जीवन की सांझ में अनुबंध से अनुबंध…जहां रिश्ते दोबारा जन्म लेते हैं, और बुढ़ापा सिर्फ एक पड़ाव नहीं, एक गरिमा होती है”
राखी पुरोहित. जोधपुर
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“अनुबंध”… सिर्फ एक शब्द नहीं, यह उस आत्मिक डोर का नाम है जो परमसत्ता से जुड़ी है। हमारी सांसें जब इस अनुबंध को पूरा कर लेती हैं, तो हम वापस वहीं लौट जाते हैं जहां से आए थे। लेकिन इस जीवन की अंतिम संध्या में, जब दुनिया मुंह मोड़ लेती है, कोई तो होना चाहिए जो हाथ थामे… सिर पर साया बने… और कहे – “डर मत, हम हैं ना।”
जोधपुर के निंबा-निंबड़ी क्षेत्र में एक ऐसा ही ठिकाना है — अनुबंध वृद्धजन कुटीर।
नाम सुनते ही लगता है जैसे यह किसी वकील की किताब से निकला कोई शब्द हो, लेकिन इसके पीछे की सोच, भावना और सेवा की प्रतिबद्धता को जानकर आंखें नम हो जाती हैं।
जब हमने अनुबंध वृद्धजन कुटीर की संस्थापक अनुराधा अडवानी से पूछा कि “अनुबंध” ही क्यों?
वे मुस्कुराईं और बोलीं –
“क्योंकि हम सभी किसी ना किसी अनुबंध में जीते हैं। हमने समाज के उन बुजुर्गों के साथ जीवन भर का कमिटमेंट किया है जो अपने ही बच्चों की उपेक्षा, तिरस्कार और अस्वीकार के शिकार हो चुके हैं। हमारा परम कर्तव्य है कि अंतिम सांस तक उनका संबल बनें। यही हमारा अनुबंध है… समाज से, मानवता से और ईश्वर से।”
प्रेम और सेवा की नींव पर खड़ा एक ‘घर’
आज अनुबंध वृद्धजन कुटीर में सौ से अधिक दादा-दादी रहते हैं – कुछ अकेले, कुछ कपल्स में। लेकिन यहां ‘रहना’ नहीं, जीना सिखाया जाता है। अनुबंध वृद्धजन कुटीर में नॉर्थ, ईस्ट, वेस्ट, साउथ…यानी पूरे देश से बुजुर्ग आते हैं। यह पूरी तरह निशुल्क है और यहां जाति, धर्म और मजहब का कोई बंधन नहीं हैं।
यहां हर कमरे में पलंग हैं, टेबल हैं, कुर्सी है, टीवी है, अटैच्ड बाथरूम हैं, हर दिन गरम-गरम खाना, फल, नाश्ता समय पर मिलता है। 20 से अधिक समर्पित स्टाफ है, जो दिन-रात सेवा में तत्पर रहते हैं।
वृद्धजन कुटीर एक सम्मानजनक जीवन का आखिरी ठिकाना है।
यहां मनोरंजन के लिए सुंदरकांड, भजन संध्या, कवि सम्मेलन होते हैं। यहां जन्मदिन और सालगिरहें मनाई जाती हैं — भामाशाह अपने बच्चों को बुजुर्गों के आशीर्वाद दिलवाने लाते हैं।
और मृत्यु…?
जब कोई बुजुर्ग इस संसार से विदा लेता है तो उनका अंतिम संस्कार और अस्थि विसर्जन तक की जिम्मेदारी भी अनुबंध निभाता है। यह सिर्फ सेवा नहीं, एक जीवनदर्शन है।
मेडम यह संस्कारों का शहर है कोई बुजुर्ग नहीं आएगा : मीडिया
हम भी चाहते हैं कोई बुजुर्ग और अपनों का सताया ऐसी जगह ना आएं : अनुराधा.
यह 25 नवंबर 2002 की बात है। अनुराधा अडवानी और उनके पति नरेंद्र अडवानी ने निंबा-निंबड़ी की सुनसान ज़मीन पर चार कमरे बनवाकर अनुबंध वृद्धजन कुटीर तैयार करवाया। विज्ञापन छपवाए – “बुजुर्गों के लिए मुफ्त आवास, भोजन और सेवा…”
उद्घाटन के दिन टेंट लगे, कुर्सियां सजीं, मीडिया को बुलाया गया। मगर…
“मेडम, आप पागल हैं क्या?”
एक पत्रकार हंसा — “जोधपुर संस्कारों का शहर है, यहां कोई नहीं आएगा। वो भी इतना दूर?”
मगर अनुराधा ने कहा —मैं तो खुद चाहती हूं कि कोई अपनों का सताया यहां ना आए, पर
“यह जो मैं कर रही हूं, वो ईश्वर करवा रहा है… इसे दुनिया अब नहीं समझेगी, आने वाला समय ही इसे मान्यता देगा।”
और ठीक उसी दिन, जैसे नियति ने जवाब दे दिया हो।
पहला ‘मेहमान’
टेंट समेटे जा रहे थे, मीडिया जा चुका था… तभी एक 85 साल के बुजुर्ग कांपते पैरों से आते हैं।
हाथ में उस विज्ञापन की कतरन, और आंखों में भूख की जर्जर परछाईं।
“बेटी, दस दिन से भूखा हूं… मंदिरों में प्रसाद खाकर जी रहा था… क्या मुझे खाना मिलेगा?”
अनुराधा ने तुरंत अपनी माताजी विमला मेहता को फोन किया।
मां बोलीं – “बेटी, थोड़ा रुक… मैं आती हूं।”
विमला जी भोजन का टिफिन, गैस चूल्हा, सिलेंडर और राशन लेकर पहुंचीं। क्योंकि अब बुजुर्गों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका था।
उस बुजुर्ग ने भोजन किया, भरपेट खाया और सो गया।
नरेंद्र अडवानी ने फौरन पलंग और गद्दे की व्यवस्था की।
वो पहला ‘मेहमान’ था – अनुबंध का पहला आशीर्वाद।
अनुबंध – एक वृक्ष बनता गया…
धीरे-धीरे विमला मेहता घर से एक्स्ट्रा चीजें जैसे – फ्रीज, टीवी, वॉशिंग मशीन – अनुबंध लाने लगीं। नरेंद्र अड़वानी भी मदद करते रहे।
18 वर्षों तक विमला मेहता ने इस अनुबंध का संचालन कुशलता से किया।
जब उनका निधन हुआ, तो अंतिम यात्रा भी अनुबंध से ही निकली। यही उनकी अंतिम इच्छा थी।
2002 से 2009 तक अनुराधा और नरेंद्र अडवानी ने किसी से कोई आर्थिक सहयोग नहीं लिया।
2010 में मुंबई में अनुराधा अड़वानी को सम्मानित किया गया। वहां पहली बार उनसे पूछा गया –
“इतना बड़ा काम कर रही हैं, सहयोग क्यों नहीं लेतीं?”
उन्होंने कहा –
“कई कपल बुजुर्ग रहना चाहते हैं, पर कपल रूम नहीं हैं।”
तब उनके कजन मामा रंजीतमल लोढ़ा ने सहायता की और कपल रूम्स बनाए गए।
जब पत्थर दिल भी चकनाचूर हो जाते हैं…
अनुराधा अडवानी की किताब ‘यथार्थ से परिचय’ में दो किस्से दिल को चीर देते हैं:
एक:
एक मां ICU में अंतिम सांसें गिन रही थीं। अनुबंध से बेटे को फोन किया गया —
“आपकी मां आपसे मिलना चाहती है।”
बेटा बोला —
“मीटिंग में हूं। सेवा का ठेका लिया है आपने? देख लूंगा आपकी दुकानदारी बंद करवा दूंगा। मेरी पहुंच ऊपर तक है। जानते नहीं मैं कंपनी में जनरल मैनेजर हूं और मेरी अपनी जिम्मेदारी है।”
बेटे की पहुंच पता नहीं कितनी ऊपर तक थी, पर मां बेटे का इंतजार करते-करते ऊपर चली गईं…
दूसरा:
एक बेटा अपनी मां की सारी संपत्ति हड़पकर अनुबंध भेज देता है। कुछ साल बाद उसे पता चलता है कि मां की कलाई में अभी भी सोने की चार चूड़ियां बची हुई हैं।
वह मिलने का बहाना कर आता है और चुपके से चूड़ियां उतारने लगता है।
मां चिल्लाती है, वह एक चूड़ी लेकर भाग जाता है।
अब मां की कलाई में तीन चूड़ी बची हैं…
मां सोचती है —
“अब तीन बार आएगा बेटा… एक-एक कर लेने।”
आधुनिकता के साथ आत्मीयता
आज अनुबंध में:
- सोलर पावर, वॉटर कूलर, CCTV, लिफ्ट
- क्लिनिक, ICU, एंबुलेंस, ऑन–कॉल डॉक्टर्स
- एक्सरसाइज इक्विपमेंट, लाइब्रेरी, टीवी, वॉशिंग मशीन
- हर बुजुर्ग के लिए सम्मानजनक जीवन
डॉ. जगन्नाथ और डॉ. अशोक गहलोत यहां सेवाएं दे रहे हैं।
ओमी और सोनिया जैसे समर्पित युवा मेडिकल और किचन की व्यवस्था संभालते हैं।
अनुबंध: सिर्फ छत नहीं, चरित्र है…
यहां रह रहे अधिकांश बुजुर्ग दृष्टिहीन, लकवाग्रस्त, बीमार और अकेले हैं।
अब अनुबंध पूरी तरह भर चुका है, इसलिए अतिरिक्त जगह पर टीन की छत बनाकर आंगन में बेड लगाए गए हैं।
हर सुविधा है – ठंडा पानी, पंखे, लाइट, फ्रीज…
पर सबसे बड़ी चीज जो है — सम्मान।
एक दृढ़ नारी की चुपचाप क्रांति
अनुराधा अडवानी और उनके पति नरेंद्र ने यह जो पौधा बोया, वह अब वटवृक्ष बन चुका है।
अनुराधा का एक ही लक्ष्य है —
“जब तक सांस है, तब तक सेवा।”
अनुबंध — एक कहानी नहीं, संस्कृति है
जब दुनिया के रिश्ते टूटते हैं,
तब अनुबंध जैसे स्थान उन्हें फिर से जोड़ते हैं।
यह कोई वृद्धाश्रम नहीं — यह अनुबंध वृद्धजन कुटीर है, कुटिया है, वक्त के मारों के लिए जहा जीवन फिर से मुस्कुराता है।
अनुबंध नामक यह उपक्रम हमें याद दिलाता है कि सेवा, प्रेम, और आत्मीयता अगर कोई रूप ले लें, तो वो जोधपुर के निंबा-निंबड़ी की उस इमारत में बसा है, जिसे हम आज अनुबंध वृद्धजन कुटीर कहते हैं।
अगर यह कहानी पढ़ते हुए आपकी आंखें नम हुईं…
तो सोचिए, वहां रह रहे बुजुर्गों की आंखें कितनी बार भीगी होंगी — और फिर अनुबंध ने उन्हें मुस्कुराना सिखाया होगा।












