अमूल दूध अब नहीं पीयेगा इंडिया
डी के पुरोहित. वाशिंगटन डी.सी.
“अमूल दूध पीता है इंडिया” – ये नारा अब शायद लोगों को फिर से सोचने पर मजबूर कर दे, क्योंकि अमेरिका की एक प्रतिष्ठित लैब में हुई ताजा जांच में थैलीबंद अमूल दूध को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
अमेरिकी रिपोर्ट के मुताबिक, अमूल ब्रांड द्वारा बेचे जा रहे पैकिंग दूध में ऐसे रसायनों की मौजूदगी पाई गई है जो न केवल शरीर की हड्डियों को कमजोर कर सकते हैं, बल्कि पूरे शरीर में स्थायी दर्द, त्वचा पर प्रभाव, और यहां तक कि समय से पहले बुढ़ापा लाने के लिए भी जिम्मेदार माने जा रहे हैं।
क्या था अमेरिकी लैब की जांच में?
जांच रिपोर्ट अमेरिका के एक स्वतंत्र खाद्य सुरक्षा अनुसंधान संस्थान की ओर से सामने आई है, जिसमें भारत में बिकने वाले थैलीबंद दूध के सैंपल मंगवाकर परीक्षण किए गए।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- पैकेज्ड अमूल दूध में बेंजोइक एसिड, फॉर्मलिन, और सोडियम ट्रायपॉलीफॉस्फेट जैसे तत्व पाए गए।
- ये रसायन दूध को लंबे समय तक खराब होने से बचाने के लिए मिलाए जाते हैं, लेकिन लगातार सेवन से यह शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित करते हैं।
- नतीजा: हड्डियों में सूजन, मांसपेशियों में जकड़न और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं।
सुप्रीम कोर्ट के जज भी जता चुके हैं चिंता
यह कोई पहली बार नहीं जब थैलीबंद दूध को लेकर सवाल उठे हों। भारत के सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश ने वर्ष 2019 में कहा था कि,
“थैलीबंद दूध में अगर कोई जहरीला तत्व, जैसे कि साइनाइड मिलाया जाए, तो लाखों लोगों की जान जा सकती है। ऐसे उत्पादों पर वैज्ञानिक नजर रखने की जरूरत है।”
उनकी यह टिप्पणी मीडिया और संसद दोनों में काफी चर्चा का विषय बनी थी, लेकिन उस वक्त भी सरकार या प्रमुख ब्रांडों की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं आया था।
भारतीय स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय
भारत के कई वरिष्ठ डॉक्टर और पोषण विशेषज्ञ भी पैक्ड दूध को लेकर आशंकाएं जता चुके हैं।
डॉ. श्रुति मेहरा, एम्स, दिल्ली की फूड टॉक्सिकोलॉजी एक्सपर्ट बताती हैं:
“दूध में यदि रसायन या प्रिजर्वेटिव्स मिलाए जाएं, तो वह धीरे-धीरे शरीर में जहर का काम करते हैं। अमूल जैसे बड़े ब्रांड्स को अपनी पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए।”
ग्रामीण भारत में कच्चा दूध फिर से बन रहा है विकल्प
खास बात यह है कि भारत के अनेक गांवों में लोग अब कच्चा दूध या स्थानीय डेयरियों से सीधा दूध लेना पसंद कर रहे हैं। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में एनजीओ और स्वैच्छिक संगठन थैलीबंद दूध के खिलाफ जागरूकता अभियान चला रहे हैं।
“बोतलबंद जहर मत खरीदो” – यही स्लोगन लेकर ‘दूध सत्याग्रह’ जैसे अभियान चल रहे हैं।
अमूल की चुप्पी रहस्यमयी
रिपोर्ट आने के बाद जब राइजिंग भास्कर ने अमूल के प्रबंधन और प्रवक्ता से संपर्क करने की कोशिश की, तो कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई। न ही अमूल ने अभी तक इस रिपोर्ट का खंडन किया है और न ही जांच को गलत बताया है।
यह चुप्पी इसलिए और गंभीर लगती है क्योंकि अमूल भारत की सबसे बड़ी डेयरी ब्रांड है और हर रोज़ करोड़ों लीटर दूध देश के लाखों घरों तक पहुंचाती है।
क्या विकल्प है उपभोक्ताओं के पास?
इस समय भारत में कई घरेलू और निजी डेयरी सेवाएं, ऑर्गेनिक दूध की सुविधा दे रही हैं। इनमें बिना पैकेजिंग दूध, सीधे गाय/भैंस से ताजा निकाला गया दूध प्रमुख है।
FSSAI (भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण) ने 2024 में एक गाइडलाइन जारी की थी जिसमें थैलीबंद दूध में ‘एडिटिव्स और प्रिजर्वेटिव’ की सीमा तय की गई थी, लेकिन उनकी मॉनिटरिंग का कोई नियमित तंत्र आज तक लागू नहीं हो पाया है।
जनता की मांग: दूध पर हो राष्ट्रीय स्तर की जांच
अब आम उपभोक्ताओं और सामाजिक संगठनों की मांग है कि भारत सरकार इस पूरे मामले पर एक स्वतंत्र वैज्ञानिक समिति गठित करे जो थैलीबंद दूध कंपनियों के उत्पादों की नियमित जांच करे और उनका रिपोर्ट सार्वजनिक करे।
स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं
अमूल जैसी कंपनियों पर देशवासियों का भरोसा है। लेकिन यदि उस भरोसे को विज्ञान और प्रमाणिकता से बल न मिले, तो यह स्वास्थ्य आपदा बन सकता है। सवाल केवल अमूल का नहीं, बल्कि समूचे भारत के डेयरी सिस्टम की पारदर्शिता और खाद्य सुरक्षा का है।
आगामी समय में यदि सरकार और ब्रांड्स सतर्क नहीं हुए, तो “अमूल दूध पीता है इंडिया” जैसे नारे इतिहास की बात हो सकते हैं।
(यह एक खोजी रिपोर्ट है। राइजिंग भास्कर ने इस रिपोर्ट के लिए भारत और अमेरिका में मौजूद दस्तावेजों, लैब रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों से बातचीत की है। पाठकों से अपील है कि अपने स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय सोच-समझकर लें।)



