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Thursday, July 9, 2026, 12:21 am

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नेत्रहीन विकास संस्थान : आंखों में सपनों के समंदर तो सुना है…पर ये वो बच्चे हैं जिनके पास सपनों के समंदर तो है पर आंखें नहीं…दिव्यांग बच्चों के जज्बे का लाइव कवरेज केवल राइजिंग भास्कर में

नेत्रहीन विकास संस्थान के गेट के पास पहुंचे, तब सूरज अपनी अंतिम किरणें फैला रहा था, लेकिन इस संस्थान के भीतर कुछ ऐसे सूरज थे जो हर रोज़ अपने भीतर की लौ से कई ज़िंदगियों को रौशन कर रहे हैं…ये सूरज आसमां में नहीं धरती पर है…आप भी देखें इनकी चमक…

दिलीप कुमार पुरोहित और राखी पुरोहित. जोध्रपुर 

8302316074 diliprakhai@gmail.com

आज का दिन सिर्फ एक रिपोर्टिंग असाइनमेंट नहीं था। यह एक आत्मिक यात्रा थी। एक ऐसा अनुभव, जहां आंखें बंद करके भी सब कुछ साफ़ दिखाई देता है — क्योंकि जो दिखता है, वो बाहरी नहीं, भीतरी होता है।

हम दोनों — मैं, दिलीप कुमार पुरोहित, और मेरी जीवनसंगिनी राखी पुरोहित — जब जोधपुर के शांत मोहल्ले से गुजरते हुए नेत्रहीन विकास संस्थान के गेट के पास पहुंचे, तब सूरज अपनी अंतिम किरणें फैला रहा था। लेकिन इस संस्थान के भीतर कुछ ऐसे सूरज थे जो हर रोज़ अपने भीतर की लौ से कई ज़िंदगियों को रौशन कर रहे हैं। ये सूरज आसमां में नहीं, धरती पर है। …आप भी देखें इनकी चमक…।

पहली झलक: जो आंखों से नहीं, आत्मा से देखी

अभी हमने टैक्सी से बाहर कदम ही रखा था कि एक आवाज़ आई,
“क्या आप दिलीप सर और राखी मैडम हैं?”
हमने पलट कर देखा, सामने एक लड़का खड़ा था — कोई छड़ी नहीं, कोई सहारा नहीं — बस आत्मविश्वास की मुस्कान और मस्तक पर स्थिरता का तेज़।

“हां बेटा, हम ही हैं,” मैंने मुस्कराते हुए कहा।

“चलिए, पूनाराम सर आपका इंतज़ार कर रहे हैं।”
वो बिना किसी हिचकिचाहट के आगे बढ़ा, और हम दोनों उसके पीछे-पीछे चल पड़े। रास्ते भर उसकी चाल में ऐसी समझदारी थी, जैसे उसे हर दीवार, हर मोड़ की पहचान हो।

कक्ष की चौखट पर उम्मीदों का स्वागत

हमने जैसे ही संस्थान की कक्षा में कदम रखा, एक संगीतमय ऊर्जा का अनुभव हुआ। सामने बैठे थे 40 से अधिक बच्चे — कुछ शांत, कुछ उत्साहित, कुछ हंसते हुए और कुछ मन ही मन अपने विचारों में डूबे हुए।

हमने उन्हें अपना परिचय दिया। बच्चों ने बारी-बारी से अपना नाम, गांव, कक्षा और सपना बताया।
सपना? हां, वही जो आंखें देखती हैं — और ये बच्चे दिल की आंखों से देखते हैं।

हमने पूछा —
“बेटा, आप क्या बनना चाहते हो?”

और फिर शुरू हुई सपनों की बारिश:

  • “मैं टीचर बनूंगा…”

  • “मैं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनकर लोगों की सेवा करूंगा…”

  • “मुझे RAS बनना है…”

  • “मैं अपने जैसे बच्चों के लिए स्कूल खोलूंगा…”

इस बातचीत के दौरान, बाबूलाल जाखड़ ने जो कहा, उसने हम दोनों को झकझोर दिया —
“सर, मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूं जब मैं भी शिक्षक बनूंगा और अपने जैसे सैकड़ों बच्चों को पढ़ाऊंगा।”

ब्रह्मा की रचना अधूरी नहीं है

मुकेश सीरवी, एक और छात्र, जिनका सपना कभी वैज्ञानिक बनने का था। उन्होंने बताया,
“अब सोचता हूं कि शिक्षक बनकर विज्ञान को और ज्यादा लोगों तक पहुंचा सकता हूं। बिजली के उपकरण मैं खुद खोलकर जोड़ लेता हूं। ब्रेल की छह बिंदियां तो हमारे लिए ब्रह्मांड से कम नहीं हैं।”

फिर मिला सुरेंद्र कुमार, जो जैसलमेर के खुहड़ी गांव से आए थे। जब हमने पूछा —
“बेटा, आपने ऊंट की सवारी की है?”
तो वो मुस्कराते हुए बोले —
“हां सर, ऊंट ऊबड़-खाबड़ होता है। जब चलता है, तो ऐसा लगता है जैसे आप हवा में लहरों पर बैठे हों। हमारे ताऊजी के घर ऊंटगाड़ी भी है।”

इस जवाब ने बता दिया कि अनुभव के लिए आंखों की ज़रूरत नहीं होती, एहसास काफी होता है।

सेवा की ऊंचाई नहीं, उसकी गहराई मायने रखती है

संस्थान में ऐसे भी बच्चे हैं जो शिक्षक नहीं, बल्कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनना चाहते हैं।
दयाराम सैनी (अलवर) और अणची चौधरी (जालौर) ने कहा —
“हमें कोई शर्म नहीं है इस सेवा में। यह समाज की नींव है। जब स्वामी विवेकानंद शिकागो गए थे और  गीता किताबों के ढेर में सबसे नीचे रखी गई थी और स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि गीता सब धर्मों का आधार है, वैसे ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सेवा, सेवा की आधारशिला है। हम भी समाज की बुनियाद बनना चाहते हैं।”

उनके विचार सुनकर हमें स्वामी विवेकानंद की शिकागो में दी गई स्पीच याद आ गई। शायद वही भाव इस संस्थान में हर बच्चे के भीतर सांस ले रहा था।

पूनाराम विश्नोई: एक शिक्षक, एक प्रेरणा

संस्थान में हमारी मुलाकात पूनाराम विश्नोई से हुई — एक ऐसे शिक्षक, जो 2016 से निशुल्क सेवा दे रहे थे।
उन्होंने बताया —
“मैंने सात साल तक एक भी पैसा नहीं लिया। अब मानदेय देना शुरू किया है, पर बच्चों की मुस्कान ही मेरी असली कमाई है।”

उनकी आंखों में वो चमक थी जो केवल सेवा के आनंद से आती है।

संस्थान का स्वरूप: जहां अधूरेपन में भी संपूर्णता है

नेत्रहीन विकास संस्थान सिर्फ एक इमारत नहीं, एक आंदोलन है।
यहां लगभग 450 बच्चे रहते हैं और पूरे राजस्थान से 1500 से अधिक दृष्टिहीन और अन्य दिव्यांग बच्चे संस्थान की विभिन्न शाखाओं में पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें प्रमुख शाखाएं हैं —

  • श्री पारसमल बोहरा नेत्रहीन महाविद्यालय, चौखा

  • गुरु कृपा मानसिक विमंदित गृह, आंगणवा

  • प्रज्ञा चक्षु केंद्र, फलौदी

  • मूकबधिर स्कूल, श्रीयारी पाली

  • अजय लीला विशिष्ट शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र, जोधपुर

  • आचार्य हस्ती विशेष आवासीय विद्यालय

संस्थान में 45 बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं — इनमें से 30 शिक्षक बनने की राह पर हैं और 15 बच्चे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी बनकर समाजसेवा में उतरना चाहते हैं।

जहां अंधेरा नहीं, प्रकाश का अनुभव होता है

संस्थान की उपलब्धियों की सूची सुनकर कोई भी गर्व से भर उठेगा —

  • अमर जैन — बने जज

  • हिना कल्ला, पूरणसिंह शेखावत — बने RAS

  • डॉ. जसराज शर्मा, डॉ. सुनीता मोहता, अक्षय सुराणा, अविनाश कोठारी — बने असिस्टेंट प्रोफेसर

  • अक्षय सुराणा — संस्कृत में गोल्ड मेडलिस्ट

  • युगल जैन — बने वकील

  • ओमाराम मेघवाल, राजाराम चौधरी — बने हेड मास्टर, सुरेश नागर, प्रकाश खींची, डॉ. श्यामदेव विश्नोई, गणेश देवड़ा, अनूप शेखावत, डॉ. कर्मवीर सिंह राठौड़ और राजा शर्मा प्रिंसिपल बन चुके हैं।

  • अंबालाल गुर्जर — बने बैंक PO और अंतरराष्ट्रीय पैरा खेलों में सर्वाधिक गोल्ड मेडलिस्ट। प्रदीप सिंह और सोनिया चौहान भी बैंक पीओ बन चुके हैं। इन बच्चों की बातों में कोई हिचक नहीं थी — बल्कि ऐसा आत्मविश्वास था, जो किसी भी साधारण बच्चे से कहीं अधिक सशक्त था।

संस्थान की सुविधाएं: संपूर्ण विकास की ओर एक कदम

यहां हर सुविधा इस तरह तैयार की गई है कि बच्चों को अपने सपनों को आकार देने में कोई कमी न रहे।

  • सुबह का नाश्ता, दोपहर का भोजन, चाय और रात का खाना — नि:शुल्क

  • कॉलेज के लिए ट्रांसपोर्ट

  • यूनिफॉर्म

  • कंप्यूटर शिक्षा

  • होम साइंस

  • उद्योग कक्षाएं

  • खेल: एथलेटिक्स, स्वीमिंग, गोला फेंक, कबड्डी, क्रिकेट, रस्साकसी आदि

  • अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए प्रशिक्षण और प्रोत्साहन

कई छात्र मलेशिया, इंग्लैंड, मैक्सिको, अमेरिका तक जाकर देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।

संस्थान का परिचय संक्षेप में 

15 अगस्त 1977 को सुशीला बोहरा ने 2 दिव्यांग बच्चों के साथ बागर चौक घंटाघर में एक मंदिर में स्कूल की नींव रखी। अभी यह दिव्यांग बच्चों का वट वृक्ष बन चुका है और कई शाखाएं चल रही हैं। यह राजस्थान का सबसे बड़ा दिव्यांग बच्चों का केंद्र हैं। अध्यक्ष सुशीला बोहरा, पूर्व प्रिंसिपल स्व. नरेश कुमार जैन, वर्तमान प्रिंसिपल सलमा अरोड़ा और डॉ. इंद्रराज शर्मा को राष्ट्रपति अवार्ड भी सेवा कार्य के लिए मिल चुका है। संस्थान में संगीत शिक्षक पंकज टेलर की सेवाओं को भी स्टूडेंट्स पसंद करते हैं।

अनुभव जो आंखों में नहीं, हृदय में उतरता है

इस पूरे संवाद के बाद जब हम विदा लेने लगे तो एक बच्ची ने पूछा —
“सर, क्या आप फिर आएंगे?”
हम दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा।
“जरूर बेटा, जरूर आएंगे। तुम जैसे बच्चों से मिलने का मौका बार-बार नहीं मिलता।”

हम संस्थान से लौट तो आए, लेकिन दिल वहीं छूट गया। आंखें नम थीं, लेकिन हृदय गर्व से फूला हुआ।


आज हमने महसूस किया — जो बच्चे ‘अधूरे’ कहलाते हैं, वे ही इस दुनिया को पूरा करने की सबसे बड़ी ताकत हैं।
वे संघर्ष करते हैं, लेकिन हारते नहीं।
वे बिना आंखों के रोशनी लाते हैं।
वे गिरते हैं, लेकिन संभलकर फिर खड़े हो जाते हैं।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor