दृढ़ इरादों से आपदाओं को मात देने वाली, करुणा की दृष्टि से सृष्टि को सुंदरता का अहसास कराने वाली…एक ऐसी महिला से साक्षात्कार जो सेवा के लिए ही बनी हैं…सेवा को ही जिन्होंने जीवन का ध्येय बना लिया है…।
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
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राइजिंग भास्कर का आज का पड़ाव एक ऐसी महिला के यहां था जो अपने आपमें एक संस्था है। वो उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां सभी आराम करना चाहते हैं, मगर यह महिला आज भी समाजसेवा में सक्रिय है। जी हां- हम बात कर रहे हैं मातेश्वरी जी आर्य की। जैसा की नाम है मातेश्वरी आर्य…इस नाम में एक अपनापन है। मां के रूप में ईश्वरीय अहसास है। यह अहसास ना केवल हमने महसूस किया, वरन उन सैकड़ों जरूरतमंद और पीड़ित लोगों ने पिछले तीन दशक में महसूस किया जिनके जीवन में राहत और चाहत की उमंग मातेश्वरी आर्य ने भरी। दर्द को सीने में छुपाए जो मुस्कुरातीं है वो मातेश्वरी आर्य हैं।
महामंदिर से आगे फुलेराव पार्क के समीप उनके आवास पर राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और एडिटर इन चीफ राखी पुरोहित उनसे मुखातिब हैं। वे बड़े ही आत्मीयता से हमारा स्वागत करती हैं और उनके घर के आंगन में ठीक ऐसा ही अहसास हुआ जैसे हम अपनी मां के समीप बैठकर खुद को भाग्यशाली समझ रहे हों। उम्र का चढ़ाव उनके चेहरे पर साफ झलक रहा था, मगर मातेश्वरी आर्य जमाने की ठाेकरें खाकर भी अभी थकी नहीं हैं। उन्होंने जीवन में सुख-दुख को जिया और जो समाज में पीड़ित, शोषित और दुखियारे उनके सामने आए ऐसे जरूरतमंदों की मदद के लिए वे भीषण गर्मी में शीतल पवन का झौंका बनकर राहत पहुंचाती रहीं। मातेश्वरी आर्य के नाम में जाे सुखद अहसास है वो ही अहसास उनकी जीवन यात्रा में है।
जिला उप नियंत्रक (नागरिक सुरक्षा) से शुरुआत
आज से करीब 55 साल पहले मातेश्वरी आर्य ने जिला उप नियंत्रक (नागरिक सुरक्षा) के रूप में अपने कॅरिअर की शुरुआत की। इस शुरुआत के साथ ही उन्हें सेना के साथ मिलकर समाजसेवा का मौका मिला। बाढ़, भूकंप, महामारी या कोई भी आपदा हो, ऐसे में एक सशक्त पिलर और सहयोगी के रूप में उनका विभाग तत्पर रहता। एनसीसी, स्काउट-गाइड आदि भी उनके हाथों तैयार होते रहे। खुद मातेश्वरी आर्य भी अपने समय में खूब एक्टिव रहीं और सम्मान-पदक उनके लिए ही जैसे बने। मातेश्वरी आर्य बताती हैं कि जिला उप नियंत्रक (नागरिक सुरक्षा) के कार्य के दौरान उन्हें कई स्थानों पर कार्य करने का अवसर मिला। सेना की इस विंग की वो सशक्त कड़ी बनकर डटीं रहीं। एक महिला होने के बावजूद बहादुरी उनके भीतर कितनी भरी रही, यह अहसास आज हमने उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी जीवटता और साहस को देखकर भीतर तक महसूस किया। सेवा के आधार पर उन्हें राष्ट्रपति अवार्ड तक मिल चुका है, जो उनके व्यक्तित्व और कृतित्व से रूबरू करवाता है।
मन…मानवता…मजबूर जन के चेहरों की मुस्कान और मातेश्वरी आर्य बनने की कहानी
आज से करीब 25 साल पहले मन MUN (मेंटल अपलिफ्टमेंट सोसायटी) से जुड़ाव हुआ। मथुरादास माथुर अस्पताल में निशुल्क सेवा देने का मौका मिला। मातेश्वरी जी कहतीं है- बेटा बहुत लंबा अंतराल हो गया है, काफी बातें याद भी नहीं आ रहीं। 20-25 साल पहले कई ऐसे केस सामने आए जिसमें मानसिक रोगियों को झंझीरों में जकड़कर रखा जाता था। तब हमने ऐसे जरूरतमंद और पीड़ित लोगों को मन के माध्यम से मथुरादास माथुर अस्पताल में इलाज मुहैया करवाया। फिर यह रुटीन बन गया। यह सिलसिला चलता रहा। कोई भी पीड़ित और मजबूर चेहरा दिखता हम प्रयास करते कि उन्हें समय पर इलाज मिल जाए। उनका पुनर्वास हो जाए। गांव-गांव, ढाणी-ढाणी से ऐसे लोग उनके संपर्क में आए और भगवान ने मुझे निमित्त बनाया सेवा का। इसके लिए मैं भगवान का धन्यवाद देना चाहती हूं कि मैं इस जन्म में किसी जरूरमंद के जीवन में रोशनी की किरण बन सकीं।
वृद्ध, बेघर व निराश्रित महिलाओं के लिए पुनर्वास गृह राहत की फुहार लेकर आया
मातेश्वरी आर्य बताती हैं कि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के तहत मुख्यमंत्री पुनर्वास योजना के अंतर्गत वृद्ध बेघर व निराश्रित महिलाओं के लिए पुनर्वास गृह बनने के बाद वृद्ध, बेघर और निराश्रित महिलाओं को काफी राहत मिली है। यह केंद्र सेवा की भावना से संचालित हो रहे हैं और आज सैकड़ों महिलाओं के लिए आशा और उम्मीद के साथ आसरा बना हुआ है। जीवन की सांझ में जब आंखों की रोशनी जवाब दे जाती है, चेहरों पर थकान और शरीर पल-पल साथ छोड़ने का कटु अनुभव करवाने लगता है और अपने भी साथ नहीं होते तब पता चलता है कि ऐसे गृह कितने काम के होते हैं। यहां एक आसरा ही नहीं एक आस भी मिलती है और सांसों को सहारा मिलता है। जब व्यक्ति को सहारा मिलता है तो जीने के प्रति विश्वास जगता है। यही विश्वास कई वृद्ध, बेघर और निराश्रित महिलाओं के जीवन में ये पुनर्वास गृह लेकर आए हैं।






