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Sunday, March 15, 2026, 1:26 pm

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साधु और स्वादु : संयम का स्वाद खो गया

दीक्षा कार्यक्रम हो या चातुर्मास का आयोजन — अब तो सब एक “इवेंट मैनेजमेंट शो” बन चुका है। कहीं हजारों की थाली में स्वामीवत्सल्य पर लाखों का खर्च, कहीं मंचों पर फूलों की बरसात, कहीं प्रवचनों में प्रोजेक्टर की चमक। और फिर सोशल मीडिया पर लाइव टेलीकास्ट ।
आलेख : ब्रजेश सिंघवी, शोधार्थी 

कभी साधु का अर्थ होता था — संयम, सादगी और सत्य की साधना।
आज वही “साधु” शब्द “स्वादु” की ओर बढ़ता दिख रहा है।
क्योंकि पंचम काल के इस युग में धर्म के मंचों पर अब त्याग से ज़्यादा तामझाम, और संयम से ज़्यादा स्वाद परोसने की होड़ मची है।

अब धर्म के “प्रमुख” कहे जाने वाले व्यक्ति स्वयं को प्रमुख साबित करने के लिए इतने भव्य कार्यक्रम करते हैं कि भगवान महावीर भी शायद सोचते होंगे- “यह धर्म का प्रचार है या प्रदर्शन?”
दीक्षा कार्यक्रम हो या चातुर्मास का आयोजन — अब तो सब एक “इवेंट मैनेजमेंट शो” बन चुका है। कहीं हजारों की थाली में स्वामीवत्सल्य पर लाखों का खर्च, कहीं मंचों पर फूलों की बरसात, कहीं प्रवचनों में प्रोजेक्टर की चमक। और फिर सोशल मीडिया पर लाइव टेलीकास्ट ।

इन प्रमुखों को अब स्वाद लग गया है —
“कैसे हमारा आयोजन दूसरे पंथ से ज़्यादा भव्य लगे।”
कौन से शहर में सबसे बड़ा पंडाल बने,
कौन सी कुर्सियां सबसे आलीशान हों,
कौन से बैकड्रॉप पर सबसे सुंदर फूल सजें — इन सबकी योजना दो-दो साल पहले से बनने लगी है।
धर्म अब भक्ति से नहीं, ब्रांडिंग से मापा जाने लगा है।
सादगी के स्थान पर सज्जा,
और संयम के स्थान पर सेलिब्रेशन ने ले ली है जगह।
कभी महावीर ने कहा था — “अप्पा खम्मा” अर्थात स्वयं को देखो,
पर अब हर कोई चाहता है — “सब मुझे देखें”।
मंचों पर बैनर बड़े, नाम सुनहरे अक्षरों में,
और पीछे स्क्रीन पर वीडियो चलता है — ‘संत प्रवचन में उपस्थित 50,000 लोग!’
आखिर यह धर्म का उत्सव है या लोकप्रियता का उत्सव?
एक श्रावक ने एक बार सहज ही कहा —
“आचार्यश्री, श्रावक-श्राविकाओं के वस्त्र देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वे किस पंथ के हैं, पर साधु-साध्वी के वस्त्र देखकर तुरंत पता चल जाता है कि वे किस खेमे के हैं।”
यह वाक्य धर्म के आईने में आज के समय का सबसे सटीक प्रतिबिंब है।
और अब तो स्वाद केवल भोजन का नहीं
मोबाइल और मीडिया का भी लग गया है। कहने को कहते हैं, “हम मोबाइल नहीं रखते”, पर प्रवचन से पहले साउंड टेस्ट और लाइव स्ट्रीमिंग में स्वयं की आवाज़ जांचना नहीं भूलते।
लगता है अब मोक्षमार्ग से पहले माइकमार्ग अनिवार्य हो गया है।
सच्चा साधु तो वह था जो भीतर की शांति में लीन रहता,
आज का साधु बाहर की चमक में भीग रहा है।
कभी त्याग दिखता था भिक्षा-पात्र में,
अब दिखता है एयरकंडीशंड पंडाल में।
महावीर की वाणी अब भी वही है —
पर लगता है उनके अनुयायियों के लिए वह “बेस्वाद” हो गई है।
अब स्वाद है भीड़ का, तालियों का और प्रसिद्धि का।
अब संयम नहीं, “फॉलोअर्स” गिने जाते हैं।
और जब यही प्रवृत्ति धर्म के प्रत्येक कोने में फैल जाती है,
तो फिर धर्म उद्योग बन जाता है,
और साधु संयमी नहीं, सेलिब्रिटी बन जाते हैं।
धर्म को चाहिए था — त्याग, विचार और अंतर्मन की तपश्चर्या।
पर धर्म के ठेकेदारों ने उसे बना दिया है आयोजन, प्रचार और प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा।
अब समय है कि हम पूछें —
क्या धर्म का स्वाद अब केवल स्वादुता में रह गया है?
क्या संयम का रस अब सोशल मीडिया के व्यूज़ में घुल गया है?
क्या महावीर की वाणी अब केवल मंच पर गूंजने वाली “लाइन” बनकर रह गई है?
यदि हां —
तो यह “साधु और स्वादु” का युग है,
जहां धर्म का मूल नहीं, मुखौटा ही सबकुछ है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor