रामेश्वर (काल्पनिक नाम) अपनी पत्नी को बालोतरा से जोधपुर रोज एक निजी अस्पताल में लाता। तेरह दिन 10 हजार के इंजेक्शन पत्नी के लगे। आए दिन महंगी जांचें हुईं। प्रोसेस हुआ। सफल नहीं होने पर फ्री में डोनर की सुविधा का झांसा दिया। लेकिन अंतत: निराशा…ना बच्चा हुआ और ना ही फ्री में डोनर की सुविधा दी.. सवा तीन लाख का बिल बन गया और नतीजा शून्य…इस तरह निजी अस्पतालों ने आईवीएफ तकनीक के नाम पर लूट मचा रखी है…।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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रामेश्वर (काल्पनिक नाम)। अपनी पत्नी को लेकर बालोतरा में एक कैंप में पहुंचा। उसकी पत्नी की यह दूसरी शादी थी और उसके पहले से एक बच्चा था। रामेश्वर की उम्र 45 साल और उसकी पत्नी की उम्र 33 साल है। बच्चा नहीं होने पर दंपती को जोधपुर में 12वीं रोड स्थित एक निजी अस्पताल में बुलाया गया। कहा गया कि वहां कुछ जांचें होंगी और गारंटीड बच्चा हो जाएगा। अगर खुद के वीर्य से बच्चा नहीं हुआ तो डोनर की सुविधा फ्री में उपलब्ध करवाई जाएगी। मगर इस दंपती के साथ चीटिंग हुई। कुल सवा तीन लाख रुपए का बिल बन गया और ना ही बच्चा हुआ और ना ही फ्री में डोनर की सुविधा उपलब्ध करवाई गई।
रामेश्वर की कहानी जो उन्होंने राइजिंग भास्कर को फोन पर बताई :
रामेश्वर ने राइजिंग भास्कर को फोन पर डिटेल से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बालोतरा में एक निजी हॉस्पिटल में कैंप लगा था। इस कैंप में उन्होंने और उनकी पत्नी ने भी जांच करवाई थी। तब बताया गया कि जोधपुर में 12वीं रोड स्थित एक निजी अस्पताल में जाकर जांचें करवाओ आईवीएफ तकनीक से गारंटीड बच्चा हो जाएगा और अगर आपके खुद के वीर्य से बच्चा नहीं हुआ तो डोनर की सुविधा फ्री में उपलब्ध करवाएंगे। रामेश्वर ने बताया कि इसके बाद वे अपनी पत्नी के साथ जोधपुर पहुंचे। निजी अस्पताल में दिखाया। वहां कुछ जांचें हुई। फिर कहा कि रोज पत्नी के एक इंजेक्शन लगेगा। एक इंजेक्शन 10 हजार रुपए का था और 13 दिन बालोतरा से पत्नी को लेकर जोधपुर आया। आए दिन जांचें होती गई। दवाइयों का आए दिन 20-25 हजार का बिल बनता गया।
भ्रूण बन गया…फिर बोला डेढ़ दो महीने बाद आना बच्चे की धड़कन चैक करेंगे…
रामेश्वर ने बताया कि हम डॉक्टर की बात मानते गए। हमें कहा गया कि भ्रूण बन गया है। फिर बोला कि डेढ़ दो महीने बाद आना बच्चे की धड़कन चैक करेंगे। हम बताई हुई तारीख को पहुंचे। सोनोग्राफी हुई। जांच हुई और फिर कहा कि बच्चे की धड़कन नहीं है। अब आप डीएनसी करवाओ और आगे इलाज करवाना है तो पैसे देकर डोनर की मदद लो। जब हमने कहा कि आपने तो कहा था कि डोनर की सुविधा फ्री में दी जाएगी। तो अस्पताल प्रशासन मुकर गया। इस तरह इस दंपती के कुल सवा तीन लाख के लगभग रुपए खर्च हो गए और नतीजा शून्य निकला।
विशेषज्ञ डॉक्टरों के मुताबिक : आईवीएफ तकनीक में अस्पतालों को गारंटी नहीं लेनी चाहिए
हमने रामेश्वर जैसे कई केसेज को देखते हुए कई विशेषज्ञ डॉक्टरों से बात की। डॉक्टरों का कहना है कि आईवीएफ तकनीक से संतान उत्पत्ति के चांस होते हैं। मगर किसी भी अस्पताल को गारंटी नहीं लेनी चाहिए। अगर वो अस्पताल गारंटी लेता है तो उन्हें अगले सारे चांस फ्री में देने चाहिए क्योंकि उन्होंने गारंटी ली थी। अक्सर निजी अस्पताल अपनी आय बढ़ाने के लिए लोगों को अंधकार में रखते हैं। बच्चा पाने की इच्छा में मजबूर दंपती अस्पताल प्रशासन के झांसों में आते जाते हैं और अंतत: जब बच्चा नहीं होता तो अस्पताल प्रशासन पल्ला झाड़ लेते हैं। यह सरासर मरीज के साथ चीटींग हैं। इसके लिए निजी अस्पतालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना चाहिए। कई परिवार तो अति गरीब होते है, वो कर्ज लेकर संतान की आस लगाते हैं। मगर उनको यह नही पता की अंतिम माह में डाक्टरों द्वारा एक रटा रटाया जवाब होगा- मिस करेज! मगर डाक्टर आईवीएफ की भारी भरकम फीस पहले से वसूल लेते हैं। मगर जो परिवार संतान की आस लगाए बैठे होते हैं। उनका दिल पसीज जाता है। जब इस तरह उपचार होने के बाद भी संतान सुख प्राप्त नही होता है। जब संतान सुख की चाह रखने वाले जब पहले दिखाने के लिए जाते है, तब आईवीएफ सेंटर वाले उनकों 100 प्रतिशत तक भरोसा दिलाते है कि संतान सुख प्राप्त हो जाएगा। पूर्ण विश्वास में लेकर परिवार की आस बंधा देते हैं। इसके बाद जब प्रोसेस असफल होता है तो अस्पताल प्रशासन हाथ खींच लेते हैं। इस तरह निजी अस्पताल आईवीएफ तकनीक से मातृत्व सुख के नाम पर मजबूर परिवारों को लूट रहे हैं।




