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Saturday, January 24, 2026, 1:53 am

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खुलासा : कांग्रेस-मुस्लिमों का आतंकवादी गठजोड़ पुराना है; सोनिया गांधी की सह पर मनमोहन सरकार की कार्रवाई- डीजी वंजारा, दिनेश एमएन और साथियों ने सात साल जेल में गुजारे, केंद्र में भाजपा को बहुमत ना मिलता तो आज भी जेल में सड़ रहे होते देशभक्त पुलिस अफसर

एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी की अप्रकाशित पुस्तक “द डर्टी पॉलिटिक्स” पब्लिश हो गई तो देश में मचेगा बवाल, ब्लैक ज्यूडिशरी, राजनीतिक अराजगता और कांग्रेस-मुस्लिम आतंकवाद पर देश में छिड़ेगी बहस

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली 
सोनिया गांधी की सह पर कांग्रेस की मनमोहन सरकार के इशारे पर सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी की कथित मुठभेड़ में हत्या के मामले में तत्कालीन डीआईजी डीजी वंजारा, दिनेश एमएन और अन्य लोगों को सात साल जेल भुगतनी पड़ी थी। यह खुलासा हुआ है एक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी की अप्रकाशित पुस्तक “द डर्टी पॉलिटिक्स” से। पूर्व आईपीएस ने बताया कि गुजरात में हिंसापूर्ण गतिविधियों, आतंक के खात्मे और गैरकानूनी उगाही और अंडरवर्ल्ड गतिविधियों के खात्मे में मोदी सरकार लगी हुई थी। गुजरात में जहां यह जाहिर हो चुका था कि सोहराबुद्दीन जबरन वसूली करने वाला कुख्यात गुंडा था। कइयों की नजर में वह आतंकवादी था तो कोई उसे भ्रष्ट पुलिस वालों का गुर्गा मानता था। यह कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस का और मुस्लिम आतंकवाद का पुराना नाता रहा है। भ्रष्टाचार का दूसरा नाम कांग्रेस है। कांग्रेस राज में जितनी अराजगता फैली उसका हिसाब लेने बैठ जाओ तो कहानी कभी खत्म नहीं होने वाली। देश में मुस्लिम आतंकवाद का दूसरा नाम कांग्रेस है। 2002 से 2003 के बीच सोहराबुद्दीन, तुलसीराम प्रजापति और मोहम्मद आजम (जो बाद में सीबीआई के लिए अहम गवाह बना) ने एक गैंग बनाई थी। यह गैंग उदयपुर, अहमदाबाद और उज्जैन के मार्बल व्यापारियों और फैक्ट्री मालिकों से उगाही करती थी।
सोहराबुद्दीन आतंकी ही था? न्याय व्यवस्था की लचरता ने पुलिस की बली ली, अगर पुलिस दोषी थी तो फांसी क्यों नहीं हुई, बाद में रिहा क्यों किया?
पूर्व आईपीएस की पुस्तक में खुलासा हुआ कि अब्दुल लतीफ (जिसकी कथित तौर पर पुलिस कस्टडी से भागने की कोशिश में गोली लगने के बाद मौत हुई थी) के मारे जाने के बाद सोहराबुद्दीन पर नेशनल सिक्यॉरिटी एक्ट समेत करीब 50 मामले चल रहे थे। सोहराबुद्दीन आतंकी ही था, क्योंकि कांग्रेस के कई भ्रष्ट आईपीएस गुर्गे और पुलिस कर्मचारी उनसे मिले हुए थे। डीजी वंजारा ने उसे अंडरवर्ल्ड के साथ रिश्ते रखने वाला शार्प शूटर बताया था। वंजारा के मुताबिक, वो आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारों पर कुछ बड़े राजनेताओं की हत्या करने की साजिश बना रहा था। सीबीआई की एक चार्जशीट (जिसके हिस्से को टाइम्स ऑफ इंडिया में छापा गया था) के मुताबिक, सोहराबुद्दीन आईपीएस अधिकारी अभय चुडासमा का गुर्गा था। इन दोनों की उगाही और आपराधिक गतिविधियों में 75:25 की भागीदारी थी। मोहम्मद आजम (एक समय अपराधों में शेख का सहयोगी, बाद में सीबीआई के लिए मुख्य गवाह) के कई दावों में से एक दावा 2010 में सीबीआई द्वारा चुडासमा की गिरफ्तारी की एक वजह बना था। हालांकि सीबीआई चुडासमा के खिलाफ आरोपों को साबित नहीं कर सकी। क्योंकि पूर्व आईपीएस के अनुसार सीबीआई के अफसर ही उसे बचा रहे थे। इतना साफ हो चुका था कि सोहराबुद्दीन आतंकवादी ही था और देशद्रोह की गतिविधियों में लिप्त था। देशभक्त पुलिस अफसरों ने जब उसके खिलाफ एक्शन लिया तो मीडिया ने हल्ला मचाया। मानवाधिकार संगठनों ने शोर किया और केंद्र की मनमोहन सरकार ने सोनिया गांधी की सह पर देशभक्त अफसरों को कानून के शिकंजे में घेर लिया। वर्षों तक पेशियां, गवाह और केस चलता रहा और देशभक्त अफसर जेल की चक्की पीसते रहे। अगर केंद्र में भाजपा ( मोदी ) सरकार ना बनती तो शायद ये देशभक्त अफसर ब्लैक जस्टिस के शिकार होकर आज भी जेल में अंधेरी रातें काट रहे होते। 
मई 2014 में भाजपा का आगमन : देशभक्त अफसरों की रिहाई का संदेश लाया
पूर्व आईपीएस ने बताया कि मई 2014 में मोदी सरकार का आगमन देशभक्त अफसरों की रिहाई का संदेश लेकर आया। अगर मोदी सरकार केंद्र में ना आती तो आज भी डीजी वंजारा और दिनेश एमएन जैसे निर्भीक और देशभक्त अफसर कानून की सलाखों के पीछे अपनी देशभक्ति की सजा काट रहे होते। मोदी सरकार के आने के बाद मुस्लिम आतंकवाद पर नकैल कसा। यही नहीं मुस्लिम आतंकवाद के साथ ही पाक को समय-समय पर सबक सिखा कर मोदी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान प्रायोजित आंतकवाद को न केवल बेनकाब किया वरना उसके खात्मे की दिशा में कारगर कदम भी उठाए। यह संभव हुआ मोदी सरकार के राज में देशभक्त आईपीएस अफसरों को खुली छूट मिलने के कारण। 

ब्लैक जस्टिस का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा? : अगर डीजी वंजारा, दिनेश एमएन दोषी थे तो रिहा क्यों हुए? और निर्दोष थे तो सात साल जेल में क्यों बिताए? न्याय तुरंत क्यों नहीं हुआ?

पूर्व आईपीएस ने सवाल उठाया कि भारतीय न्याय प्रणाली का स्याह पक्ष यह है कि यहां न्याय ना होता है और ना ही न्याय होता नजर आता है। वर्षों तक विचाराधीन कैदी जेल में सजा काटते रहते हैं। जब आईपीएस अफसर जैसे लोग सात-सात जेल में सजा काटते रहेंगे तो आम आदमी के साथ न्याय होना संभव ही नहीं है। कांग्रेस सरकार और आतंकवाद के तार लंबे समय से जुड़े रहे हैं। आजादी के बाद से ही कांग्रेस का मुस्लिम गठबंधन आतंकवाद को बढ़ावा देता आया है। कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति ने हमेशा मुस्लिमों को मोहरा बनाया। देश में अराजगतापूर्ण गतिविधियों में मुस्लिमों को कांग्रेस ने मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया। 2007 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार थी, जो कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का हिस्सा थी। यह सरकार 2004 से 2014 तक सत्ता में रही। और कांग्रेस सरकार के रहते डीजी वंजारा और दिनेश एमएन कभी जेल से बाहर नहीं आ पाए। और अगर भाजपा को मई 2014 में बहुमत ना मिलता तो आज तक जेल में ही सड़ते रहते देशभक्त अफसर। सीबीआई की विशेष अदालत ने सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी, की कथित मुठभेड़ में हत्या के मामले में तत्कालीनडीआईजी डीजी वंजारा, दिनेश एमएन अन्य लोगों को बरी कर दिया। वे इस मुठभेड़ को आयोजित करने के आरोप में सात साल से जेल में थे।

अमित शाह पर भी लगा था आरोप : अगर भाजपा का मोदी कार्ड फेल होता तो शाह भी जेल में होते?

पूर्व आईपीएस ने बताया कि गौरतलब है कि सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में अमित शाह पर भी आरोप लगे थे। 2002 से 2012 तक मोदी सरकार में गुजरात में गृह, विधि एवं न्याय, कारागार, सीमा सुरक्षा, नागरिक सुरक्षा, आबकारी, होमगार्ड, परिवहन, मद्य निषेध, ग्राम रक्षक दल, पुलिस आवास, विधायी एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री भी रहे। अगर भाजपा का मोदी कार्ड फेल हो जाता तो अमित शाह भी आज जेल में होते? राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। अमित शाह के साथ-साथ नरेंद्र मोदी के भी कांग्रेसी दुश्मन बन गए होते। 

किस आधार पर एनकाउंटर को फेक बताया गया

अप्रकाशित पुस्तक में उल्लेख करना बताया है कि एनकाउंटर के कुछ हफ्तों बाद सोहराबुद्दीन के भाई रबाबुद्दीन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा कि वह सोहराबुद्दीन की मौत को लेकर गुजरात पुलिस के बयान से सहमत नहीं हैं। इसके साथ ही उन्होंने सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी के (उस वक्त) गायब होने पर भी चिंता जताई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के मारे जाने और कौसर बी के गायब होने के मामले में गुजरात पुलिस को जांच के आदेश दिए। इस मामले की जांच करने वाली गुजरात पुलिस के CID (क्राइम) की आईजी गीता जौहरी ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में उन्होंने सुझाव दिया कि इस मामले को सीबीआई के हवाले किया जाना चाहिए। अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का ज्रिक किया था। इतना ही नहीं, अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में जौहरी ने इस मामले से अमित शाह (गुजरात सरकार के तत्कालीन मंत्री) के रूप में राज्य सरकार की संलिप्तता की बात कही थी। गीता जौहरी की रिपोर्ट का क्या हुआ कोई नहीं जानता?

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में प्रकाशित खबरों का मजमून:

पूर्व आईपीएस ने बताया कि घोषित रूप से सब जानते हैं कि 23 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन शेख अपनी पत्नी कौसर बी के साथ एक बस में हैदराबाद से अहमदाबाद जा रहा था। रात के 1:30 बजे गुजरात पुलिस के एंटी-टेरर स्क्वॉड (ATS) ने महाराष्ट्र के सांगली में बस रुकवाई। इसके बाद ATS ने सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी को बस से उतारा।  3 दिन बाद यानी 26 नवंबर 2005 की सोहराबुद्दीन की गोली लगने से मौत हो गई, जिसे पुलिस के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल डीजी वंजारा ने एनकाउंटर करार दिया। पुलिस ने अपने बयान में कहा, ”शेख अहमदाबाद के नरोल इलाके से ऑपरेट कर रहा था. जब पुलिस ने उसे विशाला सर्कल के पास मोटरसाइकल पर देखा, तो उसे रोकने की कोशिश की, मगर जब वो नहीं रुका, तो पुलिस वालों पर उसने फायरिंग की। पुलिस वालों ने अपनी रक्षा के लिए जो कार्रवाई की, उसमें वो मारा गया।

राजनीतिज्ञ बच गए, फंस गए पुलिस अफसर : नीचे तथ्यों से समझें :

  • पूर्व आईपीएस ने बताया कि राज्य सरकार को सर्वोच्च अदालत में मानना पड़ा था कि सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की योजना बनाई गई थी।
  • गीता जौहरी की रिपोर्ट में तत्कालीन मंत्री अमित शाह पर भी आरोप थे।
  • जब सरकार ने माना कि एनकाउंटर की योजना बनाई गई तो मंत्री अमित शाह आरोप के बावजूद कैसे बच गए?
  • तीन आईपीएस अधिकारियों- डीजी वंजारा, राजकुमार पांड्यन और दिनेश कुमार की गिरफ्तारी हुई। जनवरी 2010 में सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार इस मामले की जांच को सीबीआई के हवाले कर दिया।
  • सीबीआई के बारे में यह बात जाहिर हो चुकी है कि वह केंद्र सरकार के दबाव में ही कार्रवाई करती है। बताया जाता है कि यह मुकदमा सीबीआई की अदालत में चलता रहा और भ्रष्ट आईपीएस अफसर अभय चुड़ासमा के खिलाफ सारे सबूत गायब कर दिए गए।
  • अगर मई 2014 में भाजपा को केंद्र में बहुमत ना मिला होता तो डीजी वंजारा, दिनेश एमएन जैसे देशभक्त अफसर जेल में ही बंदी होते। लेकिन भाजपा की केंद्र में एंट्री पर सीबीआई की विशेष अदालत ने देशभक्त अफसरों को रिहा कर दिया।

कौन है दिनेश एमएन?  एटीएस एडीजी बनने पर फिर चर्चा में :  

आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन 1995 बैच के अधिकारी है, जिनका जन्म 6 सितंबर 1971 को कर्नाटक के चिक्काबलल्लापुर जिले के मुनगनहल्ली गांव में हुआ था। उन्होंने 1993 में इंजीनयरिंग की पढ़ाई पूरी की और पहले ही प्रयास में यूपीएससी परीक्षा पास करके आईपीएस अधिकारी बने। उनका पूरा नाम मुंगनहल्ली नारायणस्वामी दिनेश है। दिनेश एमएन ने राजस्थान के विभिन्न जिलों में एसपी के रूप में काम किया है। 2014 में जेल से रिहा होकर वापस सेवा में लौटे।
  • जन्म: 6 सितंबर 1971
  • स्थान: मुनगनहल्ली गांव, चिक्काबल्लापुर जिला, कर्नाटक।
  • पिता का नाम: नारायण स्वामी (जो एक तहसीलदार थे)। ‘एम’ का अर्थ मुनगनहल्ली और ‘एन’ का अर्थ नारायण स्वामी है।
  • शिक्षा: 1993 में बीडीटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग में बीई की डिग्री प्राप्त की।
  • विवाह: 25 फरवरी 1999 को के. विजयलक्ष्मी से विवाह हुआ। उनकी पत्नी ने पीएचडी कर रखा है। 

कॅरियर और उपलब्धियां

  • प्रारंभिक पोस्टिंग: 1998 में दौसा में एएसपी के रूप में पहली पोस्टिंग हुई थी।
  • अन्य पद: सवाई माधोपुर, झुंझनू, उदयपुर और अलवर जैसे जिलों में एसपी रहे।
  • सोहराबुद्दीन एनकाउंटर: उदयपुर के एसपी रहते हुए, सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ के आरोप में उन्हें 2007 में गिरफ्तार किया गया और 2014 तक सात साल जेल में बिताए।
  • जेल से रिहाई के बाद: जेल से छूटने के बाद, उन्होंने राजस्थान एसीबी में आईजी के रूप में कार्यभार संभाला और एक बड़ी कार्रवाई में कई भ्रष्ट अधिकारियों को गिरफ्तार किया।
  • कुख्यात अपराधियों का सफाया: एसओजी में रहते हुए उन्होंने कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह को मुठभेड़ में मारा था।
  • पद और जिम्मेदारियां: राजस्थान में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध) रहे। उनके नेतृत्व में राजस्थान में एक “एंटी गैंगस्टर्स टास्क फोर्स” का गठन किया गया। अब उन्हें एटीएस में एडीजी की जिम्मेदारी मिली है। 

एटीएस के एडीजी बने दिनेश एमएन, निर्भीक अफसरों के सिर पर हमेशा कांटों का ताज रहता है 

अब राजस्थान में एटीएस के एडीजी के रूप में दिनेश एमएन को जिम्मेदारी दी गई है। वाकई निर्भीक अफसरों के सिर पर तो कांटों का ताज ही रहता है। दिनेश एमएन एक ऐसा नाम है जिसके नाम से अपराधी कांपते हैं। मगर जैसा कि होता आया है निर्भीक और देशभक्त पुलिस अफसरों के सिर पर हमेशा कांटों का ताज ही रहता है। अब दिनेश एमएन को अपने हाथ बचाते हुए कई आतंकवादी गिरोह को बेनकाब करने की जिम्मेदारी है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor