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Thursday, July 9, 2026, 5:31 am

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शहरी सेवा शिविर : आवारा पशुओं से लोगों की जान पर बन आई…नौ दिनों में जोधपुर में एक भी आवारा पशु को नहीं पकड़ा, सीएम साहब जवाब दो क्यों इस मुद्दे को शामिल किया?…

राइजिंग भास्कर कॉलम: दिलीप कुमार पुरोहित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से राजस्थान में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की समस्याओं के लिए शुरू हुए शिविर खानापूर्ति बनकर रह गए…कहीं राजनीतिक दांव-पेंच में उलझे, कहीं अफसर रुचि नहीं ले रहे, एक बात कॉमन- पूरे राजस्थान में आवारा पशुओं की समस्या सबसे अधिक है, मगर इस मुद्दे को अब तक शिविरों में छुआ तक नहीं…सीएम साहब जनता पूछ रही है- क्याें सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए ऐसे ज्वलंत मुद्दे को शामिल किया जब आपके अफसरों ने काम करने का मानस ही नहीं बनाया?

बात शुरू करते हैं- आज का वीडियो देखे- आवारा सांड ने महिला का क्या हाल किया?
यह वीडियो आज चैनल 24 प्लस न्यूज पर चल रहा है। जोधपुर में चैनपुरा बावड़ी गोकुलजी की प्याऊ के पास की घटना है। आवारा सांड ने महिला को बुरी तरह उछालकर घायल कर दिया। महिला गंभीर थी और अस्पताल में भर्ती थी, अब क्या स्थिति है अपडेट हमारे पास नहीं हैं? लेकिन यह अपडेट हम राइजिंग भास्कर के पाठकों को बताने का साहस कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिन 17 सितंबर को हमने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में राजस्थान में शुरू हो रहे शिविरों की जो प्रशंसा की थी और उसमें जो संदेह और सवाल उठाए थे वो आज भी कायम है। अफसरों की काेई जमीनी तैयारी नहीं है। पूर्ववर्ती सरकार की तरह भजनलाल सरकार ने भी प्रधानमंत्री के जन्मदिन के दिन का समय चयन कर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का प्रयास किया और राजस्थान में ये शिविर या तो राजनीतिक दांव-पेंच में उलझकर रह गए हैं या फिर अफसरों की मनमानी और उदासीनता की भेंट चढ़ गए हैं। जिन मुद्दों को शामिल किया गया, उन मुद्दों से संबंधित काम हो ही नहीं रहे हैं। पूरे राजस्थान की जनता आवारा पशुओं की समस्या से त्रस्त है। शहरी सेवा शिविर में आवारा पशुओं को पकड़ने का मुद्दा शामिल किया गया था। मगर हम मुख्यमंत्रीजी से सवाल करते हैं कि सीएम साहब कहां गई आपकी संवेदनशीलता? कहां गई आपकी मुद्दों पर पकड़? कहां गई आपकी जनता के प्रति सहानुभूति? कहां गया आपको जनता को दिया भरोसा और आश्वासन? आप हर मोर्चे पर फेल हुए। इस प्रकार के शिविर अशोक गहलोत सरकार ने भी शुरू किए थे, तब भाजपा ने शोर मचाया था, अब शोर मचाने की बारी कांग्रेस की है। मगर शोर मचाना ही लोकतंत्र की नियती बनकर रही गई है। लोकतंत्र ना होकर शोरतंत्र होकर रह गया है। विधानसभा से लेकर संसद तक शोर ही तो हो रहा है! संसद से लेकर सड़क तक शोर ही तो हो रहा है! समस्याओं का कभी समाधान नहीं होता। सभी कुओं में भांग मिली हुई है। राजनेता और अफसर जनता को गुमराह कर रहे हैं। कोई भी तंत्र अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रहा। मीडिया से उम्मीद थी मगर वह एक तस्वीर दिखाने वाला बनकर रह गया है। मुद्दों पर विधायिका, ब्यूरोक्रेसी और न्यायपालिका के खिलाफ लिखने का साहस नहीं जुटा पाता। इसी वजह से परेशानियां बढ़ती जा रही है। कोई भी बड़ा मीडिया घराना अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभा रहा। विज्ञापन और टीआरपी बढ़ाने के चक्कर में लोकतंत्र का कबाड़ा हो रहा है। शब्द अपनी गरिमा खो रहे हैं। कौन खरी-खरी लिखेगा? मठो और दलों और विचारधाराओं की लड़ाई में समस्याओं की अनदेखी कर लोकतंत्र को खोखला किया जा रहा है। पूंजीवादी ताकतों के हाथों में अधिकतर मीडिया घराने हैं जो माफिया की तरह काम कर रहे हैं। पूंजीवादी ताकतों के मीडिया घराने अराजग होते जा रहे हैं। हाईफाई लोगों के मुद्दे उठाए जा रहे हैं और आम मुद्दे जो जनता को तकलीफ दे रहे हैं उनकी बराबर अनदेखी हो रही है।

राजस्थान में शिविर हुए तब हमने लिखा था- अच्छी शुरुआत…। माफ करना भजनलाल जी हम गलत थे। हमने सोचा था मेरा बेटा अब आवारा कुत्तों से बेफिक्र होकर स्कूल जाएगा। मगर आपके अफसरों ने मेरे शहर में एक भी आवारा कुत्ता नहीं पकड़ा। आपके अफसरों ने एक भी आवारा सांड नहीं पकड़ा। आपके अफसरों ने आवारा पशुओं के मुद्दे को छुआ तक नहीं। यह समस्या मेरे शहर जोधपुर तक ही सीमित नहीं है। यह समस्या पूरे राजस्थान की है। जब आपके अफसरों में इतना साहस ही नहीं था कि आवारा पशुओं को पकड़ने का साहस दिखाते तो फिर आपकी सूची में इस मुद्दे को शामिल ही क्यों किया गया? भजनलाल जी जब आपकी सरकार शिविरों की योजना बना रही थी और अफसर प्रजेंटेशन दे रहे थे तो कहीं न कहीं आपकी भी उस सूची और उन मुद्दों पर सहमति रही होगी। मगर आपने तनिक भी विचार नहीं किया कि क्या इन मुद्दों पर आपकी सरकार खरी उतरेगी? क्या अफसर आपकी सरकार की किरकिरी तो नहीं करवाएंगे? मगर यही हो रहा है भजनलाल जी। आपकी सरकार की जनता में किरकरी हो रही है। आपके अफसर आपको सही चेहरा नहीं दिखाएंगे। बड़े-बड़े मीडिया घराने जो छाप रहे हैं वो हकीकत नहीं है। हकीकत जानना है तो आप खुद सड़कों पर उतरो। जोधपुर में विभिन्न कच्ची बस्तियों और मोहल्लों में आठ-दस किलोमीटर पैदल चलो। हो सकता है कोई आवारा सांड आपको सींग मारने काे तैयार बैठा हो? या यह भी हो सकता है कि रेबिज का पीडित कोई कुत्ता आपको काटने के लिए इंतजार कर रहा हो? सीएम साहब आवारा पशुओं की समस्या राजस्थान के गांव-गांव और शहर-शहर की है। न्यायपालिका अपना काम जिम्मेदारी से नहीं कर रहा। राजस्थान हाईकोर्ट ने नगर निगम को कई बार आदेश दिया कि आवारा पशुओं को पकडृा जाए मगर हाईकोर्ट में इतनी ताकत ही नहीं रही कि वह अपने ही आदशों की अफसरों से पालना करवा पाए। कहीं न कहीं यह न्यायपालिका की खुद की कमजोरी दिखाती है। हाईफाई मुद्दों पर न्यायपालिका तुरंत संज्ञान लेता है, मगर आप पब्लिक के मुद्दों पर लगातार अनदेखी कर रहा है। राइजिंग भास्कर कई बार जनहित के मुद्दे उठाता है, मगर न्यायपालिका उसकी अनदेखी करता है। हमारा उद्देश्य न्यायपालिका की मानहानि करना कभी नहीं रहा। मगर जनहित के मुद्दों पर न्यायपालिका से उम्मीद करना और उम्मीद पूरी नहीं होने पर आह भी नहीं करना, यह कहां की समझदारी है। बोलो तो मान हानि और चुप रहो तो काम नहीं…फिर तो बोलना ही हमें सही लगता है। कहते हैं कि बिना रोए तो मां भी अपने बच्चे को दूध नहीं पिलाती। मगर यहां तो न्यायपालिका चिल्लाने के बाद भी अफसरों से काम करवाने में अपने को असफल पाता है। फिर किसके दरवाजे पर जाकर फरियाद करें। हमने 16 सितंबर को एक आलेख लिखा था और आवारा पशुओं का मुद्दा उठाया था, मगर आज दिन तक हाईकोर्ट ने प्रसंज्ञान नहीं लिया। यही मुद्दा अगर तथाकथित बड़े मीडिया घराने उठाते तो न्यायपालिका तुरंत एक्शन लेता और बड़े मीडिया घराने इम्पैक्ट के साथ छापते और उसे भुनाते। मगर यहां यह भेद स्पष्ट हो जाता है।

हमारा सवाल अपनी जगह कायम है। आज शिक्षा एवं पंचायती राज एवं प्रभारी मंत्री मदन दिलावर जोधपुर में  थे। उन्होंने शहरी शिविर का जायजा लिया। तारीफों के पुल बांधे। विज्ञप्तियां भी जारी हो गईं। हमने भी प्रकाशित की। मगर दुखती रग पर हाथ भी रख रहे हैं। मंत्री जी आपने अपना धर्म नहीं निभाया। आप जिस शहर में आए उस शहर में एक चैनल ने आवारा सांड से घायल महिला का दृश्य दिखाया, मगर आपकी सरकार ने जिस मुद्दे को सूची में शामिल किया और आप इस मुद्दे पर एक शब्द नहीं बोले। क्या आपकी सरकार ने वादा नहीं किया कि शहरी क्षेत्रों से आवारा पशुओं को पकड़ा जाएगा? फिर क्यों नहीं पकड़े जा रहे आवारा पशु? मंत्रीजी आपको जवाब देना ही होगा। मगर आप जवाब नहीं देंगे तो जनता जवाब लेकर रहेगी। फिर भी आप नहीं बोलेंगे तो जनता आपकी बोलती बंद करना भी जानती है। जनता ने आपको अपने लिए बोलने की जुबान दी है तो जनता आपकी जुबान पर लगाम भी लगा सकती है। लोकतंत्र में आप जनता की पीड़ा को नहीं सुनेंगे तो जरूरी नहीं की जनता आपको और आपकी सरकार को झेलती जाए। कोई भी सरकार जनता से बड़ी नहीं हो सकती। चाहे भजनलाल जी हो, चाहे अशोक जी हो चाहे वसुंधरा जी हो। जो जनता की नहीं सुनेगा, जनता उन्हें क्यों चुने? लोकतंत्र में कोई भी सरकार आए उसे जनता के हितों के लिए काम करना पड़ेगा। काम नहीं करना है तो सेवा के लिए राजनीति में आते ही क्यों हो? कोई परचून की दुकान खोलकर बैठ जाओ। कोई पेट्रोल पंप खोलकर बैठ जाओ और कमाई करते जाओ।
भजनलाल जी अभी भी कुछ नहीं बीता है। शेष दिनों में सभी मुद्दों को ग्रामीण और शहरी शिविरों में शामिल करो। खासकर आवारा पशुओं से राजस्थान को मुक्त करो। अगर कोई एनजीओ और संगठन आवारा पशुओं को पकड़ने का विरोध करता है तो उन्हें उनकी जमीन दिखाओ। उनके एनजीओ के रजिस्ट्रेशन कैंसिल करो। कुछ सख्ती बरतो। लोग मर रहे हैं और पशुओं के कल्याण के नाम पर आप एनजीओ को दादागिरी करने की छूट दे दो यह कहां का न्याय है? पशुओं के कल्याण के लिए गोशालाएं हैं। कई पशु कल्याण संस्थाएं हैं। जब वे अपनी जिम्मेदारी सही ढंग से नहीं निभा रहे तो क्या आवारा पशु सड़क और मोहल्लों पर लोगों की जान ले लेंगे? क्या बच्चों का सड़क पर चलने का अधिकार नहीं हैं? क्या छोटे-छोटे बच्चे गली-मोहल्लों में खेलने के अपने नैसर्गिक अधिकार से वंचित हो जाएं? भजनलाल जी जरा सोचो, आपकी सरकार ने शिविर शुरू किए हैं तो आवारा पशुओं को पकड़ने के लिए अफसरों को सख्त निर्देश दो। नहीं तो बीच में ही रोक दो शिविरों को और माफी मांग लो जनता से। कह दो जनता से कि अफसरों के आगे हमारी सरकार बेबस है। …बात लंबी हो गई है, मगर बात लंबी होते हुए भी खरी है। कुछ तो एक्शन होना ही चाहिए सीएम साहब।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor