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Thursday, July 9, 2026, 12:19 am

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‘रख भरोसा खुद पर, क्यों ढूँढता है फरिश्ते?’… भारतीय सेना का नया अभियान : खुफिया, निगरानी और ड्रोन प्रतिकार में पक्षियों को शामिल किया जा रहा है

आने वाले समय में जलचर, नभचर, थलचर का उपयोग सेना और सुरक्षा एजेंसियों में वृहद स्तर पर शुरू होने जा रहा है…भारतीय सेना अब बीते जमाने की नहीं रही, कोई भी दुश्मन देश हम पर आंख उठाकर नहीं देख पाएगा…क्योंकि ये भारत है…नया भारत जो विश्व गुरु भी है और विश्व की सामरिक ताकत भी…राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर डीके पुरोहित की विशेष स्टोरी…
डीके पुरोहित. नई दिल्ली

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर चर्चा हो रही है कि भारतीय सेना अब कबूतर, चिड़िया, बाज, मैना, कोयल जैसी विभिन्न पक्षियों को “ट्रेंड” कर रही है, ताकि इनकी मदद से गुप्त सूचनाएं इकट्ठा की जाएं, आतंकवादी ठिकानों का पता लगाया जाए और दुश्मन देशों की गतिविधियों पर नजर रखी जाए। कई लेखों में बताया जा रहा है कि यह अमर—”पक्षियों के पास नक्शे नहीं होते, लेकिन फिर भी रास्ता ढूंढ लेते हैं”—की पंक्तियों पर आधारित एक नया ‘पक्षी‑दल रणनीति’ तैयार की जा रही है।

लेकिन सवाल बड़ा है—क्या यह पूरी तरह सही है, या अफवाहों पर आधारित चमकीली कल्पना? राइजिंग भास्कर की टीम ने इस विषय पर विस्तृत अनुसंधान किया और पाया कि कुछ हद तक हकीकत है—लेकिन पूरी कहानी बिल्कुल वैसी नहीं है जैसा सोशल मीडिया बता रहा है

तथ्य क्या बताते हैं? पक्षियों का उपयोग: आधिकारिक जानकारी
(a) ड्रोन ढ़ेर करने में पक्षियों की भूमिका

सबसे पहले यह स्पष्ट है कि भारतीय सेना और अन्य सुरक्षा बल काले बाज (black kite) तथा शिकार पक्षियों को ड्रोन पकड़ने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं।

  • रिमाउंट वेटरनरी कॉरप्स (RVC), मेरठ, ने 2020 से ब्लैक ईगल्स और काइट्स को प्रशिक्षित करना शुरू किया, ताकि वे दुश्मन के छोटे‑अपरिचित ड्रोन (quadcopter, UAV) को पहचानें और उसे हवा में गिरा सकें। 

  • नवंबर 2022 में अकेले ड्रोन प्रतिकार की पहली सार्वजनिक डेमॉन्ट्रेशन भारतीय‑अमेरिकी संयुक्त अभ्यास युक्त अभ्यास (Yudh Abhyas) में ऑली, उत्तराखंड में हुई, जहाँ एक ब्लैक काइट “अर्जुन” नामक पक्षी ने एक ड्रोन को हवा में गिरा दिया था। 

  • इसके संचालन में ड्रोन की पहचान और उसे हवा से नीचे गिराने तक के कई अभ्यास किए गए; स्रोतों के अनुसार कई सौ ड्रोन अब तक पक्षियों ने प्रशिक्षण के दौरान टारगेट करके गिराए हैं, और अभी तक इन्हें चोट नहीं आई है क्योंकि ड्रोन छोटे फलक वाले होते हैं।

  • (b) निगरानी‑चालित उपयोग: कैमरे वाले पक्षी
  • वही RVC यह भी प्रशिक्षण दे रहा है कि इन पक्षियों के सिर पर मिनी कैमरे लगाकर उन्हें रूस की तरह मैदान की निगरानी करने वाला ’लिव कैमरा ड्रोन’ बनाया जाए।

  • हालांकि अभी तक लाइव फ़ीड क्षमता सीमित है, लेकिन पक्षी अपनी निगरानी के दायरे में चलते समय सारा दृश्य रिकॉर्ड कर सकते हैं, जिसका डेटा बाद में विश्लेषण के लिए उपयोग किया जा सकता है। 

  • स्रोतों के अनुसार ये पक्षी स्वाभाविक रूप से अपनी सीमित क्षेत्र में उड़ते हैं लेकिन धीरे‑धीरे उनका “टेरिटरी सर्किल” बढ़ता है, जिससे वे व्यापक क्षेत्र में निगरानी कर सकते हैं। 

(c) पक्षी‑प्रशिक्षण की प्रेरणा और इतिहास
  • इस पहल की प्रेरणा मिली थी नीदरलैंड्स (Netherlands) की उस परियोजना से, जहाँ पुलिस ने पहले eagles trained by “Guard from Above” नामक संस्था के माध्यम से ड्रोन को मार गिराने का प्रयोग किया। 

  • हालांकि नीदरलैंड्स ने बाद में इस प्रयोग को आर्थिक व पक्षियों की चोट की वजह से बंद कर दिया, भारतीय प्रयोग अब धीरे‑धीरे संचालित हो रहा है, RVC और रक्षा स्रोतों की देखरेख में। 

क्या भारतीय सेना सभी पक्षियों को ट्रेंड कर रही है—कैसा सच?

सोशल मीडिया पर कई लेखों में यह व्यापक दावा किया गया है कि कबूतर, मैना, कोयल आदि आम पक्षियों को भी ‘ट्रेंड’ किया जा रहा है, और एक बड़े गुप्त पक्षी‑बेल्ट के ज़रिए गुप्त जानकारी इकट्ठी की जाएगी। लेकिन सतह पर उपलब्ध सरकारी या रक्षा‑स्रोतों में इस प्रकार के प्रयोग का कोई सबूत नहीं मिला।

  1. मौजूदा आधिकारिक परियोजना सीमित है—केवल ब्लैक काइट्स, ईगल्स और फाल्कन्स तक। अन्य स्थानीय पक्षियों का कोई स्पष्ट प्रशिक्षण अभियान अभी सार्वजनिक रूप से नहीं बताया गया है।

  2. कोयल, मैना जैसे पक्षी वहिमाओं के केंद्र में हैं—जो सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों में प्रमुख हैं, पर वास्तविक विज्ञान या रणनीति में अभी तक उनका कोई उल्लेख नहीं।

  3. इस बात का कोई भरोसेमंद स्रोत नहीं जो पुष्टि करे कि भारतीय सेना कबूतर‑पक्षियों से पारंपरिक संदेश पहुँचाने जैसे काम फिर से प्रारंभ कर रही हो (जैसे WW‑II की फेमस homing pigeons)। केवल ड्रोनों के खिलाफ प्रायोगिक परियोजना सामने आई है।

सुरक्षा खुफिया के नए आयाम: पुराना नया मिलन
(a) विश्व‑इतिहास में पक्षियों की भूमिका
  • द्वितीय विश्वयुद्ध की सबसे शुरूआती खुफिया प्रणालियों में homing pigeons शामिल थे; ब्रिटिश और अमेरिकी एजेंसियों ने इन्हें संदेशवाहक और प्रत्यक्ष संपर्क माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया था। कई बार गुप्त एजेंट बेस से पोल्ट्री के पिंजरे में इन्हें भेजा जाता था, जिनके पास कोडेड संदेश होते थे। 

  • आधुनिकीकरण के बावजूद इस तकनीक के आधारभूत सिद्धांत अटूट हैं: तेज गति, प्राकृतिक ओरिएंटेशन, और मनुष्य से दूरी बनाए रखना।

(b) ड्रोन‑रिपोर्टिंग और सुरक्षा की जरूरत
  • पंजाब, जम्मू-कश्मीर और राजस्थान सहित हिस्सों में स्थिर ड्रोन गतिविधियों में वृद्धि हुई है—ड्रग्स, नकदी, हथियारों की तस्करी के लिए पाकिस्तानी और अन्य स्रोत से ड्रोन आते हैं। 

  • BSF और सेना ने रिपोर्ट किया है कि 2022-2023 में 100 से अधिक ड्रोन को रोका गया या गिराया गया; यही कारण है कि एक कम‑टेक, लेकिन असरदार पक्षी‑दल विकल्प के रूप में सामने आया है।

नीति, नैतिकता और विवाद: पक्षी‑प्रशिक्षण के सवाल
(a) पक्षी संरक्षण नियम और अनुमति
  • इन पक्षियों का उपयोग Wildlife Protection Act के तहत आता है—उदाहरण के तौर पर, Telangana Police की ‘Garuda Squad’ में तीन चूजों को Forest Department की अनुमति से Training Academy में शामिल किया गया था। 

  • RVC द्वारा उपयोग किए जाने वाले पक्षी rescued rescue किए गए थे—उनका पुनर्वास केन्द्र से चयन हुआ, इसलिए कोई अवैध पक्षी‑उत्पादन या तस्करी नहीं।

(b) पक्षी खतरे में? घायल हो सकते हैं?
  • नीदरलैंड्स ने यह प्रयोग छोड़ दिया क्योंकि ड्रोन के तेज स्पिनर से पक्षियों को चोटें लगने की संभावना थी।

  • भारतीय RVC का दावा है कि अब तक किसी पक्षी को प्रशिक्षण में गंभीर चोट नहीं आई है क्योंकि वे छोटे ड्रोन से प्रशिक्षण ले रहे हैं। 

  • लेकिन आलोचकों का कहना है—यदि यह प्रयोग बड़े पैमाने पर लागू हुआ, तो पक्षियों की रक्षा, भोजन, स्वास्थ्य देखभाल आदि में गंभीर नैतिक और प्रबंधन चुनौतियाँ होंगी।

(c) गोपनीयता, निगरानी और मानवाधिकार
  • Surveillance के लिए कैमरा फिट करना तेज‑तर्रार तकनीक लग सकती है, लेकिन इसका दायरा और डेटा सुरक्षा नीतियाँ स्पष्ट नहीं हैं।

  • यदि ये पक्षी आतंकवादी ठिकानों या सीमापार गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करें, तो उस डेटा की गोपनीयता और इस्तेमाल सीमाएं क्या होंगी?—यह अभी सार्वजनिक जानकारी में स्पष्ट नहीं।

भविष्य‑दृष्टि: क्या ‘पक्षी‑दल’ रणनीति देश‑विदेश में चर्चा बनेगी?
(a) सेना की रणनीति में नया आयाम
  • भारत के AI‑ड्रोन‑काउंटर सिस्टम जैसी ‘AkashTeer’ (एआई‑सक्षम एयर डिफेंस) और सुरक्षा‑सैटेलाइट योजनाओं के साथ यह पहल एक hybrid intelligence architecture का हिस्सा दिखती है। 

  • पक्षियों का उपयोग ‘low‑tech, low‑cost’ विकल्प नहीं बल्कि एक प्राकृतिक जोड़ाव है जिससे सीमित लेकिन मौलिक खुफिया जानकारी जुटाई जा सके।

(b) अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
  • दुनिया में पहले नीदरलैंड्स, फ्रांस, और ब्रिटेन जैसी जगहों पर इस प्रयोग को देखा गया, लेकिन बाद में नीतिगत चिंताओं व पक्षियों की सुरक्षा कारणों से बन्द कर दिया गया। 

  • अब भारत ने इसे फिर से अपनाने का निर्णय लिया है, जो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चर्चाओं में एक ध्यानाकर्षण विषय बन सकता है।

(c) सार्वजनिक, मीडिया और संसद का फोकस
  • यदि रिपोर्टें आलोचनात्मक रूप से सामने आईं, तो मीडिया, रक्षा‑विशेषज्ञों और नागरिक अधिकार संगठनों द्वारा ‘पक्षी‑अधिकार’, प्रयोग की नैतिकता, और सेना‑निगरानी कार्यप्रणाली पर संसद में चर्चा होने की संभावनाएँ बढ़ेंगी।

  • ज़मीनी स्तर पर राज्य सरकारों (जैसे Telangana, Uttar Pradesh में RVC) को पक्षी‑प्रशिक्षण और उपयोग की पारदर्शी रिपोर्ट सार्वजनिक करनी होगी।

पंछियों के साथ भारत की नई उड़ान

“रख भरोसा खुद पर, क्यों ढूंढ़ता है फरिश्ते?”—यह प्रश्न अब भारतीय रक्षा नीति में परिवर्तन का प्रतीक बनता दिखता है। जहां तकनीकी हथियार (AI, drone, satellite) सीमाओं की निगरानी कर रहे हैं, वही पक्षियों जैसा प्राकृतिक तत्व इस जटिल प्रणाली में एक साधारण लेकिन भरोसेमंद साथी के रूप में उभर रहा है।

कुल मिलाकर:

  • खुफिया‑निगरानी में पक्षियों का उपयोग सीमित रूप में वैज्ञानिक और रणनीतिक आधार पर हो रहा है।

  • यह अभी पूरी तरह संचालन में नहीं आया—प्रशिक्षण चरण में है, पक्षियों को व्यापक रूप से तैनात नहीं किया गया है।

  • सोशल मीडिया पर उड़ रही पारंपरिक कबूतर‑विषयक अफवाहें गलत दिशाओं में हैं—उनका कोई ठोस आधार नहीं।

  • लेकिन ड्रोन‑विरोधी पक्षी‑दल (ब्लैक काइट, बाज, ईगल) की मौजूदगी अब स्थापित हो चुकी है।

  • इस रणनीति की नैतिकता, पक्षी सुरक्षा और डेटा गोपनीयता की चुनौतियां आने वाले वक्त में व्यापक रूप से संसद‑मंच, मीडिया और नागरिक समुदाय द्वारा पूछी जाएंगी।

(राइजिंग भास्कर की खोज वाली एक्सपोज़ न्यूज़ स्टोरी ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय सेना ‘पक्षियों को अपने बेड़े में लगाने जा रही है’—लेकिन यह सिर्फ कविताओं भर की कल्पना नहीं, बल्कि प्रशिक्षित बाज‑दल का उपयोग ड्रोन खनन और सीमांत निगरानी में हो रहा है। अब सवाल है—ये ‘फरिश्ते’ वास्तविक रूप से कितनी ऊँचाई तक उड़ेंगे? जवाब तो आने वाले अभ्यास और सार्वजनिक रिपोर्टों में होगा।)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor