ब्लैक जस्टिस का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा? : अगर डीजी वंजारा, दिनेश एमएन दोषी थे तो रिहा क्यों हुए? और निर्दोष थे तो सात साल जेल में क्यों बिताए? न्याय तुरंत क्यों नहीं हुआ?
अमित शाह पर भी लगा था आरोप : अगर भाजपा का मोदी कार्ड फेल होता तो शाह भी जेल में होते?
किस आधार पर एनकाउंटर को फेक बताया गया
अप्रकाशित पुस्तक में उल्लेख करना बताया है कि एनकाउंटर के कुछ हफ्तों बाद सोहराबुद्दीन के भाई रबाबुद्दीन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था। इस पत्र में उन्होंने लिखा कि वह सोहराबुद्दीन की मौत को लेकर गुजरात पुलिस के बयान से सहमत नहीं हैं। इसके साथ ही उन्होंने सोहराबुद्दीन की पत्नी कौसर बी के (उस वक्त) गायब होने पर भी चिंता जताई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के मारे जाने और कौसर बी के गायब होने के मामले में गुजरात पुलिस को जांच के आदेश दिए। इस मामले की जांच करने वाली गुजरात पुलिस के CID (क्राइम) की आईजी गीता जौहरी ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में उन्होंने सुझाव दिया कि इस मामले को सीबीआई के हवाले किया जाना चाहिए। अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का ज्रिक किया था। इतना ही नहीं, अपनी प्राथमिक रिपोर्ट में जौहरी ने इस मामले से अमित शाह (गुजरात सरकार के तत्कालीन मंत्री) के रूप में राज्य सरकार की संलिप्तता की बात कही थी। गीता जौहरी की रिपोर्ट का क्या हुआ कोई नहीं जानता?
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में प्रकाशित खबरों का मजमून:
राजनीतिज्ञ बच गए, फंस गए पुलिस अफसर : नीचे तथ्यों से समझें :
- पूर्व आईपीएस ने बताया कि राज्य सरकार को सर्वोच्च अदालत में मानना पड़ा था कि सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की योजना बनाई गई थी।
- गीता जौहरी की रिपोर्ट में तत्कालीन मंत्री अमित शाह पर भी आरोप थे।
- जब सरकार ने माना कि एनकाउंटर की योजना बनाई गई तो मंत्री अमित शाह आरोप के बावजूद कैसे बच गए?
- तीन आईपीएस अधिकारियों- डीजी वंजारा, राजकुमार पांड्यन और दिनेश कुमार की गिरफ्तारी हुई। जनवरी 2010 में सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार इस मामले की जांच को सीबीआई के हवाले कर दिया।
- सीबीआई के बारे में यह बात जाहिर हो चुकी है कि वह केंद्र सरकार के दबाव में ही कार्रवाई करती है। बताया जाता है कि यह मुकदमा सीबीआई की अदालत में चलता रहा और भ्रष्ट आईपीएस अफसर अभय चुड़ासमा के खिलाफ सारे सबूत गायब कर दिए गए।
- अगर मई 2014 में भाजपा को केंद्र में बहुमत ना मिला होता तो डीजी वंजारा, दिनेश एमएन जैसे देशभक्त अफसर जेल में ही बंदी होते। लेकिन भाजपा की केंद्र में एंट्री पर सीबीआई की विशेष अदालत ने देशभक्त अफसरों को रिहा कर दिया।
कौन है दिनेश एमएन? एटीएस एडीजी बनने पर फिर चर्चा में :
- जन्म: 6 सितंबर 1971
- स्थान: मुनगनहल्ली गांव, चिक्काबल्लापुर जिला, कर्नाटक।
- पिता का नाम: नारायण स्वामी (जो एक तहसीलदार थे)। ‘एम’ का अर्थ मुनगनहल्ली और ‘एन’ का अर्थ नारायण स्वामी है।
- शिक्षा: 1993 में बीडीटी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार इंजीनियरिंग में बीई की डिग्री प्राप्त की।
- विवाह: 25 फरवरी 1999 को के. विजयलक्ष्मी से विवाह हुआ। उनकी पत्नी ने पीएचडी कर रखा है।
कॅरियर और उपलब्धियां
- प्रारंभिक पोस्टिंग: 1998 में दौसा में एएसपी के रूप में पहली पोस्टिंग हुई थी।
- अन्य पद: सवाई माधोपुर, झुंझनू, उदयपुर और अलवर जैसे जिलों में एसपी रहे।
- सोहराबुद्दीन एनकाउंटर: उदयपुर के एसपी रहते हुए, सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी मुठभेड़ के आरोप में उन्हें 2007 में गिरफ्तार किया गया और 2014 तक सात साल जेल में बिताए।
- जेल से रिहाई के बाद: जेल से छूटने के बाद, उन्होंने राजस्थान एसीबी में आईजी के रूप में कार्यभार संभाला और एक बड़ी कार्रवाई में कई भ्रष्ट अधिकारियों को गिरफ्तार किया।
- कुख्यात अपराधियों का सफाया: एसओजी में रहते हुए उन्होंने कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह को मुठभेड़ में मारा था।
- पद और जिम्मेदारियां: राजस्थान में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (अपराध) रहे। उनके नेतृत्व में राजस्थान में एक “एंटी गैंगस्टर्स टास्क फोर्स” का गठन किया गया। अब उन्हें एटीएस में एडीजी की जिम्मेदारी मिली है।
एटीएस के एडीजी बने दिनेश एमएन, निर्भीक अफसरों के सिर पर हमेशा कांटों का ताज रहता है
अब राजस्थान में एटीएस के एडीजी के रूप में दिनेश एमएन को जिम्मेदारी दी गई है। वाकई निर्भीक अफसरों के सिर पर तो कांटों का ताज ही रहता है। दिनेश एमएन एक ऐसा नाम है जिसके नाम से अपराधी कांपते हैं। मगर जैसा कि होता आया है निर्भीक और देशभक्त पुलिस अफसरों के सिर पर हमेशा कांटों का ताज ही रहता है। अब दिनेश एमएन को अपने हाथ बचाते हुए कई आतंकवादी गिरोह को बेनकाब करने की जिम्मेदारी है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









