78 साल में जोधपुर की समस्याओं को नासूर बनने से नहीं रोक पाई सरकारें…. हाईकोर्ट में जनहित याचिका इस बात की गवाह हैं… अख़बार कह रहे हैं अफसर सरकार को क्या मुँह दिखाएंगे जबकि लिखना था सरकार जनता को क्या मुँह दिखाएगी….
राखी पुरोहित. जोधपुर
स्वतंत्रता की 78वीं वर्षगांठ एक गौरवपूर्ण अवसर है। लेकिन क्या यह जश्न सड़कों पर गड्ढों, नालियों के जाम और प्रशासनिक बेहाली के बीच मनाया जाना चाहिए? राजस्थान सरकार इस वर्ष राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह को जोधपुर में ‘ऐतिहासिक’ बनाने का दावा कर रही है। पर असली तस्वीर कुछ और ही है।
जोधपुर की गलियों में पानी भरा है, सड़कें टूटी पड़ी हैं, और कुत्ते बेतहाशा दौड़ते हैं। अफसरों की नींद अब टूटी है क्योंकि लाल–लाल बत्ती वाले मंत्रीगण आने वाले हैं। पर क्या जनता इस दिखावे को स्वीकारेगी? क्या तीन बार रह चुकी गहलोत सरकार अपनी विफलताओं पर पर्दा डाल पाएगी? और क्या भजनलाल जैसे अनुभवहीन मुख्यमंत्री भविष्य की कोई तस्वीर गढ़ पाएंगे?
आजादी का जश्न और जोधपुर की गुलामी
स्वतंत्र भारत के 78 वर्षों में राजस्थान की सरकारें सिर्फ़ सत्ता की कुर्सी बदलती रहीं – हालात नहीं। जोधपुर, जो कभी मारवाड़ की शान रहा, आज प्रशासनिक और राजनीतिक लापरवाही की गंदी मिसाल बन चुका है। तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत – जिनका खुद का गढ़ जोधपुर है – क्या यहां की इस हालत के लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं? वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद न साफ पानी, न सीवरेज सिस्टम, न ट्रैफिक प्लानिंग – आखिर किस मुंह से वे अब यहां की जनता का सामना करेंगे?
गहलोत का जोधपुर विकास मॉडल सिर्फ़ कागज़ों पर रहा। असल में जोधपुर की जनता को आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। मुख्यमंत्री रहते हुए गहलोत ने केवल घोषणाएं कीं – ज़मीन पर नतीजे न के बराबर रहे।
कुत्तों का राज, अफसरों की चुप्पी
ताजा हालात पर नज़र डालें तो जोधपुर में आवारा कुत्तों का आतंक इतना बढ़ चुका है कि लोग सड़कों पर निकलने से डरने लगे हैं। स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों के बीच अगर सबसे बड़ी चुनौती कुछ है तो वह है – कुत्तों को काबू में लाना। अफसरों की मानें तो वे अब ‘डॉग कैचिंग’ स्क्वॉड बना रहे हैं, लेकिन सवाल ये है कि पिछले वर्षों में ये कुत्ते कहां से आए और किसने इन्हें पालने दिया?
कई मामलों में मासूम बच्चे घायल हुए हैं, महिलाएं डर के मारे अकेली सड़कों पर नहीं निकलतीं। क्या यह किसी उन्नत प्रशासन का संकेत है? या फिर यह सरकार की बेशर्मी है कि वह सिर्फ़ दिखावे के लिए शहर को सजाने में जुटी है?
भजनलाल: अनुभवहीनता की नई सियासत
अब बात वर्तमान सरकार की करें – मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा एक युवा चेहरा ज़रूर हैं, लेकिन अनुभवहीनता उनके हर निर्णय से झलकती है। भजनलाल के पास न तो ज़मीनी समझ है, न ही प्रशासनिक पकड़। उनका ध्यान सिर्फ़ पार्टी के हाईकमान को खुश रखने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने में लगा है।
जोधपुर की बदहाली के बीच भजनलाल सरकार की कोई विशेष योजना नज़र नहीं आती। ना कूड़ा निस्तारण का हल, ना ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार, और ना ही आवारा पशुओं के लिए कोई रणनीति। क्या भजनलाल इस राज्य को केवल “प्रोटोकॉल” और “पायलटिंग” से चलाना चाहते हैं?
शहर की हालत: 360 डिग्री गंदगी का नज़ारा
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर यदि आप जोधपुर की गलियों में निकलें, तो हर नुक्कड़ पर आपको गंदगी के ढेर, बहते नालों, टूटी सड़कों और जाम में फंसे लोग मिलेंगे। अस्पतालों तक जाने वाली एंबुलेंस तक ट्रैफिक में फंसी हुई हैं। बारिश में ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल है। हाल ही में सुभाष चौक पर एक बुजुर्ग गड्ढे में गिर पड़ा और समय पर उसे मदद नहीं मिल सकी।
गहलोत सरकार ने स्मार्ट सिटी योजना के नाम पर करोड़ों खर्च किए, लेकिन नतीजे सिफर। अब सवाल उठता है – क्या सरकार सिर्फ़ योजनाएं बना कर मीडिया में सुर्खियां चाहती है या असल में जनता की चिंता भी उसके एजेंडे में है?
राजनीति की गंदी बुनियाद पर जश्न की रंगोली?
आज़ादी के अमृत महोत्सव पर जब देश ‘विकसित भारत’ की कल्पना कर रहा है, राजस्थान में जश्न की तैयारी एक सड़ी हुई प्रशासनिक व्यवस्था के ऊपर चादर बिछाने जैसी है। गहलोत की ‘सत्ता की भूख’ और भजनलाल की ‘अनुभवहीनता’ ने मिलकर जोधपुर को एक प्रयोगशाला बना दिया है – जिसमें न नीति है, न नीयत।
यह सवाल अब आम जनता का है – क्या सरकारें सिर्फ़ जश्न मनाने के लिए हैं? क्या जोधपुर जैसा शहर, जहां पर्यटन से अरबों का राजस्व आता है, ऐसे दुर्दशा का पात्र है?
जनता पूछ रही है – अब तक क्या किया?
आख़िर कौन ज़िम्मेदार है कि आज जोधपुर के बच्चे खुले सीवर के ढक्कन में गिर जाते हैं, महिलाएं सड़क पर चलते-चलते गिरती हैं, और व्यापारी अपनी दुकानों में बरसात का पानी भरने से परेशान हैं?
सरकार को यह जवाब देना ही होगा कि जोधपुर में पिछले 25 वर्षों में क्या ठोस काम हुए? गहलोत, जिन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री रहते हुए इस शहर की अनदेखी की, क्या उन्हें माफ़ कर दिया जाए? और भजनलाल – जो अभी भी सीखने के मोड में हैं – क्या उन्हें यह कुर्सी मिलनी भी चाहिए थी?
सरकार को नहीं, जनता को अब तय करना है
इस स्वतंत्रता दिवस पर केवल झंडा फहराना और भाषण देना काफी नहीं। अब वक्त है जनता को जागने का। अगर गहलोत जैसे ‘तजुर्बेदार’ और भजनलाल जैसे ‘शुरुआती’ नेता ही विकल्प हैं, तो यह लोकतंत्र का मज़ाक है। आज जरूरत है ऐसे नेतृत्व की जो न केवल बोल सके, बल्कि काम करके दिखाए।
स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ आज़ाद हवा में सांस लेना नहीं, बल्कि उस हवा को साफ़ रखने की व्यवस्था करना भी है। सरकारें आती-जाती रहेंगी, पर जनता की समस्याएं अनदेखी नहीं होनी चाहिए।
तो क्या अब भी सरकार को जनता से नज़र मिलाने का अधिकार है? शायद नहीं। लेकिन जवाबदेही ज़रूरी है – और इस बार जनता जवाब माँगने को तैयार है। हमें जवाब अफसरों से नहीं सरकार से चाहिए… जोधपुर से हर जागरूक व्यक्ति सरकार को पत्र और साथ में सुझाव लिखें और 15 अगस्त से पहले समस्याओं का समाधान ना हो तो ऐसी सरकार का बहिष्कार करें…
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