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Thursday, July 9, 2026, 1:24 pm

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सत्यमेव जयते की रिपोर्ट : देश में मेडिकल माफिया- 44% सर्जरी फर्जी; राइजिंग भास्कर सुझाव-DHQR लागू कर बचाव संभव

राइजिंग भास्कर का उद्देश्य केवल समस्या दिखाना नहीं बल्कि उसका समाधान बताना भी है। हाल ही में सोशल मीडिया पर सत्यमेव जयते की एक रिपोर्ट खूब वायरल हो रही है। इस रिपोर्ट में मेडिकल माफिया का जिक्र है। सबसे पहले हम उस रिपोर्ट का अवलोकन पाठकों को करवाते हैं और फिर बताते हैं कि कैसे DHQR (डिजीटल हेल्थ क्यूआर रिकॉर्ड) लागू कर देश भर में इस गंभीर समस्या से बचाव संभव है। प्रस्तुत है राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित की खास रिपोर्ट-

नई दिल्ली। देश में मेडिकल माफिया सक्रिय है। आमीर खान के चर्चित शो सत्यमेव जयते में इसका खुलासा होने के बाद आम और खास मरीज भयभीत रहने लगा है। क्या उनके साथ धोखा होगा या डॉक्टर भगवान बनकर उनका इलाज करेंगे? आज के दौर में प्रतिस्पर्धा, आपाधापी और स्वार्थ की मानव प्रवृ़त्ति के चलते डॉक्टर भी मानवीय धर्म भूल कर इस गोरखधंधे में कूद चुके हैं, जहां मरीज के साथ धोखा होना आम बात हो गई है। सरकारी और निजी अस्पतालों की व्यवस्थाएं अब दमघोंटू हो गई है। कहां क्या हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में सबसे पहले हम सत्यमेव जयते की रिपोर्ट का अवलोकन करते हैं और फिर राइजिंग भास्कर एक सुझाव लाया है, जिसे अपनाकर कुछ हद तक इस धोखाधड़ी से बच सकते हैं।

भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र पतन के कगार पर है और इसे स्वयं भारत की संसदीय समिति ने स्वीकार किया है।
ज़ी न्यूज़ की हालिया शोध रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 44% मानव शल्यक्रियाएं (सर्जरी) फ़र्ज़ी, धोखाधड़ीपूर्ण या अनावश्यक हैं। इसका अर्थ है कि देश में किए जाने वाले लगभग आधे ऑपरेशन केवल मरीजों या सरकार को लूटने के उद्देश्य से किए जाते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 55% हृदय शल्यक्रियाएं, 48% हिस्टेरेक्टॉमी (गर्भाशय निकालना), 47% कैंसर सर्जरी, 48% घुटना प्रत्यारोपण, 45% सी-सेक्शन, कंधा प्रत्यारोपण, रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन आदि भारत में फ़र्ज़ी या अनावश्यक होते हैं।

बड़े अस्पतालों में वरिष्ठ डॉक्टरों का वेतन एक-एक करोड़, वसूली मरीजों से छल करके : 

महाराष्ट्र के कई प्रतिष्ठित अस्पतालों में किए गए सर्वेक्षण से पता चला कि बड़े अस्पतालों में वरिष्ठ डॉक्टरों को एक-एक करोड़ रुपये मासिक वेतन दिया जाता है। कारण यह है कि जो डॉक्टर अधिक जांच, उपचार, भर्ती और ऑपरेशन करवाते हैं—चाहे आवश्यकता हो या न हो—उन्हें अधिक वेतन से पुरस्कृत किया जाता है। (स्रोत: BMJ Global Health) टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने कई मामलों के अध्ययन के बाद रिपोर्ट छापी कि मृत मरीजों को ज़िंदा दिखाकर इलाज किया गया और पैसे ऐंठे गए। यह अत्यंत शर्मनाक कृत्य कई जगह उजागर हुआ है। एक मामले में, एक प्रतिष्ठित अस्पताल ने 14 वर्षीय मृतक लड़के को जीवित बताकर एक महीने तक वेंटिलेटर पर रखा और “इलाज” किया। बाद में उसे मृत घोषित किया गया। शिकायत पर अस्पताल दोषी पाया गया और परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया गया। लेकिन परिवार को एक महीने तक झेली मानसिक पीड़ा का क्या? कई बार अस्पताल मृतक मरीजों पर भी तुरंत ऑपरेशन का नाटक करते हैं, परिवार से तुरंत पैसे मांगते हैं और बाद में कहते हैं कि “ऑपरेशन के दौरान मृत्यु हो गई।” इस तरह भारी रकम वसूली जाती है। (स्रोत: Dissenting Diagnosis – डॉ. गदरे और शुक्ला)

बीमा (मेडिक्लेम) घोटाला : 68% के पास स्वास्थ्य बीमा, पर आवश्यकता पड़ने पर अस्वीकार कर दिए जाते हैं दावे 

भारत में लगभग 68% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर दावे अस्वीकार कर दिए जाते हैं या आंशिक भुगतान किया जाता है और शेष खर्च परिवार पर छोड़ दिया जाता है। करीब 3,000 प्रतिष्ठित अस्पताल बीमा कंपनियों द्वारा फ़र्ज़ी दावों के कारण ब्लैकलिस्ट किए जा चुके हैं। कोविड-19 काल में कई बड़े अस्पतालों ने फ़र्ज़ी कोविड केस बनाकर बीमा कंपनियों को ठगा। मानव अंग तस्करी भी बड़े स्तर पर हो रही है। 2019 में इंडियन एक्सप्रेस ने एक दर्दनाक घटना उजागर की। कानपुर की संगीता कश्यप को दिल्ली में नौकरी का झांसा देकर फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया। स्वास्थ्य जांच के बहाने उसे भर्ती कर लिया गया। सौभाग्य से उसने डॉक्टरों को “डोनर” शब्द बोलते सुना और वहां से भाग निकली। शिकायत पर एक अंतरराष्ट्रीय अंग तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ हुआ, जिसमें डॉक्टर, मेडिकल स्टाफ, पुलिस आदि शामिल पाए गए।

रेफरल प्रोग्राम में डॉक्टर को फीस सीधे बैंक खाते में मिलती है

कुछ डॉक्टर मरीज को गंभीर बीमारी बताकर बड़े अस्पताल भेजते हैं। अपोलो, फोर्टिस, एपेक्स आदि अस्पतालों में रेफ़रल प्रोग्राम चलते हैं। मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल ने खुलेआम 40 मरीज भेजने पर ₹1 लाख, 50 मरीज पर ₹1.5 लाख और 75 मरीज पर ₹2.5 लाख देने की पेशकश की। मरीज की हालत चाहे जैसी हो, डॉक्टर को रेफ़रल फ़ीस सीधे बैंक खाते में मिलती है।

डायग्नोसिस घोटाला : अरबों का धंधा

यह तो अरबों का धंधा है। बेंगलुरु में आयकर विभाग की छापेमारी में प्रतिष्ठित पैथोलॉजी लैब से 100 करोड़ रुपये नकद और 3.5 किलो सोना मिला, जो डॉक्टरों को रिश्वत देने के लिए रखा गया था। डॉक्टर अनावश्यक जांच लिखते हैं और 40-50% कमीशन लेते हैं। अधिकतर जांचें सिर्फ़ काग़ज़ पर दिखती हैं। यही कारण है कि भारत में 2 लाख से अधिक लैब हैं, जबकि केवल 1,000 ही प्रमाणित हैं।

फार्मा कंपनियों के घोटाले…

20-25 बड़ी दवा कंपनियां हर साल डॉक्टरों पर 1,000 करोड़ रुपये खर्च करती हैं। कोविड काल में डोलो टैबलेट बेचने वाली कंपनी का घोटाला सामने आया। डॉक्टरों को अपनी दवा लिखवाने के लिए कंपनियां नकद, विदेश यात्राएं और 5-7 दिन के फाइव स्टार होटल में ठहराव देती हैं। उदाहरण के लिए, USV Ltd. हर डॉक्टर को 3 लाख रुपये नकद या ऑस्ट्रेलिया/अमेरिका यात्रा देती है।

अस्पताल–फार्मा कंपनी गठजोड़…

कई कंपनियां सर्जरी उपकरण और दवाएं अस्पतालों को बेहद सस्ते में देती हैं, लेकिन मरीज से अत्यधिक दाम वसूले जाते हैं। इंडिया टुडे की जांच में पाया गया कि EMCURE कंपनी की कैंसर दवा टेमिक्योर अस्पताल को ₹1,950 में मिलती है, लेकिन मरीज से ₹18,645 वसूले जाते हैं।

मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (MCI) डॉक्टरों और अस्पतालों को नियंत्रित करने में नाकाम :

2016 में सरकारी समिति की रिपोर्ट ने साफ़ लिखा कि MCI मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति देने में तो सक्रिय है, लेकिन डॉक्टरों और अस्पतालों को नियंत्रित करने में पूरी तरह विफल है।

MCI के नियम, जिनका अक्सर उल्लंघन होता है:

1. डॉक्टर को ब्रांडेड दवा नहीं, बल्कि जनरिक दवा लिखनी चाहिए।

2. डॉक्टर को उपचार से पहले अपनी पूरी फ़ीस बतानी चाहिए

3. जाँच/इलाज से पहले मरीज की सहमति अनिवार्य है।

4. प्रत्येक मरीज का रिकॉर्ड कम से कम 3 वर्ष सुरक्षित रखना ज़रूरी है।
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5. अनैतिक या अयोग्य डॉक्टरों को उजागर करना डॉक्टरों का कर्तव्य है।

सरकारी योजनाओं में भी भारी घोटाला : 

पूर्व सैनिक जैसे लोगों को मामूली बीमारी में भी भर्ती कर लिया जाता है और सरकारी योजना में उनका नाम जोड़कर नकली इलाज दिखाकर लाखों रुपये का बिल बनाया जाता है। इसमें अस्पताल और भ्रष्ट अधिकारी दोनों शामिल रहते हैं।

राइजिंग भास्कर प्रस्ताव :  DHQR (डिजीटल हेल्थ क्यूआर रिकॉर्ड) यानी  Digital Health QR & Lifetime Patient Record Project लागू करें :

अब देश को “QR-आधारित डिजिटल हेल्थ पासपोर्ट एवं ट्रेसएबल ट्रीटमेंट सिस्टम” (A Pilot for Transparent, Safe & Fraud-Free Healthcare Delivery) की जरूरत है।  भारत में निजी और सरकारी दोनों अस्पतालों में बढ़ते चिकित्सा घोटालों, फर्जी सर्जरी, बीमा धोखाधड़ी, और गलत दवा वितरण जैसी समस्याएं आम हैं। मध्यप्रदेश ने दवा सप्लाई चेन में QR सिस्टम लागू कर इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब यही मॉडल एक कदम आगे बढ़ाते हुए पूरे इलाज़ तंत्र तक विस्तारित करने की आवश्यकता है — ताकि हर मरीज का इलाज रिकॉर्ड जीवनभर सुरक्षित रहे, गलत चिकित्सा और धोखाधड़ी पर रोक लगे, और चिकित्सा क्षेत्र में पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

पायलट परियोजना का उद्देश्य (Objectives)

  1. हर मरीज को एक डिजिटल हेल्थ पासपोर्ट देना (ABHA ID आधारित) जिसमें उसका पूरा उपचार रिकॉर्ड सुरक्षित रहे।

  2. हर दवा, सर्जरी और जांच प्रक्रिया को एक यूनिक QR कोड से ट्रैक करना, ताकि फर्जी सर्जरी या डुप्लीकेट दवा की पहचान की जा सके।

  3. बीमा दावों में पारदर्शिता लाना — सभी दावे डिजिटल ट्रैकिंग और मरीज की सहमति से ही मान्य हों।

  4. मरीज को नियंत्रण देना — कौन उसका रिकॉर्ड देखे, कब और कितने समय के लिए।

  5. गलत उपचार और मेडिकल माफिया की धोखाधड़ी रोकना — e-prescription, QR scan और audit trail से हर घटना का डिजिटल सबूत बने।

पायलट के प्रमुख घटक (Key Components)

क्रम घटक विवरण
1 ABHA Health ID लिंकिंग मरीज के सभी इलाज़ रिकॉर्ड उसके ABHA ID से जोड़े जाएंगे।
2 QR-based Medicine & Procedure Tracking अस्पताल और फार्मेसी में हर दवा पैकेज और सर्जरी-रिकॉर्ड पर यूनिक QR कोड।
3 e-Prescription & e-Consent System डॉक्टर द्वारा दिया गया हर प्रिस्क्रिप्शन व मरीज की सहमति डिजिटल रूप में सुरक्षित।
4 Tamper-Proof Audit Trail (Blockchain/Immutable Log) सभी इलाज़ और दवा लेनदेन को छेड़छाड़-रोधी डिजिटल लॉग में दर्ज किया जाएगा।
5 Patient App & QR Portal मरीज अपने मोबाइल से दवा या सर्जरी रिकॉर्ड स्कैन कर पूरी जानकारी देख सके।
6 Fraud Detection Engine असामान्य उपचार पैटर्न या डुप्लीकेट क्लेम की स्वतः पहचान।

पायलट स्थल (Pilot Site)

राज्य: [आपके राज्य का नाम]
जिला: भोपाल / जयपुर / इंदौर (उदाहरणार्थ)
संस्थाएं:

  • 1 सरकारी जिला अस्पताल

  • 2 निजी मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल

  • 3 अधिकृत फार्मा डिस्ट्रीब्यूटर/मेडिकल स्टोर

  • 1 बीमा कंपनी (IRDAI से अनुमोदित)

  • राज्य स्वास्थ्य विभाग एवं NIC टेक्निकल सपोर्ट यूनिट

तकनीकी संरचना (Technical Architecture Overview)

डेटा प्रवाह:

  1. मरीज का ABHA ID स्कैन → अस्पताल रजिस्ट्रेशन से लिंक

  2. डॉक्टर का e-prescription & QR-tagged medicine issue

  3. फार्मेसी पर QR स्कैन व वितरण लॉग

  4. सभी डेटा राज्य eHealth Blockchain Log में एन्क्रिप्टेड रूप से स्टोर

  5. मरीज को मोबाइल ऐप या SMS से रसीद और लॉग रिपोर्ट

  6. बीमा दावा उसी QR/ABHA लिंक से स्वचालित सत्यापित

टेक्निकल पार्टनर्स:

  • NIC / C-DAC / TCS / Infosys जैसी सरकारी अनुमोदित एजेंसियाँ

  • ABDM (Ayushman Bharat Digital Mission) API Integration

अपेक्षित परिणाम (Expected Outcomes)

क्षेत्र लाभ
मरीज फर्जी इलाज़ या दवा धोखाधड़ी से सुरक्षा, जीवनभर का मेडिकल इतिहास
सरकार फर्जी बीमा दावे, गलत रिपोर्टिंग व धोखाधड़ी में कमी
बीमा कंपनियाँ पारदर्शी क्लेम प्रक्रिया, डेटा आधारित सत्यापन
अस्पताल/फार्मा उद्योग ईमानदार प्रदाताओं की प्रतिष्ठा में वृद्धि
समाज स्वास्थ्य क्षेत्र में जन-विश्वास व पारदर्शिता में सुधार

परियोजना अवधि (Timeline)

चरण समय प्रमुख गतिविधियाँ
चरण 1: तैयारी 3 माह तकनीकी रूपरेखा, अस्पताल चयन, प्रशिक्षण
चरण 2: कार्यान्वयन 6 माह e-prescription, QR tagging, patient linking
चरण 3: मूल्यांकन व रिपोर्टिंग 3 माह डेटा विश्लेषण, धोखाधड़ी दर, मरीज प्रतिक्रिया

कुल अवधि: 12 माह (1 वर्ष)

अनुमानित बजट (Indicative Budget)

मद अनुमानित लागत (₹ लाख में)
सॉफ्टवेयर विकास व QR सिस्टम 80
अस्पताल एकीकरण (HIS अपग्रेड) 60
प्रशिक्षण व क्षमता निर्माण 20
मरीज ऐप व सार्वजनिक जागरूकता 25
डेटा सुरक्षा व सर्वर अवसंरचना 40
मॉनिटरिंग, मूल्यांकन व रिपोर्टिंग 15
कुल अनुमानित लागत 240 लाख (2.4 करोड़ ₹)

(CSR/राज्य-साझा फंडिंग मॉडल संभव)

साझेदार संस्थाएँ (Proposed Partners)

  • राज्य स्वास्थ्य विभाग / NHM Mission Directorate

  • ABDM / NHA (API Integration & Technical Support)

  • NIC / C-DAC (Platform Development)

  • IRDAI / बीमा कंपनियाँ

  • Private Hospitals & Pharma Associations

  • Citizen NGOs / Patient Rights Groups

जोखिम एवं निवारण (Risks & Mitigation)

जोखिम निवारण उपाय
निजी अस्पतालों का विरोध चरणबद्ध अनिवार्यता व बीमा-लिंक्ड प्रोत्साहन
डिजिटल अवसंरचना की कमी सरकारी HIS/NIC सर्वर व API सपोर्ट
मरीज की तकनीकी समझ काउंटर-हेल्पडेस्क व QR प्रिंट रसीदें
डेटा गोपनीयता भारतीय डेटा सुरक्षा अधिनियम अनुरूप सुरक्षा प्रोटोकॉल

स्वास्थ्य के क्षेत्र में डिजिटल ईमानदारी की दिशा में ऐतिहासिक कदम

यह पायलट प्रोजेक्ट देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में “डिजिटल ईमानदारी की दिशा” में एक ऐतिहासिक कदम होगा।
यदि सफल हुआ तो यह मॉडल न केवल बीमा और सर्जरी धोखाधड़ी को रोकने में सक्षम होगा, बल्कि हर नागरिक को जीवनभर सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वसनीय स्वास्थ्य रिकॉर्ड उपलब्ध कराएगा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor