राइजिंग भास्कर. जोधपुर
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प्रज्ञा निकेतन छात्रावास में आयोजित द्विदिवसीय व्याख्यानमाला में संस्कृत विभाग जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर की पूर्व विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर डॉ. सरोज कौशल ने भारतीय ज्ञान परम्परा के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत एक भौगोलिक भू मात्र नहीं है, अपितु यह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के कारण एक महादेश है। उन्होंने अपने काव्य संग्रह ‘भारत गाथा ‘ की कविताओं के उद्धरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि हमारे ऋषियों, आचार्यों, कवियों तथा दार्शनिकों की आनुवंशिकता हमारी अभिप्रेरक है। अपनी निष्ठा और पवित्रता से हमें उसको अग्रेसारित करना है। प्रो कौशल ने कृषक परम्परा और कवि परम्परा पर कविता सुनाकर उन दोनों की सर्जना को परस्पर पूरक बताया।
उन्होंने स्त्री गाथा के अन्तर्गत गार्गी, मैत्रेयी, महाप्रजापति गौतमी, भामती, विज्जिका जैसे पात्रों पर कविता कर वर्तमान तथा भावी पीढ़ी को भारत की गौरवपूर्ण विरासत से अवगत कराया है। भा में रत रहने से हमारा देश भारत कहलाया। आचार्य शंकर, अभिनवगुप्तपादाचार्य, महात्मा बुद्ध, महर्षि नारद आदि इस महादेश को भारत बनाते हैं। जिनका संज्ञान और कोई नहीं लेता, कवि ही उनका संज्ञान ले सकता है, पुराण को समकाल से समन्वित करने का उत्तरदायित्व कवि पर ही है।
उर्दू साहित्य की सम्भावनाशील कवयित्री श्रीमती रेणु वर्मा ने विशिष्ट वक्ता के रूप में भारत गाथा पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रो सरोज कौशल साहित्य जगत् में नूतन प्रतिमान स्थापित कर रही हैं । भारत गाथा में डाॅ सरोज कौशल ने विशिष्ट शब्द संयोजन तथा पौराणिक विषयों की धरोहर हमारे युवा साथियों को सौंपी है। प्राय: हमारी पीढ़ी इन अनमोल रत्नों से अवगत नहीं है, कविता के माध्यम से आपने इन पात्रों और अवधारणाओं को अमर कर दिया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में विकलांग पुनर्वास एवं प्रशिक्षण संस्थान की अध्यक्ष प्रो मीना बर्डिया ने भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रसंग में प्रो सरोज कौशल के काव्य संग्रह भारत गाथा के महत्त्व को रेखांकित किया। वर्तमान की विकटता में ‘भारत गाथा ‘ संजीवनी के समान हृदय को आह्लादित करती है। इस समारोह में श्रीमती ईरा सिसोदिया ने भी विचार प्रकट किये। इससे पूर्व स्वामी विवेकानंद की शिकागो वक्तृता पर कला संकाय के पूर्व अधिष्ठाता प्रो कन्हैयालाल राजपुरोहित ने शोधपूर्ण व्याख्यान प्रदान किया। उन्होंने विवेकानंद के व्याख्यान की अनेक विशेषताओं को रेखांकित किया और यह भी बताया कि अमेरिका पहुँचने में स्वामी जी के मार्ग में क्या क्या कठिनाइयाँ आईँ। कार्यक्रम के अन्त में आजीवन एवं सतत शिक्षा विभाग के निदेशक डॉ ओ पी टाक ने धन्यवाद ज्ञापित किया। प्रज्ञा निकेतन छात्रावास के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी की।











