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राजस्थान सरकार पर 30 साल में 4.50 लाख करोड़ मुख्य धन और 33500 करोड़ ब्याज बाकी; सरकार ने आरबीआई बॉन्ड के जरिए फिर जुटाए 5 हजार करोड़

प्रत्येक सरकारें विकास योजनाओं के नाम पर आसानी से आरबीआई बॉन्ड के जरिए बड़ी राशि ऋण के रूप में उठाती हैं, मगर यह भी सत्य है कि इस राशि का एक न एक दिन चुकारा करना होता है। अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 30 सालों में भी सरकार पूर्व के बॉन्ड के जरिए उठाए लोन का चुकारा नहीं कर पाई है।

दिलीप कुमार पुरोहित. जयपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

राजस्थान सरकार पर 30 साल में करीब 4.50 लाख करोड़ मुख्य धन और करीब 33500 करोड़ ब्याज की राशि बकाया है। मगर सरकार ने फिर से आरबीआई बॉन्ड के जरिए 5 हजार करोड़ रुपए विकास योजनाओं के नाम पर जुटाए हैं। प्रत्येक सरकारें विकास योजनाओं के नाम पर आसानी से आरबीआई बॉन्ड के जरिए बड़ी राशि ऋण के रूप में उठाती है, मगर यह भी सत्य है कि इस राशि का एक न एक दिन चुकारा करना होता है। अब तक के आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले 30 सालों में भी सरकार पूर्व के बॉन्ड के जरिए उठाए लोन का चुकारा नहीं कर पाई है। ऐसा भाजपा की भजनलाल सरकार ने पहली बार किया हो यह बात भी नहीं है। प्रत्येक सरकारें इस प्रकार आसानी से कर्जा उठा लेती है, मगर उसका चुकारा कभी नहीं होता और सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ता जाता है। पब्लिक भी इस मुद्दे पर खामोश रहती है और आर्थिक विशेषज्ञ भी नहीं बोलते। यह राशि पिछले तीस सालों में बढ़कर इतना बड़ा अमाउंट हो चुका है कि देखते ही माथे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं।

राजस्थान सरकार ने हाल ही में ₹5,000 करोड़ की रकम द्वारा Reserve Bank of India (RBI) के माध्यम से “स्टेट गारंटेड सिक्योरिटीज” (SGS) के रूप में बॉन्ड्स जारी कर विकास योजनाओं के लिए धन जुटाया है। इसे पहली नज़र में नए कर्ज की तरह नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह “सरकार द्वारा बॉन्ड जारी करना” है, लेकिन व्यावहारिक अर्थ में यह ऋण प्रक्रिया का ही एक रूप है — सरकार को भविष्य में इस राशि चुकानी ही होगी, साथ ही ब्याज देना होगा और समयबद्धता के साथ बॉन्ड की परिपक्वता भी देखनी होगी। पिछले 30 वर्षों में राजस्थान की इस तरह की कर्ज व्यवस्था का क्या स्वरूप रहा है, आज तक कितनी बकाया है, कितनी ब्याज देनी बाकी है, इस तरह के वित्तपोषण का लाभ-हानि क्या हैं, तथा क्या यह प्रक्रिया उचित है — यदि नहीं, तो किन वैकल्पिक प्रस्तावों पर विचार होना चाहिए।

SGS/बॉन्ड द्वारा राज्य सरकार की उधारी प्रक्रिया – समझ

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि “SGS” क्या हैं और राज्य सरकार के लिए बॉन्ड जारी करना/ऋण उठाना किस तरह काम करता है।

  • राज्य सरकारें अक्सर अपनी जरूरतों या विकास परियोजनाओं के लिए राजस्व से अधिक खर्च करती हैं, या राजस्व-घटित होती हैं। इसलिए बाहर से (उधारी) करना पड़ता है।

  • राज्यों के पास मुख्यतः दो प्रकार के स्रोत हैं — (1) केंद्र से उधार एवं (2) आंतरिक उधार (बॉन्ड, राज्य संस्थानों से उधार) ।

  • SGS (State Government Securities) या पहले SDL (State Development Loans) कहे गए बॉन्ड, राज्य द्वारा जारी की जाने वाली ऋण-सिक्योरिटीज़ हैं — जिनमें निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान, निजी निवेशक आदि) बॉन्ड खरीदते हैं, सरकार उस पर ब्याज देती है, व एक निश्चित अवधि (10-30 वर्ष आदि) में मूलधन चुकाती है। इस तरह यह सरकार का लम्बी अवधि का ऋण बन जाता है।

  • राजस्थान के “Annual Public Debt Management Report 2023-24” में यह स्पष्ट लिखा है कि राज्य अब लंबे-मियाद (मच्योरिटी) के बोर्ड जारी कर रहा है, ताकि “रोलओवर जोखिम” (राशि का हर वर्ष न चुकने का असर) कम हो सके।

  • यह प्रक्रिया हर वर्ष नियमित रूप से चलती है — यानी सरकार बजट से विकास कार्य करती है, पूंजी की कमी महसूस होती है, बॉन्ड जारी होते हैं, राशि आती है, कार्य चलते हैं, और अगले वर्षों में ब्याज एवं मूलधन चुकाने की जिम्मेदारी आती है।

राजस्थान में पिछले 30 वर्षों का परिप्रेक्ष्य

पिछली 30 सालों (लगभग) की ऋण-स्थिति पर निगाह डालें तो स्थिति चिंताजनक है। हर पांच साल में ऋण का आंकड़ा बढ़ता जाता है और ब्याज भी चढ़ता जाता है। पिछली सरकारें लोन लेती जाती है और आने वाली सरकारों पर बोझ बढ़ता जाता है। पिछले ऋण का चुकारा होता ही नहीं है और नया लोन चढ़ जाता है।

कुल बकाया ऋण की स्थिति

  • राजस्थान सरकार की “Annual Public Debt Management Report 2023-24” के मुताबिक, 2023-24 के अंत में राजस्थान की कुल सार्वजनिक ऋण (Public Debt = Internal Debt + Loans & Advances from GoI) लगभग ₹4,46,651.69 करोड़ थी।

  • रिपोर्ट में बताया गया है कि इसी अवधि में राज्य के “Internal Debt – State Government Securities” का हिस्सा ₹3,58,826.85 करोड़ था।

  • एक स्रोत के अनुसार “Outstanding Liabilities: Rajasthan: State Development Loans” (CEIC डेटा) 2025 में INR 4,185,628 मिलियन (यानि ₹4,18,562.8 करोड़) दर्ज है।

    • यह सिर्फ “State Development Loans” का हिस्सा है, अन्य ऋण (उदाहरण के लिए केंद्र से उधार, अन्य बॉन्ड आदि) इसमें शामिल नहीं।

  • स्पष्ट है कि पिछले 30 सालों में राजस्थान के ऋण का आकार बहुत बढ़ चुका है और अब यह GSDP (राज्य के सकल घरेलू उत्पाद) के अनुपात में भी महत्वपूर्ण हो गया है — रिपोर्ट में 2023-24 में राज्य का ऋण/%GSDP लगभग 37.4% बताया गया है।

SGS/बॉन्ड हिस्से की गतिशीलता

  • रिपोर्ट में यह भी दिखा है कि SGS (स्थानीय बॉन्ड) के हिस्से में “उच्च लागत वाले ऋण” (उच्च ब्याज दर वाले बॉन्ड) की हिस्सेदारी घट रही है।

  • एक अध्ययन (National Institute of Public Finance and Policy, NIPFP) में बताया गया है कि राज्यों द्वारा जारी बांड (SDL/SGS) का बाजार-आधार अभी भी सीमित है, बोली दरें सीमित तरलता के कारण प्रभावित होती हैं, और कुछ राज्यों पर बोझ बहुत अधिक केंद्रित हो गया है।

  • उदाहरण के लिए, राजस्थान ने 2023-24 में SGS में “>= 20 वर्ष” की मच्योरिटी वाले बॉन्ड्स 25.81% जारी किये थे।

ब्याज दर एवं मच्योरिटी प्रोफाइल

  • 2023-24 के अंत में राजस्थान के आउटस्टैंडिंग सार्वजनिक ऋणों में जो ब्याज-दर प्रोफाइल दी गयी है, उसके मुताबिक 7-7.99% वाले ऋणों की हिस्सेदारी 42.97% थी, 8-8.99% वाले 21.54% थे।

  • इस तरह, राज्य पहले उच्च ब्याज दर पर उधारी ले चुका है और अब थोड़ी बेहतर स्थिति में दिख रहा है, लेकिन मात्रा बहुत बड़ी है।

  • मच्योरिटी (मूलधन चुकाने की अवधि) के लिहाज़ से 2024-25 से आगे के हिस्से में काफी राशि अगले 10-20 वर्ष में परिपक्व होगी। उदाहरण के लिए, 2025-26 के लिए ₹37,432 करोड़ मच्योर होने वाली राशि बताई गई है।

वर्तमान बकाया: कितना चुकाना बाकी है?

बाकी राशि का विवरण उपलब्ध नहीं है, यह सिर्फ अनुमान लगाया जा रहा है।

बकाया राशि
  • 2023-24 में राजस्थान के कुल सार्वजनिक ऋण लगभग ₹4,46,651.69 करोड़ था।

  • यदि हम मान लें कि “SGS/बॉन्ड द्वारा जुटाई गयी राशि” (जो मूलधन चुकानी है) का एक बड़ा हिस्सा इस ऋण में शामिल है, तो यह बकाया राशि लगभग इसी स्तर पर है।

  • अतः, यह मानना सुरक्षित है कि सरकार के सामने अभी लगभग ₹4.4-4.5 लाख करोड़ (चार लाख पचास हजार करोड़) के स्तर पर मुख्यधन चुकानी बाकी है।

ब्याज का अनुमान
  • 2023-24 की रिपोर्ट से ब्याज-दर प्रोफाइल मालूम है (उदाहरण के लिए 7-7.99% वाले ऋणों की हिस्सेदारी ~43 %।)

  • यदि मुख्यधन बकाया ~₹4,46,652 करोड़ है और मान लें कि औसत ब्याज दर “~7.5 %” हो (यह सहज अनुमान है क्योंकि 6-7% वाले निर्भर हैं, 8% वाले भी हैं) — तो सिर्फ वार्षिक ब्याज लगभग ₹33,500 करोड़ (₹4,46,652 * 7.5 % ≈ ₹33,499) होगा।

  • यह राशि काफी मोटा अनुमान है—असल में कुछ ऋण अधिक ब्याज पर, कुछ कम पर होंगे, तथा कुछ नए बॉन्ड पर उच्च ब्याज पर होंगे जैसे वर्तमान में राजस्थान द्वारा जारी किया गया 7.23-7.57% वाला बॉन्ड।

  • यह कहना सुरक्षित है कि सरकार के अधर में हरेक वर्ष ₹30-35 हजार करोड़ के आसपास ब्याज का भुगतान बकाया हो सकता है।

  • अगर पिछले वर्षों में सरकार ने ब्याज और मूलधन चुकाया है तो वर्तमान बकाया उससे कम हो सकती है। पर चूंकि ऋण निरंतर बढ़ रहा है, इसलिए बकाया राशि भी बढ़ी है।

  • उदाहरण स्वरूप, 2018-19 में बकाया 2,19,311.50 करोड़ थी और 2023-24 में 3,99,857.52 करोड़ (आंतरिक ऋण) हो गई है।

  • इस तरह, यह स्पष्ट है कि बकाया राशि तेजी से बढ़ी है और भविष्य में चुकाना बाकि राशि और ब्याज महत्वपूर्ण चुनौती बने हुए हैं।

आरबीआई बॉन्ड के जरिए पैसा जुटाना कितना कारगर?

SGS/बॉन्ड द्वारा फंड जुटाना विकास परियोजनाओं व राज्य वित्त के दृष्टिकोण से फायदे व नुकसानों के कारणों से देखा जाना चाहिए।

पॉजिटिव असर
  1. विकास कार्यों के लिए पर्याप्त पूंजी उपलब्ध कराना

    • विकास योजनाएँ (सड़क, पनबंदी, स्मार्ट सिटी, कृषि-संस्करण इत्यादि) तुरंत चुनिंदा निधि से नहीं चल पातीं; इस तरह बॉन्ड द्वारा बड़ी राशि जुटाना जोखिम कम करता है।

    • राजस्थान के मामले में, ₹5,000 करोड़ जैसा नवीन बॉन्ड पहले से मौजूद प्रोजेक्ट्स को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

  2. मच्योरिटी बढ़ा कर रोलओवर जोखिम कम करना

    • जैसा रिपोर्ट में बताया गया है कि राजस्थान अब 20+ वर्ष की मच्योरिटी वाले बॉन्ड जारी कर रहा है, ताकि बार-बार नई उधारी लेने की जरूरत न पड़े।

    • इससे यह लाभ होता है — आज लिया गया ऋण लंबी अवधि तक चलेगा, अगली सरकार-परिवर्तन से सीधे प्रभावित नहीं होगा।

  3. बॉन्ड मार्केट में राज्य की विश्वसनीयता बनाना

    • नियमित बॉन्ड जारी करना, समय पर चुकाना, निवेशकों को भरोसा देता है। इससे भविष्य में बेहतर शर्तों पर उधारी लेने में सुविधा हो सकती है।

  4. मौद्रिक प्रबंधन में लचीलापन

    • सरकार को “उधारी + विकास” का संयोजन मिल जाता है — प्रत्यक्ष कर्ज लेने के बजाय बॉन्ड के जरिए रुपये जुटाना एक विकल्प है।

  5. वित्तीय अनुशासन की दिशा में संकेत

    • यदि बॉन्ड जारी करना और चुकाना समय पर हो, तो यह संकेत देता है कि सरकार अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को ध्यान में रखती है।

निगेटिव असर
  1. भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ बढ़ना

    • आज का विकास अगर इस उधारी द्वारा किया गया है लेकिन अगले 10-20-30 वर्षों तक ब्याज व चुकानी राशि की मर्यादा तय नहीं है, तो भविष्य की पीढ़ियाँ यह ऋण चुकाएंगी।

  2. उच्च ब्याज दर का जोखिम

    • यदि राज्य को उच्च ब्याज दर पर बॉन्ड जारी करना पड़े (जैसे राजस्थान ने इस बार ~7.23-7.57% पर) तो चुकानी राशि बढ़ जाती है और वित्तीय दबाव बन जाता है।

  3. रोलओवर/मच्योरिटी-बंचिंग का खतरा

    • यदि बहुत सारे बॉन्ड एक साथ परिपक्व हो जाएँ (मच्योरिटी एक-दो वर्षों में), तो सरकार को भारी राशि चुकानी होगी — यदि संसाधन न हों, तो पुनर्गठन करना पड़ सकता है।

    • रिपोर्ट में बताई गयी है कि 2024-25 में ₹30,592 करोड़, 2025-26 में ₹37,432 करोड़ मच्योर होने वाली राशि है।

  4. वित्तीय लचीलापन में कमी

    • उधारी का बोझ बढ़ने से आगामी बजट में ब्याज व चुकानी राशि के लिए निधि निकलना चाहिए — इससे अन्य खर्चों (स्वास्थ्य, शिक्षा, कल्याण) के लिए कम संसाधन बच सकते हैं।

  5. असमान विकास व जोखिम-संकेंद्रण

    • NIPFP अध्ययन में बताया गया है कि कुछ राज्यों में बांड बोझ बहुत केन्द्रित हो गया है, और उधारी-बाजार में तरलता कम है — जिससे राज्य की वित्तीय स्थितियों पर प्रभाव पड़ता है।

क्या इस प्रकार का कर्ज लेना उचित है?

इस प्रकार कर्ज लेना उचित है? इस प्रश्न पर भी विचार करना जरूरी है। लेकिन सरकारें आम तौर पर आरबीआई बॉन्ड के जरिए ऋण लेना जारी रखती है। इसके विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करना जरूरी है।

समर्थन में तर्क
  • यदि कर्ज उठाकर तुरंत उन निवेशों में लगाया जाए जो आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर हों, उत्पन्न आय देंगे (उदाहरण के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, राजस्व-उत्पादक परियोजनाएँ) — तब यह उचित है।

  • लंबे-मीयाद बॉन्ड द्वारा लोन लेने से आज के संसाधनों की कमी को दूर किया जा सकता है, और चुकानी अवधि बढ़ने से दबाव घट सकता है।

  • यदि राज्य सरकार ने वित्तीय अनुशासन अपनाया हो, ब्याज दरें ठीक-ठाक हों, ऋण-GSDP अनुपात नियंत्रण में हो — तब यह व्यवहार में स्वीकार्य विकल्प बन सकता है। राजस्थान की रिपोर्ट में ऋण/GSDP अनुपात 40.3 % से घटकर 37.4 % हुआ बताया गया है।

विरोध में तर्क
  • यदि कर्ज उठाया गया संसाधन ऐसे उपयोग में नहीं गया हो जहाँ से आय उत्पन्न हो सके, तो यह बोझ बन जाता है।

  • यदि ब्याज दरें अत्यधिक हों या मच्योरिटी बहुत नजदीक हो, तो अगले वर्षों में पुनर्भुगतान का दबाव बढ़ जाता है।

  • यदि हर वर्ष नई उधारी द्वारा पुरानी चुकानी जा रही हो (“रोएलओवर”), तो यह वित्तीय अस्थिरता को जन्म दे सकती है।

  • राजनीतिक-परिवर्तन के कारण सरकारों की प्राथमिकता बदलती रहती है — इसलिए योजना-निर्धारण लंबी अवधि का नहीं हो सकती, और कर्ज चुकाने का जिम्मा अगली सरकार पर आ जाता है।

आज का विकास, कल का बोझ भी बन सकता है

इसलिए, इस प्रकार का कर्ज उचित तभी होता है जब राज्य ने निर्धारित नियोजन, आय-उत्पादन वाला निवेश, मध्यम-वित्तीय जोखिम, लंबी मच्योरिटी और नियंत्रित ब्याज दरें सुनिश्चित की हों। अन्यथा यह “आज का विकास, कल का बोझ” का पैटर्न बना सकता है।

राजस्थान के लिए यदि देखा जाए, तो बॉन्ड जारी करना नियमित बन गया है, मच्योरिटी लंबी की जा रही है — यह सकारात्मक संकेत है। लेकिन ब्याज दरें अभी भी अपेक्षाकृत अधिक हैं, और बकाया राशि बहुत बड़ी है — इस प्रकार चुनौतियाँ भी स्पष्ट हैं।

वैकल्पिक प्रक्रिया / सुझाव

अगर यह प्रक्रिया पूरी तरह संतोषजनक नहीं है, तो राज्य सरकार के पास कुछ वैकल्पित सुझाव व सुधार-रास्ते हैं:

  1. आय-उत्पादन वाले निवेश पर ध्यान

    • विकास खर्च को सिर्फ “खर्च” की तरह नहीं लिया जाना चाहिए, बल्कि ऐसा निवेश होना चाहिए जिससे भविष्य में राजस्व बढ़े — जैसे चार्जेबल इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यटन-पैकेज, स्मार्ट-उद्योग पार्क, सौर ऊर्जा आदि।

    • इस तरह कर्ज की लागत (ब्याज + चुकानी) को निवेश से उत्पन्न आय द्वारा संतुलित किया जा सके।

  2. ऋण-माध्यायन और देयता-निर्धारण (Debt-Sustainability) हेतु मॉडेलिंग

    • प्रत्येक बॉन्ड जारी करने से पहले “मच्योरिटी प्रोफाइल”, “ब्याज लोड”, “भविष्य की राजस्व वृद्धि” आदि का विश्लेषण हो।

    • उदाहरण स्वरूप, कितनी राशि अगले 10-15 वर्षों में चुकानी है, कितनी ब्याज देनी है — इसे सार्वजनिक रूप से मञ्जूर किया जाना चाहिए।

  3. मच्योरिटी का विविधीकरण (Staggering maturities)

    • जैसा राजस्थान पहले नहीं कर रहा था लेकिन अब कर रहा है — विभिन्न अवधि (5-9 साल, 10-14, 15-19, ≥20-वर्ष) के बॉन्ड जारी करना ताकि एक-दो वर्षों में “चुकानी-दिवसों” का जमावड़ा न हो।

  4. ब्याज लागत कम करने की रणनीति

    • बेहतर क्रेडिट रेटिंग, मुद्रांकित बॉन्ड की बेहतर बाजार प्रचलन, बजट-अनुशासन, राज्य-उधार नीति आदि के माध्यम से ब्याज दरें कम हो सकती हैं। NIPFP अध्ययन में इस दिशा में सुझाव दिए गए हैं।

  5. पर्याप्त पारदर्शिता व निवेशक भरोसा

    • हर वर्ष ऋण-प्रबंधन रिपोर्ट प्रकाशित करना, मच्योरिटी व ब्याज-प्रोफाइल बताना, निवेशकों व नागरिकों को जानकारी देना — इससे विश्वसनीयता बढ़ती है।

  6. स्वस्थ बजट अनुशासन व राजस्व सुधार

    • कर्ज सिर्फ तभी लें जब नियमित राजस्व व सुधार की दिशा पर हो। उदाहरण के लिए, कर-व्यास बढ़ाना, सरकारी खर्चों में सुधार करना, अनावश्यक सब्सिडी-बोझ कम करना।

  7. विकास-परक ऋण और उपभोग-वृत्ति ऋण में विभाजन

    • कुछ खर्च उपभोग-प्रेरित होते हैं (सामान्य सभा खर्च, सब्सिडी-खर्च) — उन पर कर्ज लेना कम समझदारी है। विकास-उन्मुख खर्च (जो भविष्य में आय उत्पन्न करें) पर कर्ज लेना बेहतर।

30 वर्षों में कई सरकारें बदलीं, कर्ज चढ़ता गया

30 सालों में राजस्थान में सरकारें बदलती गई और ऋण चढ़ता गया। 5-6 वर्ष बाद सरकार बदल जाती है। पर पूर्व सरकार द्वारा लिया गया कर्ज चुकाना पड़ता है। लेकिन अब यह राशि बढ़कर राज्य सरकार पर बोझ बन चुकी है। इसे राजस्थान की पृष्ठभूमि में देखें तो पाएंगे5

  • राज­स्थान में 2015 तक की रिपोर्ट में बताया गया है कि डिस्कॉम (विद्युत वितरण कंपनियों) के बकाया ऋण बहुत अधिक हो गए थे — ₹80,529 करोड़ तक।

  • जब सरकार बदलती है, तो अगली सरकार को इस तरह की “विरासत ऋण” मिलती है — उसे ब्याज चुकाना होता है, मूलधन चुकानी होती है। विकास-प्राथमिकी बदल जाती है लेकिन चुकानी का क्रम जारी रहता है।

  • पिछले 30 वर्षों में राजस्थान के ऋण-स्तर बहुत बढ़े हैं — उदाहरण स्वरूप 2018-19 में बकाया ~₹2,19,312 करोड़ था, 2023-24 में ~₹3,99,858 करोड़ (आंतरिक ऋण) हो गया।

  • इस हिसाब से पिछले 30 वर्षों में सैकड़ों हजार करोड़ की राशि पर ब्याज चढ़ चुकी है — यदि हम प्रति वर्ष लगभग ₹30-35 हजार करोड़ ब्याज देना शुरू करें (जैसा पिछले भाग में अनुमान लगाया गया) और ये कई वर्ष चलते रहें, तो कुल “ब्याज चढ़ना” भी लाखों करोड़ रुपये तक पहुंच चुका होगा।

  • इसका अर्थ यह है कि राज्य के बजट में “ऋण-सेवा” (interest + principal repayment) का हिस्सा निरंतर बढ़ रहा है — अन्य सामाजिक व विकास खर्चों पर दबाव पड़ सकता है।

  • एक बार कर्ज चुकाने की क्रिया धीमी पड़ी या सरकार ने नई उधारी लेना जारी रखा, तो “कर्ज पर कर्ज” का चक्र बन सकता है, जो अगले सरकारों के लिए बोझ बन जाता है।

बॉन्ड से धन जुटाना ”दुस्साहस नहीं” पर ”निशुल्क भी नहीं”

अगर कहें कि बॉन्ड से धन जुटाना आदत नहीं होनी चाहिए तो गलत नहीं है। व्यापक विश्लेषण के बाद कुछ मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित होना ही चाहिए-

  • राजस्थान सरकार द्वारा बॉन्ड (SGS) द्वारा विकास-पूंजी जुटाना एक प्रमाणित और स्वीकार्य वित्तीय उपकरण है — लेकिन दुस्साहस नहीं, नि:शुल्क नहीं आता की अवधारणा भी जोड़नी होगी।

  • यदि यह राशि ऐसे विकास कार्यों में निवेश हो जहाँ से भविष्य में राजस्व या सामाजिक लाभ उत्पन्न हो, और ऋण-प्रबंधन (मच्योरिटी, ब्याज, चुकानी) अच्छी तरह से किया गया हो — तो यह उपयोगी हो सकता है।

  • वर्तमान स्थिति में — बकाया ऋण बहुत बड़ी है, ब्याज दरें अभी भी ऊँची हैं, और सरकारों-परिवर्तन की प्रकृति देखते हुए खतरें बने हुए हैं।

  • इसलिए, इस तरह के उधारी-रास्ते को “स्वतंत्र उपाय” न समझते हुए — एक नियंत्रित, दृष्टि-पूर्ण, पारदर्शी और दीर्घ-कालीन रणनीति का हिस्सा बनाना चाहिए।

  • सुझाव स्वरूप — राजस्व-उत्पादन वाला खर्च, मच्योरिटी-विविधता, ब्याज दर नियंत्रण, बजट अनुशासन, निवेश-रिटर्न विश्लेषण, निवेशक विश्वास निर्माण आदि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सरकारें कर्ज लेकर चली जाती हैं, भुगतना अगली सरकार को पड़ता है :

यह कहना भी उचित होगा कि “सरकारें तो कर्ज लेकर चली जाती हैं” — यह वास्तविकता है। इसलिए, आम नागरिक, निवेशक व बजट-नियोजनकर्ता को यह देखना होगा कि न सिर्फ आज की विकास-योजना कितनी भव्य है, बल्कि कल की चुकानी कितनी सुरक्षित है। यदि यह संतुलन बना रहे — तो राजस्थान जैसे राज्य को विकास के पथ पर भरोसेमंद रूप से आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor