दिवाली का पर्व तभी सार्थक है जब कोई गरीब बच्चा भी ये कह सके कि “आज मेरे घर भी दिवाली आई है।”
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर. जैसलमेर
दिवाली केवल रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि संवेदनाओं का पर्व है। यह वह क्षण है जब दीपक की लौ हमें याद दिलाती है कि अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी सी ज्योति भी उसे हराने में सक्षम होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी रोशनी केवल अपने घर तक सीमित रहनी चाहिए? क्या ये उत्सव केवल उन लोगों का है जिनके घरों में बिजली के जगमगाते झालर हैं, मिठाइयों की थालियां सजती हैं और महंगे पटाखों की गूंज सुनाई देती है? या फिर असल दीपावली वह होगी जब गरीब की झोपड़ी भी उसी प्रेम से जगमगाएगी, जब वृद्धाश्रम में बैठे किसी बुजुर्ग की आंखों में भी चमक लौटेगी और जब सीमा पर तैनात सैनिक की चौकी भी किसी धन्यवाद के दीपक से रोशन होगी।
इस बार दिवाली पर केवल अपने घर की चौखट ही नहीं, बल्कि गरीब की चौखट और सैनिक की चौकी भी सजनी चाहिए। यही सच्चा राष्ट्र धर्म और मानवीय कर्तव्य है।
रोशनी का असली हकदार कौन?
जब हम अपने घर के बाहर झालर लगाते हैं, सजावट करते हैं, तो उससे हमारा जीवन तो सुंदर दिखता है, लेकिन क्या उसने किसी और के अंधेरे को मिटाया? एक दीपक अगर किसी झोपड़ी के बाहर जल उठे, तो शायद वह रोशनी केवल मिट्टी के दीये में ही नहीं, बल्कि उस परिवार की आंखों में भी चमक उठे। ऐसे घर भी हैं जहां दिवाली का मतलब केवल रात के भोजन तक होता है, मिठाइयां तो वहां सपने जैसी होती हैं। ऐसे लोग भी हैं जिन्हें पटाखों की आवाज खुशियां नहीं, बल्कि असमानता की याद दिलाती है।
दिवाली का पर्व तभी सार्थक है जब कोई गरीब बच्चा भी ये कह सके कि “आज मेरे घर भी दिवाली आई है।”
दिव्यांग और वृद्ध — जिन्हें हम भूल बैठते हैं
त्योहारों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग को अक्सर अनदेखा कर देते हैं। दिव्यांग व्यक्ति, जो चल नहीं सकते, देख नहीं सकते या सुन नहीं सकते, क्या उनके लिए उत्सव का कोई अर्थ नहीं होना चाहिए? वृद्धाश्रम में बैठे वे बुजुर्ग, जिन्होंने कभी अपने बच्चों की कलाई पर दिवाली की राखी बांधी थी, आज अपनी सूनी हथेलियों में स्नेह की प्रतीक्षा करते रहते हैं। उनके लिए एक दीपक नहीं, बल्कि एक मुस्कान की जरूरत होती है। अगर दिवाली पर हम उनके पास बैठ जाएं, उनसे बातें कर लें, उन्हें अपना मान लें — तो यही सबसे बड़ा पूजा-पाठ होगा।
सैनिक — जो हमारी रोशनी के लिए अपने अंधेरे में रहते हैं
जब हम अपने घर में लक्ष्मी-पूजन कर रहे होते हैं, तब सीमा पर तैनात सैनिक अपने परिवार से दूर, ठंडी चौकियों पर खड़े होकर हमारे घर की सुरक्षा कर रहे होते हैं। उनके लिए दिवाली का मतलब केवल ड्यूटी होता है। वे कोई शिकायत नहीं करते, लेकिन क्या हमारा कर्तव्य नहीं कि हम उनके त्याग को सलाम करें? इस दिवाली यदि हम एक दीपक उनके नाम जलाएं, उनकी हिम्मत के लिए धन्यवाद संदेश भेजें या उनके परिवारों को याद करें — तो शायद उनकी चौकी भी रोशन हो उठेगी।
इस बार दीयों की गिनती नहीं, मुस्कानों की गिनती करें
हर घर में कितने दीये लगेंगे, कितनी सजावट होगी, कौन-सा पटाखा चलेगा — यह सब इस बार प्रश्न नहीं होना चाहिए। असली प्रश्न यह होना चाहिए — कितने घरों में हमारी वजह से रोशनी पहुंची?
कितने चेहरों पर इस बार हमारी वजह से मुस्कान आई?
कितनी आंखों ने इस बार नम होकर हमें आशीर्वाद दिया?
असली उत्सव — जब हम “देने वाले” नहीं, “साझा करने वाले” बनें
कई लोग मानते हैं कि दान देना ही सबसे बड़ा पुण्य है। लेकिन दिवाली केवल “दान” का नहीं, बल्कि “साझा करने” का पर्व है। गरीब को मिठाई देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके साथ बैठकर खिलाना भी जरूरी है। वृद्धाश्रम में खाना बांटना काफी नहीं, बल्कि उनके साथ दीप जलाकर बातें करना अधिक जरूरी है। दिव्यांग बच्चे को खिलौना देना अच्छा है, लेकिन उसके साथ खेलना असली प्रेम है।
दीपावली को एक आंदोलन बनाएं
अगर हम सब ठान लें कि इस बार दिवाली पर केवल अपने घर नहीं, बल्कि किसी और के घर में भी दीया जलाएंगे, तो यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन जाएगा। ज़रूरत है कि हम समाज में यह संदेश दें — “दिवाली केवल सम्पन्न लोगों का पर्व नहीं, बल्कि संवेदनशील लोगों का पर्व है।”
आइए संकल्प लें
इस बार कम से कम एक गरीब परिवार तक रोशनी पहुंचाएं।
किसी वृद्धाश्रम या अनाथालय में जाकर दीप जलाएं।
दिव्यांग बच्चों के साथ समय बिताएं।
सैनिकों के नाम एक संदेश या दीप अर्पित करें।
पटाखों पर खर्च होने वाली राशि में से कुछ हिस्सा सेवा कार्य के लिए निकालें।
दिवाली का दीप केवल तेल और बाती से नहीं जलता — वह प्रेम, कर्तव्य और करुणा से प्रज्वलित होता है। अगर इस बार हम थोड़ी सी रोशनी अपने घर से उठाकर किसी जरूरतमंद के घर तक ले जाएं, तो विश्वास मानिए — भगवान भी यहीं उतरकर आशीर्वाद देने आएंगे।










