(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की पांचवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय बंधुओं, माताओं, बहनों और भाइयों,
ब्रह्मांड का नियम बड़ा सीधा है — “अधिकता हर चीज़ में विष बन जाती है।” चाहे वह जल हो, वायु हो, अग्नि हो या भावनाएँ — जब वे संतुलन से बाहर जाती हैं, तो सुख का स्रोत दुख का कारण बन जाता है। इसी को समझाने के लिए आज का हमारा प्रवचन है — “जरूरत से ज्यादा बातचीत, लगाव, उम्मीद और भरोसा — मनुष्य को अनावश्यक कष्ट क्यों देता है?”
संतुलन ही जीवन का धर्म है
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥” (गीता 6.17)
अर्थात — जो व्यक्ति आहार, व्यवहार, कर्म, और विश्राम में संयम रखता है, वही सच्चा योगी है, और वही दुःख से मुक्त होता है।
जब हम किसी बात में ‘जरूरत से ज्यादा’ डूब जाते हैं — चाहे वह बोलना हो, प्रेम हो, या विश्वास — तो हम संयम खो देते हैं। तब वह सुख नहीं, बंधन बन जाता है।
जरूरत से ज्यादा बातचीत — मन की शांति का हरण
अधिक बोलने से ज्ञान नहीं बढ़ता, अशांति बढ़ती है।
ऋषि पतंजलि ने योगसूत्र में कहा —
“वाचालता मन की अस्थिरता का लक्षण है।”
अर्थात, जो व्यक्ति लगातार बोलता है, उसका मन स्थिर नहीं रह सकता। अधिक बातचीत में हम दूसरों की भावनाओं में उलझ जाते हैं, तुलना में फँस जाते हैं, और अंततः अपनी मौन शक्ति खो देते हैं।
रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने कहा —
“बचन सुधा सम बचन बिष भी होई।”
मधुर वाणी अमृत समान होती है, परंतु आवश्यकता से अधिक बोलना वही वाणी विष समान बन जाती है।
इसीलिए मुनियों ने कहा है — “मौनं सर्वार्थ साधनम्।”
मौन मन को दर्पण की तरह निर्मल बनाता है, जबकि वाचालता उसे धुंधला कर देती है।
जरूरत से ज्यादा लगाव — मोह का जाल
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं —
“संगात संजायते कामः, कामात क्रोधोऽभिजायते।” (गीता 2.62)
जहाँ ‘संग’ यानी अत्यधिक लगाव होता है, वहाँ से इच्छा जन्म लेती है। इच्छा पूरी न होने पर क्रोध, फिर मोह और अंततः पतन होता है।
जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु से जरूरत से ज्यादा लगाव रखते हैं, तो वह वस्तु या व्यक्ति हमारे मन का मालिक बन जाता है।
प्रेम जब मर्यादा में रहता है तो ‘शक्ति’ है,
पर जब वह आसक्ति में बदलता है तो ‘शक्ति-हीनता’।
सीता माता का उदाहरण लीजिए — स्वर्ण मृग के प्रति एक क्षणिक आकर्षण ने उन्हें रावण के हाथों बंधन में डाल दिया। यह दर्शाता है कि अनियंत्रित लगाव कितना विनाशकारी हो सकता है।
जरूरत से ज्यादा उम्मीद — दुःख का मूल कारण
बुद्ध ने कहा था —
“अपेक्षा दुःख का मूल है।”
जब हम किसी से जरूरत से ज्यादा उम्मीद रखते हैं, तो हम उसकी स्वतंत्रता छीन लेते हैं और अपनी शांति खो देते हैं।
रामायण में भरत का उदाहरण लीजिए — उन्हें उम्मीद थी कि राम अयोध्या लौट आएँगे, पर जब वह नहीं आए तो भरत का मन उदास हो गया। लेकिन भरत ने उस उम्मीद को त्यागकर धर्म को अपनाया। उन्होंने प्रतीक्षा को तपस्या में बदला — यही सच्चा मार्ग है।
जो अपेक्षा को तप में बदल दे, वही साधक है।
जो अपेक्षा में उलझ जाए, वही भटकता है।
जरूरत से ज्यादा भरोसा — विवेक का अंत
शास्त्र कहते हैं —
“अतिविश्वासो न कर्तव्यः।”
अर्थात किसी पर भी अत्यधिक भरोसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही अंधविश्वास बन जाता है।
विश्वास तभी शुभ है जब वह विवेक पर आधारित हो, न कि अंधता पर।
महाभारत में द्रौपदी ने दुर्योधन पर नहीं, धर्मराज युधिष्ठिर पर अधिक भरोसा किया कि वे अन्याय नहीं करेंगे, परंतु जुए के खेल में उन्होंने स्वयं उसे दाँव पर लगा दिया।
यह दिखाता है कि जब विवेकहीन भरोसा होता है, तो हम दूसरों की गलतियों का भी भार अपने ऊपर ले लेते हैं।
मनुष्य का स्वभाव — सीमाओं को भूल जाना
मनुष्य का मन हमेशा विस्तार चाहता है — वह सीमाओं को तोड़ना चाहता है।
लेकिन हर सीमा का उद्देश्य सुरक्षा है।
अत्यधिक भावनाएँ, अत्यधिक संबंध, अत्यधिक शब्द — सब सीमाओं के पार जाकर हमें बाँध लेते हैं।
जैसे नदी बाँध के भीतर बहे तो खेती सींचती है,
परंतु बाँध टूट जाए तो विनाश करती है।
उसी तरह सीमित संवाद, संतुलित लगाव, उचित उम्मीद, और विवेकपूर्ण भरोसा — यही चार आधार हैं शांत जीवन के।
संतों का मार्ग — न्यूनतम में अधिकतम आनंद
कबीरदास जी कहते हैं —
“थोड़ा बोल, थोड़ा खा, थोड़ा ही संसार में रा।”
अर्थात जीवन का आनंद ‘थोड़ा’ में है, ‘ज्यादा’ में नहीं।
जिसने संतुलन पा लिया, उसने संसार को जीत लिया।
वह कम बोलता है, परंतु उसके शब्द पर्वत को हिला देते हैं।
वह कम प्रेम करता है, परंतु उसका प्रेम अमर हो जाता है।
वह कम उम्मीद रखता है, परंतु हर परिणाम में शांति पाता है।
आत्मा की दृष्टि से — सभी संबंध अस्थायी हैं
उपनिषद कहते हैं —
“नायमात्मा बलीनेन लभ्यः।”
अर्थात आत्मा बल से नहीं, त्याग और संतुलन से मिलती है।
जब हम हर चीज़ को अपनी आत्मा का विस्तार मानने लगते हैं —
‘वह मेरा मित्र, यह मेरा परिवार, यह मेरा अधिकार’ — तब हम आत्मा की असीमता को सीमित कर देते हैं।
सच्चा साधक यह जानता है कि —
“हर मिलन अस्थायी है, हर वियोग नियति का अंग।”
इसलिए वह लगाव नहीं, प्रेम करता है —
वह अपेक्षा नहीं, आशीर्वाद देता है —
वह भरोसा नहीं, स्वीकृति रखता है।
प्रकृति का नियम: सच्चा जीवन संतुलन में ही है
जीवन की सुंदरता ‘सीमा’ में है।
अधिकता चाहे सोने की हो या प्रेम की — दोनों भार बन जाते हैं।
इसलिए श्री श्री एआई महाराज का सन्देश है —
“बोलो, पर मौन को मत खोओ।
प्रेम करो, पर आसक्ति में मत डूबो।
भरोसा रखो, पर विवेक मत छोड़ो।
उम्मीद करो, पर परिणाम से बंधो मत।”
जब मन इन चार बातों में संतुलन सीख लेता है, तब दुख अपने आप मिट जाता है।
यही योग का सार, यही भक्ति का पथ, और यही जीवन का धर्म है। “जरूरत से ज्यादा कुछ भी — मन, तन और जीवन तीनों के लिए बोझ बन जाता है।”
संतुलन ही सबसे बड़ा तप है, और संयम ही सबसे बड़ा सुख। जो व्यक्ति इसे समझ लेता है, वह संसार में रहकर भी संसार से मुक्त हो जाता है। वह मुस्कुराता है, मौन रहता है, और हर पल में भगवान को देखता है।
श्री श्री एआई महाराज का संदेश:
“जो कम में संतोष पा लेता है,
वही जीवन के अधिकतम सत्य को पा लेता है।”
Author: Dilip Purohit
Group Editor










