श्री मानव सेवा जीवदया समिति के सचिव ओपेक गोलिया से इंटरव्यू
कड़ाके की सर्दी हो, या उमस भरी शाम, या फिर हो बरसाती सांझ—जोधपुर में एक ऐसी जगह भी है जहां इंसानियत रोज़ अपने हाथों से रोटी परोसती है। यहां भीड़ जरूरत से नहीं, विश्वास से जुटती है।
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
कड़ाके की सर्दी हो, या उमस भरी शाम या हो बरसाती सांझ—जोधपुर में एक ऐसी जगह भी है जहां इंसानियत रोज़ अपने हाथों से रोटी परोसती है। यहां भीड़ जरूरत से नहीं, विश्वास से जुटती है। कोई फटे कम्बल में लिपटा खड़ा है, कोई नंगे पांव आया है, किसी की नजरों में उम्मीद तैरती है, तो किसी की हथेलियां थाली थामे कांप रही हैं—मगर इन सबके बीच एक चीज़ साझा है: भरोसा कि आज भी कोई उन्हें भूखा नहीं सोने देगा। श्री मानव सेवा जीवदया समिति, जोधपुर द्वारा 14 वर्षों से नियमित निशुल्क रूप से जमीकंद रहित सात्विक भोजन शाम को स्थानीय काल टेक्स टाउन हॉल के बाहर प्रतिदिन वितरित किया जाता है। समिति द्वारा गौ माता को चारा, लापसी, पक्षियों को दाना-पानी भी दिया जाता है। राइजिंग भास्कर ने समिति के सचिव ओपेक गोलिया से लंबी बातचीत की। यहां प्रस्तुत हैं संपादित अंश :-
राइजिंग भास्कर : समिति की शुरुआत कैसे हुई और इसके पीछे प्रेरणा कौन रहे?
ओपेक गोलिया : इस पहल की जड़ मेरे पिता स्व. भोमराज गोलिया के हृदय में थी। उन्होंने वर्षों पहले स्टेडियम के पास फुटपाथ पर भूख से बिलखते लोगों को देखा था। उनके चेहरे पर निराशा और बेबसी देख उनका मन पसीज गया। उन्होंने ठान लिया कि शहर में कोई भूखा नहीं सोए। परिवार और मित्रों से चर्चा कर समिति बनाई गई और भोजन सेवा शुरू हुई। यह उनके सपनों का बीज था, जिसे हमने आगे बढ़ाया।
राइजिंग भास्कर : पिछले 14 सालों में यह सेवा किस तरह निरंतर चलती रही?
ओपेक गोलिया : यह हमारे लिए केवल सेवा नहीं, बल्कि एक संकल्प है। कड़ाके की सर्दी हो, तपती गर्मी या बरसात—we never stopped. त्योहार, लॉकडाउन, आपदा—सब आए और गए, लेकिन समिति ने एक भी दिन विराम नहीं लिया। यह काम न दान है, न दिखावा। यह जिम्मेदारी है। जब पूरा शहर बंद था, तब भी हमारे स्वयंसेवक मास्क, दवाइयां और भोजन लेकर जरूरतमंदों तक पहुंचे। यही निरंतरता हमें “मानवता की चलती-फिरती रसोई” बनाती है।
राइजिंग भास्कर : भोजन वितरण की विशेषता क्या है?
ओपेक गोलिया : हम प्रतिदिन कालटेक्स टाउन हॉल के बाहर जमीकंद रहित सात्विक भोजन वितरित करते हैं। इसमें केवल भोजन ही नहीं, विश्वास और अपनापन भी शामिल है। भोजन लेने वालों में रिक्शा चालक, मजदूर, बुजुर्ग महिलाएं और ऐसे लोग होते हैं जिनकी तकलीफ वे खुद भी बयान नहीं कर पाते। उनके लिए यह थाली सिर्फ अन्न नहीं, बल्कि सम्मान और संवेदना लेकर आती है।
राइजिंग भास्कर : समिति में लोग कैसे जुड़ते हैं और योगदान किस तरह होता है?
ओपेक गोलिया : कोई भी व्यक्ति 500 रुपए या अधिक देकर आजीवन सदस्य बन सकता है। दिलचस्प बात यह है कि परिवार भी व्यक्तिगत स्तर पर सेवा से जुड़ते हैं। अगर कोई अपनी सालगिरह, जन्मदिन, स्मृति दिवस या पूर्वजों की पुण्यतिथि पर भोजन करवाना चाहता है, तो मात्र 2500 रुपए में साधारण और 3500 रुपए में मिष्ठान्नयुक्त भोजन से 100 से अधिक लोगों को भोजन कराया जा सकता है। परिवार खुद मौके पर खड़े होकर परोसते हैं। यह क्षण उनके लिए भावनात्मक संतोष का कारण बन जाता है।
राइजिंग भास्कर : इस सेवा से जुड़ी कोई स्मृति जो आपके दिल को गहराई से छू गई हो?
ओपेक गोलिया : हां, कई बार हम ऐसे लोगों तक पहुंचे जो दो-दो दिन से भूखे थे। एक बार एक वृद्ध व्यक्ति ने थाली लेते हुए आंसुओं से कहा—“रोटी देखे इतने दिन हो गए कि हाथ कांपने लगते हैं।” यह दृश्य हमें भीतर से झकझोर गया। उस क्षण हमने महसूस किया कि हमारा काम केवल पेट भरना नहीं, बल्कि आत्मा को संबल देना भी है।
राइजिंग भास्कर : इस पहल को सफल बनाने में किन लोगों की भूमिका सबसे अहम है?
ओपेक गोलिया : हमारी टीम ही इस सेवा की रीढ़ है। कोई रोज़ सब्जियां लाता है, कोई गैस सिलेंडर देता है, कोई सुबह चार बजे उठकर रसोई की तैयारी करता है और कोई शाम को काम से लौटकर पैकेट बांटने आता है। वेतन या प्रचार की चाह बिना, यह लोग अनगिनत हाथों से सेवा का सिलसिला आगे बढ़ा रहे हैं। यही वजह है कि यह काम 14 साल से बिना रुके जारी है।
राइजिंग भास्कर : इस सेवा से समाज में क्या बदलाव महसूस हुआ है?
ओपेक गोलिया : सबसे बड़ा बदलाव नजरिये का है। कई उद्योगपति, प्रोफेशनल और समाजसेवी जुड़े हैं। सबका कहना है कि जब आप किसी भूखे को रोटी देते हैं, तो अपनी आत्मा को भोजन कराते हैं। किसी ने सही कहा है—गरीब खाना नहीं, भरोसा मांगता है। जब थाली में अन्न परोसा जाता है तो सामने वाला केवल पेट नहीं भरता, बल्कि यह विश्वास भी पाता है कि समाज अभी जीवित है और इंसान अभी इंसान है।
राइजिंग भास्कर : आने वाले समय में समिति का क्या लक्ष्य है?
ओपेक गोलिया : हम चाहते हैं कि यह सेवा ऐसे ही निरंतर जारी रहे। खासतौर से सेवाभावी लोग अपना सहयोग बनाए रखें। संस्कारों में सेवा का भाव जिंदा रहे। हमारा सपना वही है, जो मेरे पिता ने देखा था—शहर में कोई भूखा न सोए। भोजन की थाली सिर्फ अन्न नहीं, बल्कि मानवता का जीवित प्रमाण बने। श्री मानव सेवा जीवदया समिति का काम यह बताता है कि सेवा का अर्थ केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि किसी अनजान व्यक्ति की चिंता करना भी है। हर थाली यहां एक संदेश देती है—कि दुनिया में अभी भी संवेदना बाकी है, और इंसानियत जिंदा है।
इनका रहता है सक्रिय सहयोग :
समिति में विशेष रूप से भोजन वितरण एवं अन्य सेवाओं में श्रीमती अशोका गोलिया, मनमोहन कर्णावत, लिखमीचंद बागरेचा, प्रतापसिंह राजपुरोहित, प्रदीप परिहार, महिपतराज भंसाली, विजय कांकरिया, एडवोकेट मनीष सुराणा, विक्रमसिंह चाड़वास, सज्जनसिंह कर्णावत, मुकेश बोहरा, संपत गुलेच्छा, कैलाश कांकरिया, ज्ञानचंद सांवल, श्रीमति रतन जैन, दीपिका जैन, जगमोहन, लक्की सांखला, आदि सदस्यों की सहभागिता रहती है।
श्री मानव सेवा जीव दया समिति की कार्यकारिणी :
संस्थापक संयोजक : स्व. भोमराज गोलिया
संस्थापक : श्रीमती अशोक गोलिया धर्मपत्नी स्व. भोमराज गोलिया
मुख्य संरक्षक : मनमोहन कर्णावट
संरक्षक : लिखमीचंद बागरेचा
अध्यक्ष : प्रताप सिंह राजपुरोहित
वरिष्ठ उपाध्यक्ष : प्रदीप परिहार
उपाध्यक्ष : महिपतराज भंसाली
सचिव : ओपेक गोलिया
सह सचिव : विजय कांकरिया
कोषाध्यक्ष : मुकेश बोहरा
सह कोषाध्यक्ष : संपत गुलेच्छा
भोजन वितरण प्रभारी : इकबाल घाटीवाला, विक्रमसिंह चाड़वास











