रणबंका बालाजी ट्रस्ट ने आयोजित की जैव विविधता संरक्षण पर कार्यशाला
राइजिंग भास्कर. जोधपुर
पर्यावरणीय धरोहर, सामुदायिक जीवन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य से रणबंका बालाजी ट्रस्ट (जोधपुर) ने फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी (भीलवाड़ा) के सहयोग से रणबंका पैलेस, जोधपुर में “जैव विविधता और संरक्षण – पारिस्थितिक मनोविज्ञान और पारिस्थितिक स्वास्थ्य निगरानी की समझ” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।
जोधपुर की रानी श्वेता कुमारी ने कहा, “जैव विविधता केवल प्रकृति की रक्षा नहीं है—यह उन समुदायों के भविष्य की रक्षा करने का भी प्रयास है, जो उस पर निर्भर हैं। रणबंका बालाजी ट्रस्ट ऐसी पहलों के माध्यम से दीर्घकालिक और व्यावहारिक मॉडल तैयार कर रहा है, जो संरक्षण और सामुदायिक सशक्तिकरण को जोड़ते हैं। पीटर स्मेटासेक का सहयोग यह सुनिश्चित करता है कि वैज्ञानिक ज्ञान जमीनी स्तर तक पहुँचे।
ट्रस्ट के जनमेजय सिंह राठौड़ ने पहल का परिचय देते हुए कहा कि बदलते पर्यावरणीय संदर्भ में जैव विविधता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि ट्रस्ट विभिन्न संस्थानों और सरकारी एजेंसियों के साथ मिलकर सामूहिक प्रयासों के जरिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण, ग्रामीण आजीविकाओं को मजबूती और पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने की दिशा में काम कर रहा है।
कार्यशाला में विशेष अतिथि के रूप में ओमप्रकाश (पुलिस आयुक्त, जोधपुर) और गौरव अग्रवाल (जिला कलेक्टर, जोधपुर) ने भाग लिया और इस पहल को संस्थागत सहयोग प्रदान किया।
बटरफ्लाई रिसर्च सेंटर के प्रसिद्ध प्रकृतिविद पीटर स्मेटासेक ने कहा कि तितलियां पर्यावरण में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों की संकेतक होती हैं और जैव विविधता की गहन समझ के बिना संरक्षण प्रयास अधूरे रहते हैं।
कार्यशाला में गिरधारी लाल वर्मा, डॉ. अनिल सर्सावन, पीटर स्मेटासेक और डॉ. सतीश कुमार शर्मा ने विशेषज्ञ व्याख्यान दिए। इनमें सामुदायिक स्तर पर पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन, भूमि और जल के सतत प्रबंधन तथा जैव विविधता संरक्षण पर विस्तृत विचार रखे गए।
कार्यक्रम के अंत में हिमानी शर्मा और गिरधारी लाल वर्मा ने खुली चर्चा का संचालन किया, जिसमें तितलियों और भूजल पुनर्भरण, ग्रामीण आजीविकाओं में साझा संसाधनों की भूमिका, शुष्क भूभाग के अनुभव तथा पारिस्थितिकी और अर्थशास्त्र के संबंध जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
वन विभाग, जल संसाधन विभाग, विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और विश्वविद्यालयों के प्रतिभागियों ने कहा कि इस प्रकार की पहले राजस्थान की पर्यावरणीय प्रणालियों को आने वाले वर्षों में और अधिक सशक्त और टिकाऊ बनाएंगी।





