Explore

Search

Sunday, March 15, 2026, 1:22 pm

Sunday, March 15, 2026, 1:22 pm

LATEST NEWS
Lifestyle

मैं ही जगत हूं और मैं जगदीश…ऐसे योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं में परिपूर्ण हैं…अवतरण दिवस पर एक अवलोकन

संसार श्रीकृष्ण है…श्रीकृष्ण से संसार है…जहां आदमी की बुद्धि मौन हो जाती है वहां श्रीकृष्ण प्रखर हो जाते हैं…ऐसी सर्वशक्तिमान सत्ता को बार-बार नमन…हे योगेश्वर हमारे सिर पर अपनी करुणा का हाथ रख दें…

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर 

8302316074 diliprakhai@gmail.com

भारतीय दर्शन और अध्यात्म में अवतारवाद की अवधारणा गहरी है। जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान स्वयं अवतार धारण कर संसार का मार्गदर्शन करते हैं। विष्णु के अनेक अवतारों में योगेश्वर श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है। इसका कारण केवल यह नहीं कि उन्होंने गीता का उपदेश दिया या महाभारत की धारा को मोड़ा, बल्कि इसलिए कि वे षोडश कलाओं में पूर्ण थे।

इन कलाओं को किसी भी जीव की आध्यात्मिक, मानसिक और लौकिक पूर्णता का मापदंड माना गया है। जहां अन्य अवतार आंशिक रूप से किसी कला में प्रकट हुए, वहीं श्रीकृष्ण ने सभी 16 कलाओं को अपने जीवन में परिपूर्णता से जीया।

1. ज्ञान-शक्ति (ज्ञान की कला)

ज्ञान केवल शास्त्रों का बोध नहीं, बल्कि जगत और आत्मा का परम सत्य जानना है।

  • श्रीकृष्ण ने बचपन से ही अद्वितीय ज्ञान प्रदर्शित किया।

  • गोपियों को भक्ति का रहस्य समझाया, अर्जुन को गीता सुनाई, और महाभारत युद्धभूमि में जो ज्ञान दिया वह कालातीत है।

  • वे न केवल वेद-उपनिषदों के ज्ञाता थे, बल्कि जीवन के व्यावहारिक ज्ञान में भी श्रेष्ठ थे।
    इस प्रकार, वे ज्ञान की कला में पूर्ण थे।

2. शक्ति (पराक्रम की कला)

कृष्ण ने बाल्यावस्था में ही असीम शक्ति का परिचय दिया।

  • पूतना जैसी राक्षसी का वध शैशव में किया।

  • कालिय नाग को दबाकर यमुना से निष्कासित किया।

  • गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी ऊँगली पर उठाकर इन्द्र का गर्व तोड़ा।
    उनकी शक्ति केवल शारीरिक बल नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति भी थी।

3. बल (शारीरिक सामर्थ्य की कला)

कृष्ण का बल अनुपम था।

  • wrestling में चाणूर और मुष्टिक को पराजित किया।

  • असंख्य युद्धों में उन्होंने योद्धाओं को परास्त किया।

  • महाभारत में उनके सारथ्य ने अर्जुन को अपराजेय बना दिया।
    उनकी देह से शक्ति की आभा झलकती थी, जिससे मित्र निर्भय और शत्रु भयभीत हो जाते थे।

4. सौन्दर्य (रूप और आकर्षण की कला)

कृष्ण का रूप स्वयं मोहक था।

  • उनके श्याम वर्ण, कमलनयन और पीताम्बर धारण कर बांसुरी बजाते हुए स्वरूप ने गोपियों, प्राणियों और सम्पूर्ण प्रकृति को मोहित कर लिया।

  • उनका सौन्दर्य केवल बाहरी नहीं था; उनके व्यक्तित्व की आभा ने लोगों को आकर्षित किया।
    गोपियों ने उन्हें चन्द्र से भी अधिक मनोहर माना।

5. लीला (क्रीड़ा की कला)

कृष्ण की लीलाएं आज भी भक्तों के हृदय में जीवित हैं।

  • वृन्दावन की रासलीला हो या गोप-बालकों संग माखन चोरी की लीला।

  • वे हर खेल में आनंद और शिक्षा का भाव भर देते थे।
    उनकी लीलाओं में बालसुलभ सरलता और दिव्यता का अनोखा संगम दिखता है।

6. कला (संगीत और वाद्य की कला)

कृष्ण बांसुरी वादन में अनुपम थे।

  • उनकी बांसुरी की ध्वनि सुनकर गायें चरना भूल जातीं, गोपियाँ अपने घर का काम अधूरा छोड़कर दौड़ी चली आतीं।

  • वृन्दावन की हर धारा और हर वृक्ष उनकी बांसुरी पर झूम उठता।
    इससे स्पष्ट है कि वे संगीत और कला में पूर्ण थे।

7. साहित्य (काव्य और वाणी की कला)

कृष्ण की वाणी सदैव मधुर और प्रभावशाली रही।

  • गीता का प्रत्येक श्लोक गूढ़ काव्य और दार्शनिक सौन्दर्य से भरा है।

  • वे संवाद में इतने दक्ष थे कि शत्रु भी उनकी वाणी से प्रभावित हो जाते।
    उनकी भाषा में भावनात्मकता और तर्क दोनों का अद्भुत संतुलन था।

8. राजनीति (नीति और कूटनीति की कला)

कृष्ण को श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ कहा जाता है।

  • शिशुपाल और जरासंध जैसे दुष्टों का विनाश उन्होंने रणनीति से किया।

  • महाभारत में शांति-वार्ता का प्रयास भी किया, और जब असफल रहा तो युद्ध की नीति बनाई।

  • उन्होंने अर्जुन को गीता सुनाकर धर्म की रक्षा हेतु सही मार्ग दिखाया।
    उनकी राजनीति सदैव धर्म पर आधारित थी।

9. धैर्य (सहनशीलता की कला)

कृष्ण के जीवन में अनेक संकट आए, किन्तु उन्होंने कभी धैर्य नहीं खोया।

  • जन्म से ही कंस ने मृत्यु का षड्यंत्र रचा।

  • कई बार षड्यंत्र और विपत्तियों का सामना करना पड़ा।
    फिर भी वे सदैव धैर्यवान रहे और सही समय पर कार्य किया।

10. त्याग (निःस्वार्थता की कला)

कृष्ण ने कभी अपना स्वार्थ नहीं साधा।

  • द्वारका का राजा होते हुए भी उन्होंने युद्ध में शस्त्र धारण नहीं किया, केवल सारथ्य स्वीकारा।

  • वे सदा दूसरों के हित के लिए कार्य करते रहे।
    उनका जीवन त्याग और सेवा की मूर्ति है।

11. भक्ति (आध्यात्मिकता की कला)

यद्यपि कृष्ण स्वयं ईश्वर थे, फिर भी उन्होंने भक्ति का महत्व स्थापित किया।

  • गोपियों के प्रति उनकी लीलाएँ केवल प्रेम नहीं थीं, बल्कि भक्ति के सर्वोच्च आदर्श थीं।

  • उन्होंने भक्तों के प्रेम को ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बताया।
    उनकी शिक्षा थी—“अनन्य भक्ति से मुझे पाया जा सकता है।”

12. साहस (वीरता की कला)

कृष्ण का जीवन साहस का प्रतीक है।

  • कंस का वध किया, दुष्ट राक्षसों को नष्ट किया।

  • महाभारत जैसे महायुद्ध में धर्म की स्थापना के लिए अग्रणी भूमिका निभाई।
    वे कभी भी भयभीत नहीं हुए।

13. अनुग्रह (करुणा की कला)

कृष्ण करुणा के सागर थे।

  • सुदामा जैसे निर्धन मित्र को राजमहल में सम्मान दिया।

  • द्रौपदी की लाज बचाई।

14. आनंद (हास्य और उल्लास की कला)

कृष्ण का व्यक्तित्व उल्लासमय था।

  • गोप-बालकों के साथ उनकी शरारतें, माखन चोरी, छुपन-छुपाई, हंसी-मजाक सभी उनके आनंदमय स्वरूप को दर्शाते हैं।

  • वे सिखाते थे कि जीवन का हर पल आनंद से जीना चाहिए।

15. संपूर्णता (समन्वय की कला)

कृष्ण हर क्षेत्र में संतुलन रखते थे।

  • वे योद्धा भी थे, प्रेमी भी; दार्शनिक भी, राजनीतिज्ञ भी; गुरु भी और मित्र भी।

  • उनमें जीवन के सभी पक्षों का पूर्ण समन्वय था।
    यही उनकी पूर्णता थी।

16. आत्मसाक्षात्कार (परम कला)

अंतिम और सर्वोच्च कला है आत्मसाक्षात्कार।

  • कृष्ण स्वयं परब्रह्म थे, लेकिन उन्होंने अपने जीवन और उपदेशों से आत्मा की अनुभूति का मार्ग दिखाया।

  • गीता में उन्होंने “अहं ब्रह्मास्मि” के सार को सरल भाषा में प्रस्तुत किया।
    इससे उन्होंने सम्पूर्ण मानवता को मोक्ष का मार्ग दिया।

श्रीकृष्ण : ऐतिहासिक व्यक्तित्व ही नहीं पूर्णता के आदर्श

श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि पूर्णता के आदर्श हैं। वे सोलह कलाओं में निपुण होकर मानवता को यह संदेश देते हैं कि जीवन का हर पक्ष संतुलित और परिपूर्ण होना चाहिए।
उनकी बांसुरी का संगीत सौन्दर्य और आनंद की कला है, उनका अर्जुन को उपदेश ज्ञान और आत्मसाक्षात्कार की कला है, द्रौपदी की रक्षा करुणा और त्याग की कला है, और गोवर्धन धारण करना शक्ति और साहस की कला है। इसलिए भारतीय परंपरा ने उन्हें पूर्णावतार कहा।
आज भी जब हम श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं, तो हमें केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन की सम्पूर्णता का आदर्श दिखाई देता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor