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Thursday, July 9, 2026, 5:29 am

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माया केयर फाउंडेशन का मूलमंत्र बुजुर्ग-दिव्यांगजन अपने को अकेला ना समझें… परिवार के बाद सबसे अच्छा साथ; भारत के 72 शहरों, ब्रिटेन के 4 और काठमांडू में भी सक्रिय

माया केयर की सबसे बड़ी उपलब्धि है — वृद्धजनों की आंखों में लौटी उम्मीद की चमक। कई बुजुर्ग जो अकेलेपन से टूट चुके थे, आज स्वयंसेवकों की संगति से मुस्कुराना सीख चुके हैं।

माया केयर फाउंडेशन के नेशनल को-ऑर्डिनेटर अभिजीत माली से विशेष इंटरव्यू

दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

माया केयर फाउंडेशन देश के बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है। इसकी देश में 72 शहरों में शाखाएं हैं। ब्रिटेन के चार शहरों और नेपाल के काठमांडू में भी शाखाएं हैं। संस्था का उद्देश्य बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की केयर करना है। उनको यह अहसास कराना है कि वे अकेले नहीं है और उनका खोया हुआ आत्मविश्वास लौटाना है। संस्था 2009 से कार्यरत है। संस्था के नेशनल को-ऑर्डिनेटर अभिजीत माली से लंबी बातचीत हुई। यहां पेश है संपादित अंश-

स्थापना की प्रेरणा और उद्देश्य

राइजिंग भास्कर : माया केयर फाउंडेशन की स्थापना का मूल उद्देश्य क्या था और इसकी प्रेरणा कहां से मिली?
अभिजीत माली : माया केयर फाउंडेशन की स्थापना समाज के दो सबसे उपेक्षित वर्गों — वृद्धजन और दिव्यांगजन — को यह एहसास दिलाने के लिए की गई कि वे अकेले नहीं हैं।
इसकी शुरुआत 2009 में हुई, जब संस्थापक को ब्रिटेन की एक ट्रेन यात्रा के दौरान एक अनुभव ने झकझोर दिया — वहां उन्होंने देखा कि उचित सहयोग मिलने पर दिव्यांगजन कितनी गरिमा और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जी सकते हैं।
यह अनुभव उनके बचपन के भारतीय संयुक्त परिवार की याद दिलाता था, जहां बुजुर्ग हमेशा प्रेम और देखभाल से घिरे रहते थे। परंतु आधुनिक जीवनशैली में व्यस्तता के कारण यह दृश्य धीरे-धीरे धूमिल होता गया।
इसी कमी को पूरा करने की भावना से माया केयर की नींव रखी गई — एक ऐसा मंच जो नि:शुल्क सेवाओं से बुजुर्गों को सहयोग और दिव्यांगजन को सम्मानजनक रोजगार प्रदान करता है।

“संवेदनाओं, अनुभवों और करुणा से जन्मा माया केयर आज भी उसी सिद्धांत पर काम करता है — गरिमा, सहानुभूति और समावेश के साथ सेवा।”

समाज की प्रारंभिक प्रतिक्रिया

राइजिंग भास्कर : जब यह सेवा शुरू की, तब समाज की प्रतिक्रिया कैसी रही?
अभिजीत माली :  2009 में शुरुआत में माया केयर संस्थापकों के वेतन से ही चलता था। कोई बाहरी सहायता नहीं थी, पर उद्देश्य स्पष्ट था — बुजुर्गों को सम्मान और स्नेह के साथ नि:शुल्क सेवा देना।
शुरुआत में लोग जिज्ञासु थे, क्योंकि यह अवधारणा नई थी — दिव्यांग और स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली नि:शुल्क सेवा।
धीरे-धीरे ईमानदारी और निरंतरता ने समाज का विश्वास जीता। आज हजारों स्वयंसेवक, दाता और सहयोगी इस मिशन का हिस्सा हैं, जो दर्शाता है कि समाज ने इस पहल को अपनाया है।

बुजुर्गों के जीवन में परिवर्तन

राइजिंग भास्कर : माया केयर की सेवाओं से बुजुर्गों के जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन क्या आया है?
अभिजीत माली : माया केयर की सबसे बड़ी उपलब्धि है — वृद्धजनों की आंखों में लौटी उम्मीद की चमक।
कई बुजुर्ग जो अकेलेपन से टूट चुके थे, आज स्वयंसेवकों की संगति से मुस्कुराना सीख चुके हैं।

“स्वयंसेवक भानु प्रताप मेरे लिए दवाइयाँ लेकर आए। माया केयर का दिल से धन्यवाद, जिन्होंने कठिन समय में साथ दिया।”
ऐसे हर अनुभव हमारे लिए केवल रिकॉर्ड नहीं, बल्कि आशीर्वाद हैं।

भावनात्मक सुरक्षा और परिवार जैसा साथ

राइजिंग भास्कर : आपके स्वयंसेवक बुजुर्गों को परिवार जैसी भावनात्मक सुरक्षा कैसे देते हैं?
अभिजीत माली :  हमारा मंत्र है — “परिवार के बाद सबसे अच्छा साथ।”
स्वयंसेवक केवल मदद नहीं करते, बल्कि साथ निभाते हैं। वे अस्पताल जाते हैं, बातें करते हैं, उनका हाथ थामते हैं और भावनात्मक सहारा बनते हैं।
उनकी उपस्थिति बुजुर्गों को यह एहसास दिलाती है कि वे किसी परिवार का हिस्सा हैं।

“हर मुस्कान, हर आंसू, हर स्पर्श — उस भावनात्मक सुरक्षा का निर्माण करता है, जो केवल परिवार दे सकता है।”

नि:शुल्क सेवा के पीछे की सोच

राइजिंग भास्कर :  “पूरी तरह नि:शुल्क सेवाएं” देने के पीछे आपकी क्या सोच है?
अभिजीत माली :  माया केयर की दर्शनशक्ति सरल है —

“हम सेवा करते हैं प्रेम से, धन के लिए नहीं।”
हम मानते हैं कि सच्चा प्रेम नि:शुल्क होता है।
जैसे माता-पिता अपने बच्चों से प्रेम का मूल्य नहीं मांगते, वैसे ही बुजुर्गों की सेवा भी निस्वार्थ होनी चाहिए।
हमारा सिद्धांत है:
देना, लेना नहीं।
सेवा करना, कमाना नहीं।
प्रेम देना, प्रत्याशा नहीं।

स्वयंसेवकों का अनुभव

राइजिंग भास्कर : आपके स्वयंसेवकों का अनुभव कैसा रहा?
अभिजीत माली : हमारे स्वयंसेवकों के लिए सेवा एक भावनात्मक यात्रा है।
हर मुलाकात बुजुर्गों में मुस्कान लाती है और स्वयंसेवकों को आंतरिक संतोष।

“हर बार जब कोई बुजुर्ग हमें आशीर्वाद देता है, हमें लगता है हमने अपने ही परिवार का साथ दिया।”

तकनीक और करुणा का संगम

राइजिंग भास्कर : तकनीक बुजुर्गों का जीवन कैसे आसान बना रही है?
अभिजीत माली : माया केयर ने तकनीक को मानवता के सेतु के रूप में अपनाया है —

  • Salesforce CRM: हर सेवा का सटीक रिकॉर्ड रखता है।

  • WhatsApp: संवाद और त्वरित जुड़ाव का माध्यम।

  • Zoom / Google Meet: दूर बसे परिजनों से वीडियो कॉल के ज़रिए जुड़ाव।

  • Google Workspace: शेड्यूलिंग और रिपोर्टिंग को सरल बनाता है।
    इससे सेवा व्यवस्थित, पारदर्शी और भावनात्मक रूप से जुड़ी रहती है।

बुजुर्गों की सबसे बड़ी आवश्यकता

राइजिंग भास्कर : आपकी नज़र में बुजुर्गों की सबसे बड़ी आवश्यकता क्या है — भावनात्मक या शारीरिक?
अभिजीत माली : दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
शारीरिक सहयोग के साथ जब संवेदना जुड़ती है, तभी सच्ची सेवा होती है।
एक स्वयंसेवक का साथ बुजुर्ग को केवल सहारा नहीं, बल्कि सुरक्षा और आत्मीयता देता है।

अब तक की पहुंच

राइजिंग भास्कर : अब तक माया केयर फाउंडेशन कितने बुजुर्गों तक पहुंचा है?
अभिजीत माली : अब तक 4,538 से अधिक बुजुर्गों को माया केयर की नि:शुल्क सेवाओं से लाभ मिला है।

स्वयंसेवकों की प्रेरणा

राइजिंग भास्कर : आपके स्वयंसेवकों को सेवा के लिए क्या प्रेरित करता है?
अभिजीत माली : उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है करुणा और उद्देश्य।
माया केयर उन्हें आत्मसंतोष, सामाजिक मान्यता और जीवन का नया दृष्टिकोण देता है।

“यह यात्रा केवल सेवा की नहीं, आत्मिक विकास और प्रेम की यात्रा बन जाती है।”

भावनात्मक अनुभव

राइजिंग भास्कर : कोई ऐसा अनुभव जो दिल को छू गया हो?
अभिजीत माली : हां, 90 वर्षीय डॉ. मैरी ग्रोज़ब्रो की कहानी।
वृद्धावस्था में अकेलेपन से जूझ रहीं इस दंपति के घर माया केयर के स्वयंसेवक पहुंचे —

“आपने हमारे शांत घर में फिर से जीवन लौटा दिया।”
ऐसे अनुभव हमें याद दिलाते हैं कि माया केयर केवल संगठन नहीं, एक भावनात्मक सेतु है।

समाज का दृष्टिकोण

राइजिंग भास्कर : समाज को वृद्ध देखभाल के प्रति कैसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए?
अभिजीत माली : एक संवेदनशील समाज की पहचान है — कृतज्ञता।
माया केयर मानता है कि बुजुर्गों की देखभाल सेवा नहीं, श्रद्धा है।
आज यह परिवर्तन 72 शहरों में दिखाई दे रहा है — जहां लोग आगे आ रहे हैं और एक दयालु समाज बना रहे हैं।

विस्तार की दिशा

राइजिंग भास्कर : क्या माया केयर अन्य देशों में विस्तार की योजना बना रहा है?
अभिजीत माली : हां, वर्तमान में माया केयर भारत के 72 शहरों, ब्रिटेन के 4 शहरों और नेपाल के काठमांडू में सक्रिय है।
अब विस्तार श्रीलंका और सिंगापुर तक करने की योजना है।

“यह विस्तार केवल स्थानों का नहीं, बल्कि प्रेम और गरिमा के प्रसार का प्रतीक है।”

स्वयंसेवकों को जोड़ने की प्रक्रिया

राइजिंग भास्कर : संगठन सेवा के इच्छुक लोगों को कैसे जोड़ता है?
अभिजीत माली : कोई भी व्यक्ति — छात्र, गृहिणी या पेशेवर — ऑनलाइन पंजीकरण कर माया केयर से जुड़ सकता है।
प्रशिक्षण के बाद उन्हें उनके शहर और भाषा के अनुसार बुजुर्गों से जोड़ा जाता है।
वर्चुअल वॉलंटियरिंग भी संभव है।
हर स्वयंसेवक को आईडी कार्ड और यूनिफॉर्म दी जाती है, जिससे भरोसा और सुरक्षा बनी रहती है।

सरकारी सहयोग

राइजिंग भास्कर : क्या माया केयर किसी सरकारी योजना से जुड़ा है?
अभिजीत माली : नहीं, माया केयर वर्तमान में स्वतंत्र संगठन के रूप में कार्यरत है और अपने स्वयंसेवकों व दाताओं के सहयोग से संचालित होता है।

भविष्य की दृष्टि

राइजिंग भास्कर : अगले पांच वर्षों में माया केयर की क्या दृष्टि है?
अभिजीत माली : 

  • भारत के 150+ शहरों तक विस्तार।

  • श्रीलंका और सिंगापुर में नई शाखाएं।

  • वर्चुअल साथ, टेलीहेल्थ और डिजिटल साक्षरता सेवाएं।

  • प्रोजेक्ट बिंदु के ज़रिए दिव्यांगजन को आर्थिक सशक्तिकरण।

  • ज़रूरतमंद बुजुर्गों को सहायक उपकरण जैसे छड़ी, व्हीलचेयर, हियरिंग एड प्रदान करना।

“हमारा सपना — एक ऐसी दुनिया जहाँ कोई बुजुर्ग कभी अकेला महसूस न करे।”

बुजुर्ग की मुस्कान का अर्थ

राइजिंग भास्कर : “बुजुर्ग की मुस्कान” आपके लिए क्या मायने रखती है?
अभिजीत माली : वह मुस्कान हमारे लिए आशीर्वाद है।
जब कोई बुजुर्ग अकेलेपन से जूझते हुए फिर मुस्कुराता है, वही हमारी सबसे बड़ी सफलता है।

“हर मुस्कान एक कहानी है, हर धन्यवाद एक प्रेरणा — यही माया केयर की असली उपलब्धि है।”

युवाओं के लिए संदेश

राइजिंग भास्कर : आप युवाओं को क्या संदेश देना चाहेंगे ताकि वे भी बुजुर्गों की सेवा करें?
अभिजीत माली : 

“दिल से सेवा करें, उद्देश्य से जुड़ें।”
एक छोटी-सी मुलाकात या मुस्कान भी किसी का जीवन बदल सकती है।
यह सेवा बोझ नहीं, आशीर्वाद है।
समय दें, सुनें, समझें।
जो दया आज आप देंगे, कल वही आपके पास लौटेगी।

सबसे बड़ी उपलब्धि

राइजिंग भास्कर : अब तक माया केयर की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही है?
अभिजीत माली :  बिना सरकारी सहायता के, केवल स्वयंसेवकों और दाताओं के सहयोग से माया केयर ने हजारों बुजुर्गों के जीवन में गरिमा और प्रेम लौटाया है।
युवाओं को प्रेरित करना कि “सेवा ही सबसे बड़ा सम्मान है” — यही हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

“माया केयर” नाम का अर्थ

राइजिंग भास्कर :  “माया केयर” नाम क्यों चुना गया और यह भावना क्या दर्शाता है?
अभिजीत माली : “माया” शब्द भारतीय भाषाओं में प्रेम, स्नेह और ममता का प्रतीक है।
यह नाम दर्शाता है कि हर बुजुर्ग को वही सम्मान मिले जो परिवार देता है।

“माया यानी ममता — और ममता ही सच्ची सेवा है।

माया केयर फाउंडेशन संस्था नहीं संवेदनशील परिवार

माया केयर फाउंडेशन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक संवेदनशील परिवार है — जो हर बुजुर्ग को प्रेम, सम्मान और अपनापन देने के मिशन पर कार्यरत है।
इसकी आत्मा तीन शब्दों में समाई है —

गरिमा, सहानुभूति और समावेश।

मदद के लिए यहां संपर्क करें।

18005721343 (toll free)
9552510400/11 for whatsapp
www.mayacare.org
service@mayacare.org
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor