10 लाख से अधिक लोगों को सीपीआर की ट्रेनिंग दे चुके, 200 से अधिक जानें बचा चुके…देश में सीपीआर मैन के नाम से प्रसिद्ध प्रोफेसर राजेंद्र तातेड़ से राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित की विशेष भेंटवार्ता…
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राइजिंग भास्कर : प्रो. राजेंद्र तातेड़ से सीपीआर मैन की यात्रा कैसे शुरू हुई?
प्रो. तातेड़ : मेरे 32 साल के पुत्र साॅफ्टवेयर इंजीनियर शैलेष को पुणे में सीने में तेज दर्द उठा। मैं जोधपुर में था। हार्ट अटैक समझकर शैलेष को अस्पताल ले गए। 21 फरवरी 2014 को उसकी सडन मौत हो गई। मैं प्रिवेंटिव मेडिसिन में 36 साल तक अध्यापन और उमेद अस्पताल में । मैं समझ गया कि यह हार्ट अटैक नहीं बल्कि कॉर्डियक अरेस्ट था। शैलेष के पास मौजूद किसी व्यक्ति को यह मालूम होता कि सीपीआर देकर उसकी सांसे वापस लाया जा सकता है। तो मुझे अपना जवान बेटा नहीं खोना पड़ता। मैंने और मेरे छोटे बेटे डॉ. अभिषेक तातेड़ (वरिष्ठ फिजिशियन मेडिपल्स अस्पताल) ने ठान लिया कि हमने शैलेष को खोया, पर कोई और परिवार का चिराग ऐसे ना बुझे, इसलिए हम निकल पड़े सीपीआर के प्रति समाज और देश को जागरूक करने की यात्रा पर। प्रो. तातेड़ ने बताया कि एक भजन है- सांसों का क्या भरोसा रुक जाए चलते-चलते…हम कहना चाहेंगे कि वक्त पर सीपीआर मिले तो जी जाए हंसते-हंसते…।
राइजिंग भास्कर : क्या वाकई यात्रा इतनी आसान थी? राह में क्या कठिनाइयां आईं?
प्रो. तातेड़ : कोई भी नया काम शुरू करना आसान नहीं होता। जब यात्रा की शुरुआत होती है तो मंजिल कई बार पता नहीं होती। ऐसा तो है नहीं कि जोधपुर से जयपुर जाना है जो सात-आठ घंटे में पूरी हो जाए। सीपीआर को लेकर लोगों को जागरूक करना हथेली पर सरसों उगाने जैसा था। लोगों को कार्डियक अरेस्ट के बारे में समझाना ही मुश्किल होता था तो सीपीआर तकनीक के बारे में कैसे समझाते। जुलाई 2014 में शैलेष तातेड़ सीपीआर जागरूकता और प्रशिक्षण मुहिम कार्यक्रम की शुरुआत की। मैं दैनिक भास्कर के मुकेश माथुर, अरविंद चोटिया, मनोज वर्मा, प्रमोद दवे से मिला। अपनी योजना साझा की और वहां से हमारी यह यात्रा शुरू हुई। किसी भी योजना को धरातल पर लाने में मीडिया की बड़ी भूमिका होती है। आज अगर मुझे देश सीपीआर मैन के रूप में जानती है तो उसमें मीडिया की बड़ी भूमिका है।
राइजिंग भास्कर : अब जरा कॉर्डियक अरेस्ट के बारे में बताएं?
प्रो. तातेड़ : आपने सुना या देखा होगा कि एक स्वस्थ व्यक्ति जो अभी कुछ क्षण पहले तक हंस रहा था, बातें कर रहा था, चाय पी रहा था। अचानक गिर जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। ऐसे समय में उसके पास निकट परिजन, सहकर्मी, राहगीर असहाय होकर निहारते रहते हैं, क्योंकि उन्हें कोई चिकित्सकीय आपात तकनीक नहीं आती। वे उन्हें अस्पताल ले जाते हैं और तब तक पेशेंट की मौत हो जाती है। यही कॉर्डियक अरेस्ट है। ह्रदय में इलेक्ट्रिकल इम्प्लीसेस जनरेट होती है वही हार्ट को धड़काता है और हार्ट और लंग्स ब्रेन में रक्त और ऑक्सीजन पहुंचाता है। ज़ब अचानक इलेक्ट्रिकल इम्प्लीसेस जनरेट नहीं होती है तो हार्ट और लंग्स काम करना बंद कर देने से ब्रेन में रक्त और ऑक्सीजन नहीं पहुंचने के कारण एक सेकंड में बेहोश हो कर गिर जाता है और 4 से 5 मिनट में मौत हो जाती है। इसी को कार्डियक अरेस्ट कहते हैं।
राइजिंग भास्कर : जैसे हार्ट अटैक आने से कुछ दिन पहले संकेत मिलते हैं, क्या कॉर्डियक अरेस्ट में भी ऐसा होता है?
प्रो. तातेड़ : हार्ट अटैक और कॉर्डियक अरेस्ट में अंतर है। पहले तो जान लें कि हार्ट अटैक, साइलेंट अटैक, हार्ट फेल और कॉर्डियक अरेस्ट। ये चार अवस्थाएं हैं। हार्ट अटैक से तुरंत मौत नहीं होती। मरीज को बचाने का समय मिल जाता है। हार्ट फेल एक लम्बी चलने वाली बीमारी है। हार्ट बंद नहीं होता। साइलेंट हार्ट अटैक एक कार्डियक अरेस्ट का रूप है। लेकिन कॉर्डियक अरेस्ट में तो सेकंडों का मामला होता है। उस दौरान अगर सही तरीके से सीपीआर दी जाए तो मरीज को बचाया जा सकता है। गौरतलब है कि यह प्राथमिक उपचार है, इससे अधिकतर मरीज की जान बच जाती है। मगर यह जरूरी नहीं। अगर सीपीआर सही तकनीक से दी जाए तो जान बचने के चांसेजे अधिक होते हैं।
राइजिंग भास्कर : क्या कॉर्डियक अरेस्ट भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं?
प्रो. तातेड़ : बिलकुल। कॉर्डियक अरेस्ट, पानी में डूबने से, बिजली करंट से और भगदड़ में। इन चारों का उपचार भी अलग-अलग है। आमतौर पर लोग फर्क नहीं कर पाते। जैसे भगदड़ में अगर कोई कॉर्डियक अरेस्ट का शिकार हो जाता है तो उसे पंपिंग नहीं करके उसे कृत्रिम सांस देनी पड़ती है। कॉर्डियक अरेस्ट के मामलों में एक आम आदमी को मुंह से सांस नहीं देनी चाहिए क्योंकि उसे देना आता ही नहीं है। सीपीआर उपचार नहीं एक़ प्राथमिक सहायता है।
राइजिंग भास्कर : भारत में कॉर्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक से हर साल कितने लोग जान गंवाते हैं?
प्रो. तातेड़ : हार्ट अटैक और कॉर्डियक अरेस्ट को हम समझ चुके हैं। 80 प्रतिशत घटनाएं अस्पताल परिसर के बाहर जैसे घर, सड़क या कार्य स्थलों पर होती हैं। हृदय रोग भारत में मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। हर वर्ष भारत में कितने लोग हृदय रोग से मरते हैं, इनमें उलझने की बजाय इतना तय है कि हर साल हजारों लोग कॉर्डियक अरेस्ट से जान गंवाने लगे हैं।
राइजिंग भास्कर : आपने अभियान को चरम तक कैसे पहुंचाया?
प्रो. तातेड़ : मैंने रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सहकारी बाजार, सूचना केंद्र, हाईकोर्ट, बैंक परिसरों के बाहर, कॉलेजों के आस-पास, इंडस्ट्रीयल एरिया में, मंदिरों और पब्लिक पार्क के बाहर और गांव-ढाणियों में यूनिपोल्स और होर्डिंग्स लगवाए। यहां तक कि श्मशानों में भी परमिशन लेकर होर्डिंग्स लगवाए। सोशल मीडिया का उपयोग किया। सरकारी मेलों में प्रदर्शनियां लगवाईं। सीपीआर के प्रशिक्षण दिए। आकाशवाणी जोधपुर और जयपुर में सीपीआर संबंधी वार्तााएं दीं। 1000 से अधिक प्रशिक्षण शिविर लगाए। रक्षा क्षेत्र, रेलवे, स्कूल, कॉलेज, गैर सरकारी एवं सरकारी संस्थाओं में शिविर लगाए। दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत, इंदौर, राजस्थान के जयपुर, पाली, उदयपुर, ब्यावर, बाड़मेर, सुजानगढ़, सुमेरपुर, देसूरी, समदड़ी, बालोतरा, नाथद्वारा, नागौर, मेड़ता सिटी, लीलण गांव, ओसियां, तिंवरी, मथानिया आदि कई जगह शिविर लगाए और सीपीआर का प्रशिक्षण दिया।
राइजिंग भास्कर : सीपीआर को घर-घर पहुंचाने के लिए और क्या किया?
प्रो. तातेड़ : सीपीआर प्रशिक्षण वीडियो, शॉर्ट फिल्म दी सीपीआर मैन बनवाई। इसे देश भर में सराहना मिली। हर राज्य के कस्बों में वीडियो को लोगों ने सराहा। फॉरवर्ड, शेयर और सबस्क्राइब किया। कर भी रहे हैं। लोगों ने फोन और वीडियो बनाकर परिजनों को जीवित करने की सूचना दी। शॉर्ट फिल्म दी सीपीआर मैन का निर्माण डॉ. अभिषेक तातेड़ ने किया और यू ट्यूब पर खूब लोगों ने देखा और देख कर लोगों की जान बचाने के समाचार वीडियो बना कर और फोन कॉल पर दिए।
राइजिंग भास्कर : आप लगभग कितने लोगों को प्रशिक्षण दे चुके हैं और कितनी जानें बचा चुके हैं?
प्रो. तातेड़ : देखिए जान बचाने वाला तो ऊपर वाला है। हम तो एक निमित्त मात्र हैं। मैं लगभग 10 लाख लोगों को सीपीआर की ट्रेनिंग दे चुका हूं। यह आंकड़ा लगभग है। इससे कुछ कम भी हो सकता है और अधिक भी। मेरे से प्रेरित होकर कई लोग अपने परिजनों की जान बचा चुके हैं। इस तरह मेरे प्रयासों से सेकड़ो की संख्या स में लोगों की जान बचाई जा सकी है।
राइजिंग भास्कर : आपका काम ही आपका सम्मान है। फिर भी आपको कौन-कौन से सम्मान मिल चुके हैं?
प्रो. तातेड़ : मैंने कभी सम्मान के लिए काम नहीं किया। यह मेरा फर्ज था। मैं समाज के लिए कुछ करना चाहता था। मैं नहीं चाहता कि जिस तरह मैंने अपना बेटा खोया कोई और घर का चिराग बुझे। जहां तक सम्मान की बात है जिला प्रशासन, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग, आयुर्वेदिक विवि, दैनिक भास्कर जोधपुर, युवा जैन संस्था, सूरत की एक संस्था, यूनानी कॉलेज टोंक, जन शिक्षण संस्थान सहित 100 से अधिक संस्थाओं से सम्मान मिला है। यह सम्मान मेरा नहीं बल्कि आम जनता का है जो जागरूक होकर मेरे प्रयासों को सफल बना रही हैँ।











