डी.के. पुरोहित. ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
हे ईश्वर,
सादर वंदन।
तुम्हारे इस विराट सृजन में मेरी छोटी-सी कलम से निकले शब्द तुम्हारे चरणों में समर्पित कर रहा हूं। यह पत्र लिखते समय मेरे हृदय में भावनाओं का सैलाब उमड़ रहा है और मन के भीतर एक याचना, एक पुकार बार-बार उठ रही है—“हे ईश्वर! आंसू इतने महंगे कर दो कि किसी की आंखों में आ न सकें, और हंसी इतनी सस्ती कि हर किसी के होंठों पर हरदम बनी रहे…”
हे प्रभु,
मनुष्य ने बहुत कुछ पाया है, लेकिन बहुत कुछ खो भी चुका है। विज्ञान ने चांद पर बस्तियां बसाने के सपने को साकार किया, मगर धरती पर रिश्तों के बीच पुल बनाना भूल गया। तकनीक ने सूचनाओं की रफ्तार को हवा से भी तेज बना दिया, मगर भावनाओं की ऊष्मा को ठंडा कर दिया।
इस पत्र को लिखने का कारण वही गूढ़ यथार्थ है—जिसे देखकर मेरी आत्मा कांप उठती है, मेरी कलम रोने लगती है, और मेरा मन तुम्हारी ओर पुकार उठता है।
हे ईश्वर, क्यों नहीं रोशनी फैलती उन आंखों में जो हर रात गीली तकियों पर कटती हैं?
कभी बचपन में सुना था, मां कहती थी—”बेटा, जब तू रोता है, तो भगवान भी दुखी हो जाते हैं।”
आज सोचता हूं—क्या भगवान अब दुखी नहीं होते?
क्योंकि आज तो हर चेहरा या तो रोता है या मुस्कान की नकाब ओढ़े रोने का अभिनय कर रहा है।
बाजार में हंसी बिक रही है, और आंसू लुट रहे हैं।
कभी-कभी लगता है कि तुमने इंसानों को आंखें दी थीं ताकि वो एक-दूसरे की पीड़ा को पहचान सकें, मगर अब वो आंखें स्मार्टफोन के स्क्रीन में गुम हो गई हैं।
हंसी-ठिठोली, जो पहले चौपालों, आंगनों और छज्जों पर बजती थी, अब इंस्टाग्राम रील्स के नीचे की वर्चुअल इमोजी तक सीमित रह गई है।
हे प्रभु! आंसू इतने महंगे कर दो कि कोई afford ही न कर सके दुख…
तुम तो त्रिकालदर्शी हो।
तुम जानते हो कि एक विधवा मां की आंखों से गिरा हर आंसू केवल जल नहीं होता—वो जीवन का टुकड़ा होता है।
एक परित्यक्त वृद्धाश्रम में बैठी बूढ़ी दादी के पलक से गिरे आंसू में केवल नमक नहीं होता—वह तो स्मृतियों की राख होती है।
जब एक बच्चा अपने पिता से इसीलिए डांट खाता है क्योंकि उसकी फीस भरने के लिए वो समय पर पैसे नहीं भेज पाया,
जब एक किसान कर्ज में डूबकर जहर पी लेता है,
जब एक बेटी अपने सपनों को ससुराल की चारदीवारी में दफन कर देती है,
जब एक सैनिक शहीद होकर लौटता है और उसकी पत्नी की आंखें नम होती हैं—
तो क्या तुम्हारे पास इन आंसुओं की कोई गिनती नहीं?
हे ईश्वर, आंसुओं को इतना महंगा कर दो कि लोग उन्हें बचाकर रखें, उन्हें यूं सस्ता ना बहाएं।
दुखों को इतना कठिन बना दो कि लोग एक-दूसरे का सहारा बनने लगें, उन्हें बांटने लगें।
और हां… हंसी… इसे तो सस्ती कर दो, प्रभु।
आज हंसी अमीरों के क्लब हाउस में कैद हो गई है।
आज ठहाके महंगे हो गए हैं, कॉमेडी शो की टिकट लगती है, ‘लाफ्टर थेरेपी’ के नाम पर पैसे लिए जाते हैं।
क्या यह हंसी की अवमानना नहीं?
हे भगवान, तुमने इंसान को सबसे सुंदर तोहफा यही दिया था—हंसने की शक्ति।
क्यों नहीं वह तोहफा आज आम है?
क्यों एक गरीब मां अपने बच्चे की मुस्कान के लिए मिर्ची की रोटी खिलाकर कहती है, “खा ले बेटा, यह तो चॉकलेट है…”
और वह मासूम मुस्कुरा देता है।
हे ईश्वर, हंसी को इतना सस्ता कर दो कि सड़क पर चलने वाला मजदूर भी मुस्कुरा सके,
भीख मांगती आंखों में भी उम्मीद की झलक हो,
और भूख की पीड़ा से सिसकती झुग्गियों में भी कोई गीत बज सके।
हे ईश्वर, ये कैसा दौर है…?
यह दौर रिश्तों का “रिक्वेस्ट पेंडिंग” होने का दौर है।
यह दौर “ब्लॉक” और “अनफ्रेंड” का दौर है।
यह वह युग है जिसमें बेटे पिता को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, बहनें मायके आने से पहले दस बार सोचती हैं कि “अब बाबुल घर में अकेला है या नहीं…”
एक बेटा अपने घर की दहलीज़ पर भी ‘कैरियर’ की वजह से दो साल बाद आता है।
और एक लड़की के लिए ‘मायका’ केवल फेसबुक एल्बम का नाम भर बनकर रह गया है।
प्रभु!
कभी राखी का धागा सिर्फ कलाइयों में नहीं, आत्मा से आत्मा को जोड़ता था।
अब वही राखी भी ऑनलाइन भेजी जाती है।
कभी सावन का झूला पेड़ों पर नहीं, मोबाइल स्क्रीन पर झूलता है।
क्या यह तरक्की है या विघटन?
परमेश्वर! एक बार फिर लौट आओ…परंपरा की उस गली में…
जहां मां थाली सजाकर बेटी के स्वागत में खड़ी होती थी।
जहां भाई राखी के दिन छुट्टी लेकर बहन के घर जरूर पहुंचता था।
जहां ‘संस्कार’ केवल पाठ्यक्रम नहीं, जीवन का सार होता था।
जहां रोने वालों को चुप कराने के लिए पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था।
हे प्रभु, अब भी देर नहीं हुई है…
तुम्हारे एक संकेत से धरती पर हरियाली आ सकती है,
तुम्हारे एक आशीर्वाद से पत्थर में भी प्राण फूंक सकते हो।
तो फिर क्यों नहीं आज के मनुष्य के भीतर हंसी का झरना फूटता?
क्यों नहीं तुम ऐसे मन बना दो, जो दूसरों की आंख में आने वाले आंसुओं को रोक सके, उन्हें सहेज सके?
क्यों न तुम अपने आशीष से
हर पिता के कांपते कंधों में फिर से बेटी का हाथ रख दो,
हर मां की गोद में फिर से बेटे की मासूम नींद भर दो,
हर बहन के हाथ में भाई की मजबूत कलाई लौटा दो?
हे ईश्वर, तुमने ये संसार रचा… धन्य हैं हम…
तुम्हारी बनाई ये धरा—ये वृक्ष, ये नदियां, ये पहाड़, ये फूल, ये चिड़ियों की चहचहाहट—सब कुछ अनुपम है।
तुम्हारे इस विराट रंगमंच पर मनुष्य एक अद्भुत पात्र है।
तुम्हारे इस लीला-संसार में दुख-सुख दोनों तुम्हारी रचना हैं, पर हे प्रभु,
क्या तुम्हारी सृष्टि का उद्देश्य केवल जीवित रहना था या जीना भी सिखाना था?
तुम्हारे नाम पर धर्म बने, संप्रदाय बने, आस्थाएं बनीं—but where is the अनुभव of your love?
Where is the spontaneous laughter that springs from the soul?
Where is the unbroken chain of compassion?
हे प्रभु! मेरी अंतिम विनती सुनो…
तुमसे कुछ नहीं चाहिए—
न सोना, न रत्न, न यश, न वैभव…
बस इतनी कृपा करो कि—
आंसू इतना महंगा हो कि कोई उसे खर्च करने की हिम्मत न जुटा सके,
और हंसी इतनी सस्ती, इतनी सरल, इतनी सहज हो जाए कि हर जीव, हर प्राणी, हर मनुष्य, हर कोना उससे भर जाए।
तुम्हारा साधक
डी.के. पुरोहित
ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर




