राजेश बिंदास. की राइजिंग भास्कर के लिए खास रिपोर्ट
राजस्थान के दिल जोधपुर की गलियों में जब भी तेज भूख लगती है, तो ज़ुबान पर पहला नाम आता है—समोसा, कचौड़ी, मिर्चीबड़ा और जलेबी का। सदियों से नाश्ते की थाली का अभिन्न हिस्सा रहे ये व्यंजन अब खुद को संकट में पाते नज़र आ रहे हैं। एम्स दिल्ली की ओर से जारी की गई एक स्वास्थ्य चेतावनी ने इन पारंपरिक स्वादों पर सीधा असर डाला है।
एम्स दिल्ली ने हाल ही में घोषणा की कि समोसा, कचौड़ी, मिर्चीबड़ा और जलेबी जैसे तले-भुने खाद्य पदार्थों को “स्वास्थ्य के लिए हानिकारक” माना जाए और दुकानदारों को इन्हें बेचते समय “वैधानिक स्वास्थ्य चेतावनी” प्रदर्शित करने की सिफारिश की। इसका असर अब ज़मीनी स्तर पर साफ नज़र आने लगा है—खासतौर पर जोधपुर जैसे शहर में, जहां सुबह की शुरुआत मिर्चीबड़े और जलेबी से होती है और शाम को समोसे से पेट भरता है।
35% तक घटी बिक्री, दुकानदारों की नींद उड़ी
शहर के प्रमुख नाश्ता विक्रेताओं के अनुसार, चेतावनी जारी होने के बाद से इन पारंपरिक व्यंजनों की बिक्री में औसतन 30 से 35 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। सूर्या नमकीन, जो कि जोधपुर के पुराने शहर क्षेत्र में वर्षों से समोसा और मिर्चीबड़ा बेच रहा है, ने बताया कि ग्राहकों की संख्या में अचानक गिरावट आई है।
सूर्या नमकीन की ओर से कहा गया कि “पहले दिन में 5000 समोसे बिक जाते थे, अब मुश्किल से 1000-1650 ही निकलते हैं। लोग पूछते हैं कि इसमें क्या तेल है, कितनी बार फ्राई होता है। पहले कभी किसी ने ये नहीं पूछा।”
इसी तरह, मधुबन में जलेबी के सबसे बड़े विक्रेता ने भी चिंता जताई। दुकान मालिक ने बताया, “हम हर दिन 25 किलो जलेबी बनाते थे, अब मुश्किल से 15 किलो ही बिक रही है। लोग कह रहे हैं कि मीठा छोड़ना है, एम्स की बात मानी है।”
स्वास्थ्य चेतावनी का असर सीधे उपभोक्ताओं पर
राइजिंग भास्कर की टीम ने शहर के कई इलाकों—सरदारपुरा, चौपासनी, महामंदिर, शास्त्री नगर और सूरसागर—में जाकर स्थानीय लोगों से बातचीत की। हर दस में से करीब तीन से चार लोग अब इन व्यंजनों से परहेज़ करने लगे हैं। खासकर युवा और मिडिल क्लास परिवारों में “स्वास्थ्य जागरूकता” की लहर देखी जा रही है।
नीलिमा एक स्कूल टीचर, ने कहा, “हम हर शुक्रवार को बच्चों को मिर्चीबड़ा खिलाते थे। अब हमने बंद कर दिया है। अगर एम्स जैसी संस्था कह रही है तो कुछ तो कारण होगा। हम अब घर का बना हेल्दी खाना ही देंगे।”
इसी तरह, प्रोफेसर रमेश ने कहा, “तले हुए पदार्थों से दिल की बीमारियां और ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं होती हैं, यह हम जानते हैं। एम्स की गाइडलाइन से अब लोगों को गंभीरता समझ आई है।”
दुकानों पर लगेंगे ‘स्वास्थ्य चेतावनी’ बोर्ड?
एम्स की सिफारिश पर यदि स्थानीय प्रशासन कार्रवाई करता है, तो जल्द ही समोसा और जलेबी की दुकानों पर वैधानिक चेतावनी के बोर्ड लग सकते हैं—कुछ वैसा ही जैसा तंबाकू उत्पादों पर होता है।
इस मुद्दे पर नगर निगम के खाद्य निरीक्षक ने कहा, “फिलहाल हम एम्स की रिपोर्ट और स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन का अध्ययन कर रहे हैं। यदि निर्देश आते हैं तो दुकानों को नोटिस देकर चेतावनी बोर्ड लगवाए जाएंगे।”
व्यापारियों की चिंता: “हमारे रोज़गार पर असर पड़ेगा”
दूसरी ओर, शहर के छोटे और मध्यम स्तर के नाश्ता विक्रेताओं में चिंता की लहर दौड़ गई है। कई दुकानदारों ने बताया कि वे इस व्यवसाय पर पूरी तरह निर्भर हैं और अचानक बिक्री घटने से घर चलाना मुश्किल हो सकता है।
चौपासनी रोड पर ठेला लगाने वाले भैया ने कहा, “हम दिन में 500 रुपये कमाते थे, अब 300 भी मुश्किल है। घर में बीवी-बच्चे हैं। अगर ये बंद हो गया तो हम क्या करेंगे?”
हेल्दी विकल्पों की तलाश शुरू
जहां एक ओर पारंपरिक व्यंजनों की मांग घटी है, वहीं दूसरी ओर हेल्दी विकल्पों की तलाश बढ़ गई है। ओट्स टिक्की, बेक्ड समोसे, एयर फ्राइड मिर्चीबड़े और गुड़ की जलेबी जैसे विकल्प बाजार में आ रहे हैं।
डाइटिशियन डॉ. संगीता का कहना है, “समोसा या कचौड़ी पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है, लेकिन इनका सेवन सीमित और हेल्दी तरीके से करें। बेकिंग या एयर फ्राइंग जैसे विकल्प मददगार हो सकते हैं।”
स्वाद और स्वास्थ्य के बीच अब एक नई जंग
जोधपुर में समोसा, कचौड़ी, मिर्चीबड़ा और जलेबी सिर्फ खाने की चीज नहीं, एक परंपरा, एक भावनात्मक जुड़ाव रहे हैं। लेकिन एम्स की चेतावनी ने इस रिश्ते को सोच-विचार की राह पर खड़ा कर दिया है।
जहां कुछ लोग स्वास्थ्य की ओर झुक रहे हैं, वहीं दुकानदार अपने पुराने स्वाद को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन व्यंजनों की चमक फिर से लौटेगी या हेल्दी विकल्प उन्हें हमेशा के लिए रिप्लेस कर देंगे।




