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Thursday, July 9, 2026, 7:34 am

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मंजिल का माया-जाल; जीवन, यात्रा और लालच का त्रिकोण…मृग मरीचिका में फंसा है यहां हर आदमी

क्या हम किसी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं, या खुद सफर ही जीवन है?

राखी पुरोहित. जोधपुर

“यह ज़िंदगी है साहब… मंज़िल का लालच देकर ताउम्र सफर में लगाए रखती है।” सिर्फ एक पंक्ति, लेकिन इसमें जीवन की गहरी दार्शनिकता, आर्थिक यथार्थ और आध्यात्मिक बेचैनी छिपी हुई है। यह पंक्ति हमें उस शाश्वत प्रश्न की ओर ले जाती है—क्या ज़िंदगी एक यात्रा है या मंज़िल? और अगर ज़िंदगी सिर्फ यात्रा है, तो क्या मंज़िल एक भ्रम है? सही बात तो यह है कि हम सब मृग मरीचिका में भटक रहे हैं…यहां यात्रा का कोई ओर-छोर नहीं हैं।

1. दार्शनिक दृष्टिकोण: ज़िंदगी का सत्य—यात्रा या मंज़िल?

दार्शनिकों ने सदियों से जीवन को समझने की कोशिश की है। सुकरात ने कहा था—“An unexamined life is not worth living.” अर्थात यदि जीवन की समीक्षा न की जाए, तो उसका कोई मूल्य नहीं। लेकिन जब हम जीवन की समीक्षा करते हैं, तो सबसे पहले सवाल यही आता है: क्या हम किसी मंज़िल की ओर बढ़ रहे हैं, या खुद सफर ही जीवन है?

2. मंज़िल का भ्रम:

बचपन में कहा गया — अच्छे अंक लाओ, तो भविष्य उज्ज्वल होगा।
युवा हुए तो कहा गया — अच्छी नौकरी मिल जाए, तो जीवन संवर जाएगा।
फिर कहा गया — शादी करो, घर बसाओ, संपत्ति बनाओ, बच्चे पालो…
और एक दिन… वृद्धावस्था दस्तक देती है, और हम सोचते हैं — “क्या यह मंज़िल थी? या अब भी कोई और मोड़ बाकी है?”

हर चरण में हम एक “मंज़िल” की ओर दौड़ते हैं, लेकिन जैसे ही हम उसे पा लेते हैं, वह एक नए सफर की शुरुआत बन जाती है। यह मंज़िल का माया-जाल है।

3. यात्रा का सौंदर्य:

दार्शनिक दृष्टिकोण कहता है कि जीवन की सुंदरता उसके सफर में है, न कि किसी निश्चित लक्ष्य में। हम सीखते हैं, गिरते हैं, उठते हैं, और यही प्रक्रिया हमें परिपक्व बनाती है।

कबीर कहते हैं:

“चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय।”

यह जीवन भी वैसी ही दो चक्कियों के बीच है—आकांक्षा और असंतोष।

4. आर्थिक दृष्टिकोण: लालच और ‘सक्सेस’ की दौड़

आधुनिक समय में जीवन को ‘मंज़िल’ की दौड़ में झोंकने वाला सबसे बड़ा कारक है — आर्थिक प्रणाली। पूंजीवाद ने एक ऐसा ढांचा खड़ा किया है जहां मंज़िल = सफलता = पैसा = सामाजिक मान्यता

5. उपभोग का चक्रव्यूह:

आज एक आम व्यक्ति के लिए जीवन का गणित सीधा है —
“अच्छी शिक्षा → अच्छी नौकरी → ऊंची तनख्वाह → अधिक उपभोग → और अधिक पैसा → और अधिक चाह…”

लेकिन यह चक्र रुकता नहीं। एक कार खरीदी तो SUV चाहिए। SUV के बाद बंगला चाहिए। बंगले के बाद फार्महाउस। और अंत में… स्वस्थ शरीर और शांति, जो शायद सबसे पहले छूट गई थी।

6. ‘FOMO’ और कॅरियर रेस:

आर्थिक दृष्टिकोण ने जीवन को कॅरियर रेस बना दिया है। हर कोई स्टार्टअप खोलना चाहता है, लाखों कमाना चाहता है, IPO लाना चाहता है। लेकिन इसमें से कितनों को संतोष मिलता है?

हम मंज़िल की परिभाषा को पैसे और पद से जोड़ चुके हैं। लेकिन पैसा सिर्फ एक संसाधन है, मंज़िल नहीं। फिर भी, हम उसे ही अंत मान बैठे हैं। यही कारण है कि सेवानिवृत्त व्यक्ति भी चैन से नहीं बैठ पाता — क्योंकि उसके अंदर जीवनभर यह बैठा होता है कि उसे कहीं और पहुंचना है।

7. आर्थिक असमानता और भ्रमित मंज़िल:

जब सामाजिक व्यवस्था केवल अमीरों की सफलता को “मंज़िल” घोषित करती है, तो शेष समाज खुद को सफर में फंसा हुआ पाता है — एक अंतहीन सफर, जिसमें ठहराव को आलस्य समझा जाता है।

8. आध्यात्मिक दृष्टिकोण: यात्रा की शुद्धता और आत्मा की तृप्ति

जब दार्शनिक और आर्थिक दृष्टिकोण थक जाते हैं, तब आध्यात्मिक दृष्टिकोण संजीवनी बनकर सामने आता है।

अ. आध्यात्मिक मंज़िल क्या है?

सनातन दर्शन कहता है — जीवन की अंतिम मंज़िल मुक्ति है, लेकिन वह भी भीतर की यात्रा से प्राप्त होती है। कोई भी आत्मज्ञानी कभी दौड़ता नहीं — वह बैठकर खुद को देखता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:

“कर्म करो, फल की चिंता मत करो।”

इसका अर्थ यही है कि यात्रा ही पर्याप्त है यदि वह ईमानदारी और उद्देश्य के साथ की जाए।

ब. ध्यान और वर्तमान का महत्व:

बुद्ध कहते हैं — “Be mindful.”
ध्यान और आत्मसाक्षात्कार से हमें समझ आता है कि जीवन को पकड़ने की नहीं, उसे जीने की आवश्यकता है।

हर सांस, हर क्षण, हर भावना एक अनुभव है — एक क्षणिक मंज़िल, जो उस समय पूर्ण है। जब हम हर पल को मंज़िल मान लेते हैं, तो सफर स्वयं ही तृप्त हो जाता है।

स. अहंकार बनाम आत्मा:

अहंकार कहता है — “मुझे वहाँ पहुँचना है।”
आत्मा कहती है — “मैं तो पहले से पूर्ण हूँ।”
जीवन की आध्यात्मिक यात्रा उसी समय शुरू होती है जब हम यह समझ जाते हैं कि बाहरी मंज़िलें अंततः भ्रम हैं — और अंदर की शांति ही सच्चा सुख है।

“सफर ही ज़िंदगी है, मंज़िल बस एक बहाना”

“यह ज़िंदगी है साहब…मंज़िल का लालच देकर ताउम्र सफर में लगाए रखती है।”
यह पंक्ति अब केवल एक तंज नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन बन जाती है।

  • दार्शनिक रूप से, यह हमें सिखाती है कि यात्रा ही जीवन का सार है।

  • आर्थिक रूप से, यह चेतावनी देती है कि लालच की कोई मंज़िल नहीं होती — बस अगला लक्ष्य होता है।

  • आध्यात्मिक रूप से, यह हमें भीतर झांकने को कहती है — जहाँ शांति, आनंद और पूर्णता पहले से मौजूद हैं।

जब हम इस सत्य को स्वीकार कर लेते हैं कि हर मंज़िल एक और यात्रा का आरंभ है, तब जीवन से शिकायतें कम हो जाती हैं और अनुभव का रस बढ़ जाता है।

काव्य पंक्तियां : 

“चलो यूं ही सफर करते हैं,
हर मोड़ को मंज़िल समझ कर,
शायद इसी में ज़िंदगी छुपी है —
मंज़िल के लालच में खोई हुई।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor