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Saturday, January 24, 2026, 1:05 am

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तेजस्वी यादव का नारा हवा-हवाई : बिहार में हर परिवार सरकारी नौकरी संभव ही नहीं, वोटर्स को लालच और चुनावी स्टंट कर रहा महागठबंधन

बिहार के वोटर्स तेजस्वी यादव से पूछ रहे सरकारी नौकरियों का गणित…2.6 करोड़ सरकारी नौकरियों का बंदोबस्त करना जन भावना को भुनाने और बिना धरातल और बिना तैयारी बरगलाने के अलावा कुछ नहीं…कैसे यह नारा अव्यावहारिक है जानिए पटना से दिलीप कुमार पुरोहित की विशेष रिपोर्ट 

एक आईएएस अधिकारी की नजर से जानिए कैसे अव्यावहारिक है हर परिवार सरकारी नौकरी 

पटना। राजद और कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन ने अंतत: राजद नेता तेजस्वी यादव को सीएम फेस घोषित कर दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने पटना में गठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सभी 7 दलों के नेताओं की उपस्थिति में घोषणा की। गहलोत ने कहा कि इस चुनाव में मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर हम तेजस्वी यादव काे समर्थन देते हैं। कांग्रेस ने यह फैसला गठबंधन में दरार को रोकने के लिए लिया। तेजस्वी को सीएम फेस बनाना कांग्रेस की मजबूरी थी। गहलोत के सक्रिय होने के बाद कांग्रेस ने क्राइसिस मैनेजमेंट पर फोकस किया। पार्टी ने अपने डिप्टी सीएम की मांग भी छोड़ दी। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि फैसला देर से हुआ पर यह जरूरी था। अगर पहले होता तो पार्टी 61 चुनावों पर चुनाव नहीं लड़ पाती। इधर तेजस्वी यादव का “हर परिवार एक सरकारी नौकरी” का वादा लुभा रहा है। यह नारा बिहार में रफ्तार पकड़ता इससे पहले ही दम तोड़ता नजर आ रहा है और बिहार के युवा और बुद्धिजीवी तेजस्वी यादव से पूछ रहे हैं कि बताइए आप किस तरह 2.6 करोड़ सरकारी नौकरियों का इंतजाम करेंगे? राइजिंग भास्कर की ओर से इसकी ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की गई। बिहार में तेजस्वी यादव को आगे कर गठबंधन चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है और तेजस्वी यादव ने अपना अब तब का सबसे बड़ा दांव खेला और यह जुमला उछाला कि बिहार में हर परिवार में से एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जाएगी। हमारी इस रिपोर्ट का केंद्र बिंदु यही है कि क्या बिहार जैसे राज्य में हर परिवार सरकारी नौकरी का नारा धरातल पर साकार हो सकता है?

तेजस्वी यादव ने बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव में यह दावा किया है कि यदि महागठबंधन सरकार बनेगी तो “हर परिवार में एक सरकारी नौकरी” दी जाएगी। नारा भावनात्मक रूप से आकर्षक है — बेरोजगारी, नौकरियों की चाह और सामाजिक सुरक्षा की समस्या को सीधे संबोधित करता है। लेकिन इस नारे के पीछे कितनी असलियत है, कितनी व्यावहारिकता — यह सवाल उठना स्वाभाविक है। राइजिंग भास्कर ने बिहार में एक आईएएस अधिकारी से तेजस्वी यादव के हर परिवार सरकारी नौकरी के नारे की हकीकत जानी। उन्होंने सिलसिलेवार हर कड़ी का जवाब दिया।

बिहार की आबादी का बुनियादी परिमाण

सबसे पहले, राज्य की जनसंख्या पर नजर डालें।
– बिहार की आबादी 2025 के लिए विभिन्न स्रोतों में लगभग 13.04 करोड़ अनुमानित की गई है। 
– इस आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा कामकाजी उम्र में है, और युवाओं की संख्या काफी अधिक है। 
– साथ ही, राज्य का कार्य-जनसंख्या अनुपात (Worker Population Ratio, WPR) देश की औसत से नीचे है — राज्य में केवल 33.5 % श्रम में भागीदारी दर्ज की गई है।

इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 13 करोड़ लोगों वाले राज्य में रोजगार-प्राप्ति और नौकरी-उम्मीद के बीच बहुत बड़ा गैप मौजूद है।

“प्रति परिवार एक सरकारी नौकरी” का अनुमान और हकीकत :

अगर हम “हर परिवार” को इकाई मानें तो संख्या का अनुमान लगाना आसान होगा। अनुमानित आबादी 13 करोड़ है। मान लें कि एक परिवार में औसतन 5 लोग हैं (यह सामान्य भारतीय परिवार का अनुमानित मानदंड है)।

  • तो परिवारों की संख्या = 13 करोड़ ÷ 5 = लगभग 2.6 करोड़ परिवार।

  • यदि हर परिवार में एक सरकारी नौकरी देने का दावा किया गया है, तो लगभग 2.6 करोड़ सरकारी नौकरियों की आवश्यकता होगी।

  • अब अगर मान लें कि काम करने योग्य उम्र वाले (18-60 वर्ष) प्रति परिवार 1-2 लोग नौकरी चाहते हैं या योग्य हैं, तो वोटर-उम्मीद के हिसाब से परिवारों में कम-से-कम एक नौकरी की उम्मीद बहुत व्यापक है।

यह ध्यान में रखें कि “हर परिवार” में वास्तविकता में कितने योग्य लोग हैं, कितनी संख्या में बच्चे, वृद्ध, और आकस्मिक परिवार-स्थितियां हैं — यह सब अलग-अलग है। लेकिन इस मोटे अनुमान से यह स्पष्ट है कि लक्ष्य बहुत विशाल है।

बिहार में शिक्षा व नौकरी-उम्मीद की स्थिति

शिक्षा के स्तर के बिना बड़े पैमाने पर सरकारी नौकरी देना व्यवहार में कठिन है :

  • बिहार का साक्षरता दर — यदि 2023 के नए सर्वे के अनुसार देखें — लगभग 79.7 % तक पहुंच चुकी है।

  • फिर भी, ग्रामीण-शहरी, पुरुष-महिला के बीच बड़ा अन्तर मौजूद है; और शिक्षा की गुणवत्ता तथा उपयुक्तता (वे लोग जो स्नातक, योग्य, परीक्षा-उपयुक्त हों) की स्थिति कमजोर बनी हुई है।

  • रिपोर्ट बताती है कि प्राथमिक स्तर में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में अब भी काफी कमी है।

पटना निवासी युवक राजीव राज बताते हैं कि सिर्फ “परिवार में एक नौकरी” की बात करना सहज है, लेकिन यह देखने देखने में है कि कितने लोग वास्तव में योग्य हैं और कितने विभाग में ऐसे पद उपलब्ध हैं जिनके लिए योग्य-प्राप्ति संभव हो सके। एक आईएएस अधिकारी से राइजिंग भास्कर ने विस्तृत बातचीत की। उन्होंने बताया कि यह नारा धरातल पर खरा उतरता नजर नहीं आ रहा।

बिहार में नियुक्तियों की वर्तमान दर व संभावनाएं

आईएएस अधिकारी के अनुसार-

  • सरकार ने पहले ही घोषणा की है कि 5 वर्षों में 12 लाख (1.2 मिलियन) सरकारी नौकरियाँ घोषित की जाएंगी।

  • विभिन्न विभागों में अब भी लगभग 2.17 लाख शिक्षण पद खाली हैं — प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में मिलकर।

  • इसे व्यापक भर्ती-संख्या से जुड़ने पर पता चलता है कि सालाना भर्ती-संख्या सैंकड़ों हजार में भी नहीं पहुंच रही है, जबकि आवश्यकता करोड़ों की है।

आईएएस अधिकारी के अनुसार अगर हम सतही अनुमान लगाएं कि प्रतिवर्ष बिहार में सभी विभागों को मिलाकर 3 लाख सरकारी नौकरियों की भर्ती कर सकते हों (वास्तविक इससे कम है), तो पाँच वर्षों में भर्ती हो सकेगी लगभग 15 लाख नौकरियां। लेकिन यह भी “हर परिवार में एक नौकरी” के अनुमानित 2.6 करोड़ नौकरियों की तुलना में बहुत कम है।

वित्तीय बोझ और संसाधन की अटकलें

आईएए अधिकारी के अनुसार  यदि मान लें कि एक सरकारी नौकरी का औसतन वार्षिक वेतन, भत्ते तथा अन्य खर्च मिलाकर ₹ 5 लाख रखी जाए (यह केवल अनुमान है, विभाग-विभाग दर विभिन्न होगी) —

  • 2.6 करोड़ नए नौकरियों × ₹5 लाख = ₹ 13 लाख करोड़ प्रति वर्ष (₹ 13,00,00 करोड़)। यानी ₹ 13 लाख करोड़ = ₹ 13 लाख करोड़ = ₹ 13 00,000 करोड़।

  • यह राशि राज्य बजट के लिए आसमान छूने जैसा बोझ है। उदाहरण के लिए राज्य की जीडीपी, राजस्व व अन्य स्रोतों से यह संभव नहीं दिखता।

  • अगर नौकरियों की संख्या कम होकर 15 लाख बनी — पाँच वर्षों में — तब भी वार्षिक बोझ होगा 15 लाख × ₹5 लाख = ₹ 75,000 करोड़ (₹ 75 हज़ार करोड़) प्रति वर्ष। यह भी भारी है।

आईएएस अधिकारी की बात पर गौर करें तो पाएंगे कि इन आंकड़ों को देखें तो यह स्पष्ट है कि सरकार को इस नारे को पूरा करना आर्थिक रूप से संभव दिखता नहीं है — न ही भर्ती-संख्या, न ही वित्तीय संसाधन इस तरह के दावे को संभाल सकते हैं।

तर्कों की सूची — क्यों यह नारा अवास्तविक लगता है

  1. आवश्यक नौकरियों की संख्या: 2.6 करोड़ परिवारों को नौकरी देने के लिए उतने पद राज्य के सरकारी विभागों में उपलब्ध नहीं हैं — वर्तमान में लाखों ही नहीं दस-लाखों में पद हैं।

  2. योग्यता-माहिरता की कमी: शिक्षा-हिसाब, योग्य उम्मीदवारों की संख्या सीमित है। ऐसे में हर परिवार में एक योग्य उम्मीदवार होना स्वाभाविक नहीं।

  3. भर्ती की गति व भ्रष्टाचार: भर्ती प्रक्रिया में समय-लंबित, जटिल और कभी-कभी विवादित प्रक्रियाएं होती रही हैं; यह गति नहीं पकड़ सकती कि बहुत तेजी से करोड़ों भर्ती हो जाएं।

  4. वित्तीय अस्थिरता: सालाना इतने बड़े अतिरिक्त खर्च को राज्य पूंजी, कर-राजस्व व दीर्घकालीन बजट-प्रबंधन के तहत उठाना मुश्किल है।

  5. उच्च प्रतिस्पर्धा व असमर्थ सेवा-क्षेत्र: निजी क्षेत्र में भी रोजगार की कमी है; यदि हर परिवार को सरकारी नौकरी मिले, तो निजी क्षेत्र एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था सहित अन्य लिंक्ड सेक्टर प्रभावित होंगे।

  6. प्रत्याशा-प्रबंधन का भरोसा: इस तरह का नारायण देना आशा जगाता है लेकिन यदि पूरा नहीं हुआ तो महागठबंधन व सरकार की विश्वसनीयता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

राजनीतिक जुमले से अधिक कुछ नहीं वादा : 

राइजिंग भास्कर ने कई युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों से बातचीत की। सभी ने कहा कि यह राजनीतिक जुमले से अधिक कुछ नहीं। प्रथमेश, उमाशंकर, जावेद, इलियाश, कावेरी, कृष्णा और विद्याधर ने बताया कि, तेजस्वी यादव द्वारा दिया गया “हर परिवार में एक सरकारी नौकरी” का नारा राजनीतिक रूप से आकर्षक जरूर है — बेरोजगारी, युवाओं की आशाओं, सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता को सामने रखता है। लेकिन वास्तविकता में इस प्रस्ताव को लागू करना कठिन, वित्तीय रूप से बोझिल और भर्ती-व्यवस्था की मौजूदा सीमा से काफी परे दिखता है।

अगर महागठबंधन सरकार बनती है और इस नारे को अगले पांच वर्षों में पूरा करने की कोशिश भी करती है, तो संभव होता नजर नहीं आता क्योंकि:

  • उसे भर्ती-संख्या को बहुत तेजी से बढ़ाना होगा — वर्तमान में भर्ती दर बहुत कम है।

  • उसे वित्तीय संसाधन जुटाने, बजट संतुलन बनाए रखने व दीर्घकालीन खर्च उठाने की क्षमता दिखानी होगी। जो धरातल पर संभव होता नजर नहीं आता।

  • उसे शिक्षा-प्रशिक्षण, योग्यता-उपलब्धता, विभागीय ढांचे-संरचना में सुधार करना होगा ताकि योग्य उम्मीदवार मौजूद हों। ऐसा भी व्यावहारिक रूप से और सैद्धांतिक रूप से संभव नहीं है।

  • अगर इन पहलुओं में कमी रही, तो यह नारा “हवा-हवाई” साबित हो सकता है — यानी सिर्फ चुनावी घोषणा बनकर रह सकता है और जनता की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।

जनता बोली : तेजस्वी के बड़े बोल, चुनाव में खोलेंगे पोल 

राइजिंग भास्कर को युवाओं ने बताया कि तेजस्वी यादव युवा शक्ति को भ्रमित करना चाहते हैं। उनके बड़े बोल की हम पोल खोलेंगे। जब व्यावहारिक रूप से बिहार में हर परिवार सरकारी नौकरी देना संभव ही नहीं है तो यह नारा देकर जनता को गुमराह करने का प्रयास क्यों किया जा रहा है। बिहार की जनता समझ चुकी है कि यह चुनाव स्टंट और जनता को लालच देने के अलावा कुछ नहीं है। यह नारा चलने वाला नहीं है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor