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Thursday, July 9, 2026, 3:09 pm

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राजस्थान की शिक्षा पर लाइव स्टोरी : ढहते स्कूल, ढहता विश्वास और आसमान छूटी निजी स्कूलों की लूट

एक समय था जब सरकारी स्कूलों में पढ़कर ही लोग जज, कलेक्टर, एसपी और प्रशासनिक पदों के साथ राजनीति के शिखर पर पहुंचते थे, लेकिन अब सरकारी स्कूलों के नाम से लोग भय खाते हैं…अपने बच्चों पर अभिभावक सरकारी स्कूलों का साया भी नहीं पड़ने देना चाहते..बात राष्ट्रीय स्तर की करें तो एपीजे अब्दुल कलाम, सतीश धवन, महेंद्रसिंह धोनी और कैलाश खेर जैसे सितारे सरकारी स्कूलों से ही निकले…।
निजी स्कूलों की फीस का स्ट्रक्टचर आम आदमी की पहुंच में नहीं है। कर्ज लेकर अभिभावक बच्चों को पढ़ाते हैं। डोनेशन देकर भी बच्चों के भविष्य का सपना बुनने वाले अभिभावक निजी स्कूलों की लूट सहने को विवश है…लेकिन सरकारी स्कूलों से मोह भंग होने का फायदा निजी स्कूल उठा रहे हैं…
सरकारों ने निजी स्कूलों के साथ पिछली गली से हाथ मिला लिया है। यही कारण है कि निजी स्कूल फल-फूल रहे हैं और सरकारी स्कूलों का बंटाढार हो रहा है…सरकारी स्कूलों का हाल बेहाल, संख्या घटती जा रही, नामांकन का कोई अता नहीं, योजनाओं के धरातल पर हर सरकार फेल, ऐसे में कैसे होगा सरकारी स्कूलों का विकास? 

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

राजस्थान की धरती पर सरकारी शिक्षा का सूरज ढलता जा रहा है। कभी गांव-गांव में सरकारी स्कूल ज्ञान का दीपक जलाते थे, आज वही स्कूल जर्जर भवनों में दफन हो रहे हैं। पिछले दिनों कई जिलों से आई खबरें दिल दहला देने वाली थीं – सरकारी स्कूलों की इमारतें बच्चों पर ढह गईं। दर्जनों मासूम अपनी किताबों के साथ मलबे में दफन हो गए। यह सिर्फ दीवारों के गिरने की त्रासदी नहीं थी, यह पूरे सिस्टम की असफलता का मलबा था, जिसने बच्चों के सपनों को कुचल दिया।

विडंबना देखिए, हादसों के बाद भी सरकार और नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ा। न शिक्षा मंत्री मदन दिलावर जवाब देते दिखे, न मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा संवेदनशील दिखे। सवाल उठता है कि आखिर कब तक मासूमों की जानें सिस्टम की लापरवाही की कीमत चुकाती रहेंगी?

घटते नामांकन और सरकार की अनभिज्ञता

राजस्थान में सरकारी स्कूलों का हाल ऐसा है कि खुद शिक्षा मंत्री मदन दिलावर को यह भी नहीं पता कि पिछले पांच सालों में कितने सरकारी स्कूल घटे और कितने बढ़े। हमने शिक्षा विभाग से भी जानकारी मांगी, मगर आंकड़े “उपलब्ध नहीं” कहकर टाल दिए गए। यह ‘उपलब्ध नहीं’ शब्द ही बताता है कि सरकार की नज़र शिक्षा पर नहीं, बल्कि सियासत पर है।

तथ्य साफ हैं – पिछले छह वर्षों में 20 लाख बच्चों ने सरकारी स्कूलों से नामांकन रद्द कर दिया। कोविड काल के अपवाद को छोड़ दें, तो हर साल हजारों बच्चे सरकारी स्कूलों से दूर होते जा रहे हैं। वहीं निजी स्कूलों में नामांकन लगातार बढ़ रहा है।

नामांकन का सच :

  • 2018-19: सरकारी – 82,58,519 | निजी – 83,27,250

  • 2021-22 (कोविड काल): सरकारी – 97,15,989 | निजी – 75,16,590

  • 2024-25: सरकारी – 78,03,846 | निजी – 98,20,465

सिर्फ तीन वर्षों में 19 लाख बच्चों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिए। सवाल है – क्या ये बच्चे पढ़ाई से भाग रहे हैं? नहीं! वे भाग रहे हैं सरकारी तंत्र की लापरवाही से।

क्यों घट रहे सरकारी स्कूलों के विद्यार्थी?

राजस्थान के सरकारी स्कूलों की गिरावट के पीछे कारणों की लंबी फेहरिस्त है।

  1. 1.28 लाख शिक्षक पद रिक्त – कई स्कूलों में एक ही शिक्षक सभी कक्षाएं पढ़ाने को मजबूर है। गुणवत्ता का अंदाज़ा लगाइए।

  2. बाल गोपाल योजना की देरी – दूध और मिड-डे मील में गड़बड़ी ने बच्चों की उपस्थिति पर चोट की है।

  3. तालाबंदी – शिक्षकों की कमी से कई स्कूलों पर ताले लटक गए।

  4. छात्रवृत्ति की कमी – गरीब परिवार बच्चों को स्कूल भेजने में असमर्थ हैं।

  5. जवाबदेही का अभाव – शिक्षा विभाग समस्याओं पर सिर्फ फाइलें खंगालता है।

  6. डिजिटल शिक्षा का अभाव – बच्चे निजी स्कूलों की स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर लैब देखकर सरकारी स्कूलों से किनारा कर रहे हैं।

  7. जर्जर भवन और सुविधाओं की कमी – साफ शौचालय, पीने का पानी, बिजली और खेलकूद जैसी मूलभूत चीजें भी नदारद हैं।

जर्जर भवनों का दर्द

राजस्थान के कई सरकारी स्कूलों की हालत ऐसी है मानो वह किसी खंडहर से कम न हों। पिछले छह महीनों में ही 40 से अधिक घटनाएं सामने आईं, जहां दीवारें गिरीं या छतें धंस गईं। हर बार प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया, लेकिन न कोई ठोस कदम उठे और न ही ज़िम्मेदारों पर कार्रवाई हुई।

यह कैसा मजाक है कि बच्चों को पढ़ने भेजने वाले माता-पिता अब डरते हैं कि कहीं उनका बच्चा किताब के साथ मलबे में दफन न हो जाए।

निजी स्कूलों की लूट, हर साल 10 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी

इधर निजी स्कूलों का खेल अलग है। फीस हर साल 10 से 25 प्रतिशत तक बढ़ाई जाती है। एक औसत निजी स्कूल की सालाना फीस 80 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक है। ऊपर से डोनेशन की लूट अलग। एडमिशन भी आसान नहीं – अभिभावकों को डोनेशन देने के बावजूद लाइन में लगना पड़ता है।

गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज लेकर, जेवर बेचकर बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने को मजबूर हैं। कारण साफ है – सरकारी स्कूलों पर उनका भरोसा टूट चुका है।

देश के सरकारी स्कूलों का गौरवमयी अतीत, जहां से निकले अनेक लिजेंड

अभिभावक सागर दायमा का कहना है – देश के सरकारी स्कूलों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अगर राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो देश के सरकारी स्कूलों से ही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, सतीश धवन, महेंद्र सिंह धोनी और कैलाश खेर जैसे सितारे निकले। समस्या स्कूलों की नहीं, सरकारों की है। भरोसा फिर से कायम करने की जरूरत है।”

लेकिन आज की हकीकत यह है कि वही स्कूल जो कभी प्रतिभाओं की फैक्ट्री थे, अब उपेक्षा और असुविधा के शिकार हैं।

राजस्थान में नेताओं की बेरुखी – सब बराबर के दोषी

आज जब सरकारी स्कूल मौत के कुएं बनते जा रहे हैं, तब हमें यह भी पूछना होगा –

  • अशोक गहलोत ने अपने कार्यकाल में क्या किया? वादे बहुत किए, बजट घोषणाएं भी हुईं, लेकिन न शिक्षक आए, न भवन बने।

  • वसुंधरा राजे के कार्यकाल में भी शिक्षा से ज्यादा फोकस ‘विकास यात्राओं’ और उद्योगपतियों की महफिलों पर रहा।

  • और अब भजनलाल शर्मा की सरकार में तो हालात और भी बदतर हैं। शिक्षा मंत्री मदन दिलावर टीवी चैनलों पर बयान देने में आगे रहते हैं, मगर अपने विभाग के बुनियादी आंकड़े तक नहीं जानते।

तीनों ही सरकारों ने शिक्षा को वोट बैंक का हथियार बनाया, लेकिन किसी ने भी इसे प्राथमिकता नहीं दी।

समाधान क्या?

अगर राजस्थान को शिक्षा में पुनर्जागरण लाना है तो दिल्ली मॉडल से सीखना होगा।

  • सबसे पहले सभी रिक्त शिक्षक पदों को भरना होगा।

  • सरकारी स्कूलों को डिजिटल सुविधाएं और विषय विशेषज्ञ शिक्षक देने होंगे।

  • मिड-डे मील और बाल गोपाल योजना की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी होनी चाहिए।

  • जर्जर भवनों को तुरंत गिराकर नए स्कूल बनाए जाएं।

  • अभिभावकों के साथ विश्वास बहाली अभियान चलाना होगा।

निजी स्कूलों में राइट टू एजुकेशन रस्म अदायगी, गरीब बच्चों को नहीं मिलता लाभ

कहने को राइट टू एजुकेशन के तहत निजी स्कूलों में होनहार गरीब बच्चों के लिए शिक्षा का कोटा है। मगर इसका पूरा लाभ गरीब बच्चों को नहीं मिल रहा है। हालत यह है कि निजी स्कूलों में पहली बात तो गरीब बच्चों को आरटीई के तहत प्रवेश आसानी से मिलता नहीं है। दूसरा इसमें भी राजनीति होती है। वास्तविक जरूरतमंद तो आज भी निजी स्कूलों में प्रवेश से वंचित हो रहे हैं। कई निजी स्कूल तो आरटीई नियमों की अनदेखी करते हैं। कई अभिभावकों से बात करने पर यह दर्द उभरकर सामने आया कि उनके बच्चों को आरटीई के तहत बड़ी निजी स्कूलों में प्रवेश नहीं मिला।

सरकारी स्कूलों की दशा सुधरेगी या निजी स्कूलों की गुलामी स्वीकार करेंगे?

राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां से या तो यह सुधार की दिशा में कदम उठाएगी या फिर निजी स्कूलों की गुलामी को स्वीकार कर लेगी।

मासूम बच्चों की मौत, घटते नामांकन और आसमान छूती फीस – यह सब मिलकर एक ही सवाल पूछते हैं –
क्या राजस्थान की सरकारें शिक्षा को सचमुच प्राथमिकता देंगी या फिर बच्चों का भविष्य इसी मलबे में दफन होता रहेगा?

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor