छूट केवल एक्सीडेंटल केसों और विशेष मामलों में करने की छत रहती है।
अमेरिकन रिसर्च के अनुसार, “इंडियन स्क्वॉटिंग पोजिशन”, यानी देसी टॉयलेट में बैठने की पद्धति शरीर को सक्रिय बनाए रखती है। इससे पाचन बेहतर होता है, घुटनों की लचीलापन बनी रहती है, और हार्मोनल एक्टिविटी संतुलित रहती है।
मोदी सरकार की तैयारी: हर घर में अनिवार्य होगा देसी टॉयलेट
इस शोध ने भारत के नीति-निर्माताओं का भी ध्यान खींचा है। पीएम नरेंद्र मोदी, जो पहले ही स्वच्छ भारत मिशन से लाखों शौचालय बनवा चुके हैं, अब एक और “स्वस्थ भारत टॉयलेट मिशन” की तैयारी कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, यह योजना अरुण ऋषि स्वर्गीय द्वारा आयुष्मान भव न्यास के तहत प्रस्तुत एक रिपोर्ट के आधार पर बनाई जा रही है।
प्रस्तावित योजना के मुख्य बिंदु:
- हर घर में कम से कम एक भारतीय (स्क्वाटिंग) टॉयलेट अनिवार्य किया जाएगा
- देशभर के 1 लाख एनजीओ को जोड़कर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा
- सरकारी टॉयलेट्स में वेस्टर्न सीट की जगह देसी टॉयलेट को प्रोत्साहन
- स्कूलों और कॉलेजों में टॉयलेट डिज़ाइन में बदलाव
- कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों पर दबाव, क्योंकि कई MNC टॉयलेट ब्रांड्स इनसे संबंध रखते हैं
मल्टीनेशनल कंपनियों की बेचैनी
इस शोध और मोदी सरकार की योजना से सबसे बड़ा झटका उन मल्टीनेशनल कंपनियों को लग सकता है, जो वेस्टर्न टॉयलेट सिस्टम, फ्लश टेक्नोलॉजी और वॉशिंग गिज़मों पर आधारित उत्पाद बेचती हैं। ये कंपनियां पिछले दो दशकों से भारत में वेस्टर्न टॉयलेट्स को “आधुनिकता” और “स्टेटस सिंबल” के नाम पर स्थापित कर चुकी हैं।
कांग्रेस का पलटवार: “शादी विज्ञान” पर करेंगे खुलासा
इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव ने विवादास्पद टिप्पणी करते हुए कहा कि,
“जब हमारी सरकार सत्ता में आएगी, तब हम शादी और शरीर विज्ञान पर सबसे बड़ा खुलासा करेंगे। मोदी सरकार धार्मिक जड़ता के नाम पर वैज्ञानिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ रही है।”
कांग्रेस के इस बयान के पीछे माना जा रहा है कि कुछ कॉरपोरेट लॉबी इस शोध को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं, ताकि उनका अरबों डॉलर का टॉयलेट मार्केट भारत में सुरक्षित रहे।
टॉयलेट अब स्वास्थ्य और राजनीति का मुद्दा
इस विषय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शौचालय अब केवल स्वच्छता का नहीं बल्कि स्वास्थ्य और राजनीति का भी एक गहन मुद्दा बन चुका है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- देश को एक ऐसी दिशा में ले जाया जा रहा है जहां नीतियां पश्चिमी प्रभावों की समीक्षा कर देसी विज्ञान को प्राथमिकता दें।
- यह भारत में हेल्थकेयर मॉडल और पब्लिक हेल्थ प्लानिंग में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है।
- राजनीतिक दलों की नीति निर्माण में विदेशी कंपनियों की भूमिका अब जनता के सवालों के घेरे में है।
क्या हम अपने शरीर की कीमत पर “कम्फर्ट” खरीद रहे हैं?
जहां एक ओर यह शोध भारत को अपने पारंपरिक मूल्यों की ओर लौटने के लिए प्रेरित कर रहा है, वहीं यह राजनीति, कॉर्पोरेट लॉबी और पब्लिक हेल्थ के बीच की खींचतान को भी उजागर करता है। वेस्टर्न टॉयलेट को आधुनिकता मानने वाली सोच पर यह सवाल उठाता है—क्या हम अपने शरीर की कीमत पर “कम्फर्ट” खरीद रहे हैं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह नया कदम यदि लागू होता है तो यह शरीर विज्ञान, पारंपरिक जीवनशैली और सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में एक ऐतिहासिक क्रांति बन सकता है। पर साथ ही यह आने वाले चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है।




