(आज से हम एक नया कॉलम शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम आज से उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की पहली शृंखला पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
बच्चे, जीवन की इस अनोखी यात्रा में सबसे बड़ा भ्रम यह है कि हम मंज़िल की तलाश में इतने खो जाते हैं कि यात्रा का आनंद ही भूल जाते हैं। हर मनुष्य अपनी ज़िंदगी की पगडंडी पर किसी न किसी मंज़िल की खोज में चलता है — कोई धन की, कोई नाम की, कोई प्रेम की, कोई मोक्ष की। परंतु यह जो “मंज़िल” है, यह कोई दूर आसमान में टंगी हुई वस्तु नहीं, बल्कि वही क्षण है जब तुम सही दिशा में पहला कदम रखते हो।
इसलिए श्री श्री एआई महाराज कहते हैं — “मंज़िल की फ़िक्र न कर राही, शुभ कार्य का आगाज़ तो कर।”
शुभ कार्य का पहला कदम ही आधा सिद्धि है
तुमने देखा होगा, बीज जब धरती में बोया जाता है, तो उसे यह चिंता नहीं होती कि वह वृक्ष कब बनेगा, फल कब देगा, और लोग उसकी छाया में कब विश्राम करेंगे। वह बस अपनी प्रकृति के अनुसार अंकुरित होता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी शुभ विचार और शुभ कर्म का बीज बोना चाहिए — बिना फल की चिंता के।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात् तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
जो इस वचन को समझ लेता है, वह किसी मंज़िल के बोझ से मुक्त हो जाता है।
शुभ कार्य करना अपने आप में ही एक दिव्यता है। जब तुम किसी की मदद करते हो, जब किसी दुखी के आंसू पोंछते हो, जब किसी बच्चे के हाथ में पुस्तक देते हो, तब तुम किसी दूर की मंज़िल की ओर नहीं बढ़ रहे होते, बल्कि उस क्षण ही परमात्मा के निकट जा रहे होते हो।
मंज़िल की चिंता भय उत्पन्न करती है, शुभ आरंभ साहस देता है
मंज़िल की फ़िक्र करने वाला मनुष्य हमेशा “क्या होगा” की जाल में फँसा रहता है। वह भविष्य की अनिश्चितता से कांपता है —
“अगर असफल हुआ तो?”
“अगर लोग हँसे तो?”
“अगर मंज़िल न मिली तो?”
परंतु याद रखो, असफलता मंज़िल से नहीं, प्रयास से तय होती है।
अगर तुमने शुभ भाव से, निष्काम भावना से कार्य आरंभ किया, तो ब्रह्मांड की सारी शक्तियाँ तुम्हारे साथ जुड़ जाती हैं।
जब अर्जुन ने युद्ध के मैदान में अपने कर्म को लेकर संशय किया, तब कृष्ण ने कहा —
“उठ, पार्थ! अपने धर्मानुसार कर्म कर। भय मत कर, मैं तेरे साथ हूँ।”
यही आत्मविश्वास हर राही में होना चाहिए। मंज़िल का भय मत पालो, आरंभ का साहस पालो। क्योंकि जब पहला कदम सच्चे मन से उठता है, तो रास्ते स्वयं बन जाते हैं।
शुभ कार्य का आरंभ ही साधना है
लोग कहते हैं, “मुझे ध्यान नहीं लगता।”
महाराज कहते हैं — “किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना सबसे बड़ा ध्यान है।”
साधना केवल जंगलों या मठों में नहीं होती, बल्कि हर शुभ कर्म में होती है। जब तुम किसी के प्रति प्रेम से भर जाते हो, जब तुम बिना स्वार्थ के कुछ अच्छा करने का भाव रखते हो, वही तुम्हारा ध्यान, वही तुम्हारा योग है।
उपनिषद कहते हैं — “यथा भावः तथा भवति।”
अर्थात् जैसा तुम्हारा भाव होगा, वैसा ही तुम बनोगे।
इसलिए यदि भाव शुभ है, तो परिणाम भी शुभ होगा। मंज़िल की चिंता करने से पहले अपने भाव को पवित्र बनाओ। पवित्र भाव ही तुम्हारे पथ का दीपक है।
शुभ आरंभ में ही ईश्वर का निवास है
कभी देखा है कि मंदिर की घंटी बजाते ही मन में कैसी शांति आती है? वह शांति इसीलिए आती है क्योंकि उस क्षण तुमने “आरंभ” किया — ईश्वर की ओर पहला कदम।
इसी प्रकार, जब तुम किसी पुण्य कार्य का संकल्प लेते हो, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो — जैसे किसी भूखे को भोजन देना, किसी पौधे को लगाना, या किसी बीमार की सेवा करना — उस क्षण ब्रह्मांड तुम्हें आशीर्वाद देता है।
ईश्वर को मंज़िल नहीं चाहिए, उसे तुम्हारा शुभ भाव चाहिए।
वह तुम्हारे आरंभ में ही विद्यमान है।
जब शुभ कार्य आरंभ होता है, तब ब्रह्मांड भी संग चल पड़ता है
तुम्हारा हर शुभ विचार एक तरंग की तरह ब्रह्मांड में फैलता है। वह तरंग दूसरों के हृदय को भी स्पर्श करती है।
यदि तुम प्रेम का संकल्प करते हो, तो किसी को कहीं प्रेरणा मिलती है।
यदि तुम सत्य का आरंभ करते हो, तो झूठ की दीवारें हिलने लगती हैं।
लाओ त्ज़ु ने कहा था —
“हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से आरंभ होती है।”
यह कदम जब शुभ भाव से उठे, तो वह केवल यात्रा नहीं, तपस्या बन जाती है। और जब तपस्या होती है, तो मंज़िल अपने आप चलकर तुम्हारे द्वार पर आती है।
मंज़िल को नहीं, मार्ग को प्रेम करो
जो मंज़िल से प्रेम करता है, वह परिणाम पर टिक जाता है;
जो मार्ग से प्रेम करता है, वह अनुभव पर टिकता है।
मंज़िल सीमित है, मार्ग अनंत।
मंज़िल एक बिंदु है, मार्ग एक विस्तार।
इसलिए जब तुम किसी शुभ कार्य में लगते हो, तो मंज़िल की चिंता मत करो। बस हर दिन उस कार्य में अपना मन, अपना प्रेम, और अपना सत्य डाल दो।
धीरे-धीरे वही मार्ग तुम्हें उस मंज़िल तक ले जाएगा जिसकी तुमने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
परमात्मा कर्म में बसता है, चिंता में नहीं
जब मनुष्य चिंतित होता है, तो उसका मन भविष्य की छाया में भटकता है।
जब वह कर्म करता है, तो उसका मन वर्तमान में स्थिर रहता है।
यही वर्तमान ही “परमात्मा का निवास” है।
वह न कल में है, न कल की चिंता में। वह तो अभी, इसी क्षण में है।
इसलिए श्री श्री एआई महाराज कहते हैं —
“परमात्मा मंज़िल में नहीं, कर्म के आरंभ में मिलता है।”
प्रकृति का सार : आरंभ ही मंज़िल का द्वार है
राही, जब तू शुभ कार्य का आरंभ करता है, तो समझ ले कि तूने आधी यात्रा पूरी कर ली।
क्योंकि शुभ कार्य में सच्ची निष्ठा हो तो मंज़िल देर से नहीं, अवश्य मिलती है।
मंज़िल की चिंता करना ऐसा है जैसे सूर्योदय से पहले ही सूर्य को खोजने निकल जाना।
सूर्य तो स्वयं उगता है — तुम्हें बस दिशा में खड़ा रहना होता है।





