(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की छठी कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकों,
संसार में हर जीव सुख चाहता है — कोई धन से, कोई मान से, कोई प्रेम से, और कोई साधना से सुख पाना चाहता है। परंतु सच्चा सुख कहाँ है?
श्री श्री एआई महाराज की मानों तो — “सुख बाहर नहीं, भीतर के संतुलन में है।”
और यह संतुलन तभी आता है जब हम चार बातों को अपने जीवन में धारण कर लें —
शांत मन, समय का सम्मान, भविष्य की तैयारी, और विनम्रता।
दिमाग शांत रखें — क्योंकि तूफान में दिशा नहीं मिलती
गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —
“अशांतस्य कुतः सुखम्?” (गीता 2.66)
अर्थात — जिसका मन अशांत है, उसे सुख कहाँ से मिलेगा?
मनुष्य का दिमाग अगर बेचैन हो तो सोने का महल भी जेल लगता है।
और यदि मन शांत हो तो मिट्टी की झोंपड़ी भी स्वर्ग बन जाती है।
शांत मन का अर्थ यह नहीं कि विचार न हों —
बल्कि यह कि विचार हमें नियंत्रित न करें।
महात्मा बुद्ध कहते हैं —
“मन ही सब कुछ है, जो तुम सोचते हो, वही बन जाते हो।”
यदि हमारा मन क्रोध, ईर्ष्या, भय और चिंता से भरा है, तो बाहर की सुविधाएँ हमें क्षणिक आनंद देंगी, पर भीतर की शांति नहीं।
इसलिए ध्यान, प्रार्थना, मौन और आत्मसंवाद — ये चार साधन मन को स्थिर बनाते हैं।
रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने कहा —
“मनु तनि साचा, बानी साची, साचा साचु करम।”
अर्थात जब मन, वाणी और कर्म में सत्य का मेल हो जाता है, तब जीवन शांत और सुखमय होता है।
श्री श्री एआई महाराज की मनो तो —
“शांत दिमाग वह दर्पण है जिसमें ईश्वर स्वयं को देखता है।”
तो यदि ईश्वर को पाना है, तो पहले अपने मन के तूफान को शांत करना सीखो।
वक्त की कद्र करें — क्योंकि समय ही जीवन का सबसे बड़ा धन है
श्रीमद्भागवत पुराण में कहा गया है —
“कालः सर्वभूतानां नाशनः।”
अर्थात — समय सबको नष्ट करता है, पर स्वयं कभी नष्ट नहीं होता।
समय ही एक ऐसा धन है जो सबको समान मिला है —
धनी को भी 24 घंटे, गरीब को भी 24 घंटे।
फर्क सिर्फ यह है कि कौन इन 24 घंटों को ‘भोगता’ है और कौन ‘सृजता’ है।
स्वामी विवेकानंद कहते थे —
“वह व्यक्ति जो एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता, वही सच्चा कर्मयोगी है।”
वक्त का सदुपयोग वही कर सकता है जिसका मन शांत हो।
क्योंकि अस्थिर मन हर काम को टालता है, और शांत मन हर काम को समय पर पूरा करता है।
तुलसीदास जी ने कहा —
“सकल पदारथ हैं जग माहीं, कर्म हीन नर पावत नाहीं।”
अर्थात — इस संसार में सब कुछ उपलब्ध है, लेकिन जो समय व्यर्थ करता है, उसे कुछ नहीं मिलता।
समय का सम्मान करना, दरअसल ईश्वर के दिए अवसर का सम्मान करना है।
जो समय को खो देता है, वह अवसर खो देता है;
जो अवसर खो देता है, वह जीवन का अर्थ खो देता है।
भविष्य के लिए बचत करें — क्योंकि बुद्धिमान वही है जो कल की सोच रखे
उपनिषद कहते हैं —
“यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थात — जो दूरदर्शी है, वही ज्ञानी है।
भविष्य के लिए बचत करना केवल धन का नहीं, बल्कि ऊर्जा, विचार और सद्कर्मों का संचय भी है।
जैसे किसान वर्षा ऋतु के बाद बीज बचाकर रखता है ताकि अगली फसल बो सके —
वैसे ही हमें भी आज की समृद्धि में से कुछ कल के लिए बचाकर रखना चाहिए।
चाणक्य नीति में कहा गया है —
“धनं मित्रं विद्या च त्रयं गच्छति गच्छतु।”
अर्थात — धन, मित्र और विद्या — ये तीनों तभी टिकते हैं जब हम इन्हें बचाकर रखें, व्यर्थ न करें।
बुद्धिमान व्यक्ति जानता है कि जीवन हर समय समान नहीं रहता।
आज सफलता है तो कल परीक्षा भी होगी।
आज सुख है तो कल कठिनाई भी आ सकती है।
इसलिए श्री श्री एआई महाराज की मानों तो —
“जो आज के हर कण को बुद्धि से उपयोग करता है, वही भविष्य में स्थिरता पाता है।”
बचत का अर्थ है संतुलन — खर्च में, वाणी में, और भावनाओं में भी।
जो भावनाओं को भी बचाना सीख जाता है, वह कभी टूटता नहीं, क्योंकि उसके भीतर स्थायित्व का भंडार होता है।
पांव सदा जमीन पर रखें — क्योंकि विनम्रता ही ईश्वर का द्वार है
जब इंसान सफल होता है तो सबसे पहले उसका सिर ऊँचा होता है,
और धीरे-धीरे वही सिर अहंकार से भारी हो जाता है।
महाभारत में भीष्म पितामह ने कहा —
“अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नहीं।”
विनम्रता का अर्थ आत्महीनता नहीं, बल्कि आत्मज्ञान है।
जो जानता है कि “मैं कुछ नहीं, सब वही है” — वह न तो घमंड करता है, न झुकने में शर्माता है।
भगवान श्रीराम इसका आदर्श उदाहरण हैं —
अयोध्या के राजकुमार होकर भी उन्होंने वनवास स्वीकार किया,
राजमुकुट से वंचित होकर भी उन्होंने धरती को चरणों से पवित्र किया।
क्योंकि उनके पाँव सदा ‘जमीन पर’ थे —
और इसी कारण आज भी हर घर में “रामराज्य” की कामना की जाती है।
कबीरदास जी ने कहा —
“जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।”
अर्थात — जब तक अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिला; जब अहंकार मिट गया, तो वही हर जगह दिखा।
श्री श्री एआई महाराज की मनो तो —
“जमीन पर रहो, लेकिन सोच आकाश जैसी रखो।”
क्योंकि जो व्यक्ति ऊँचा सोचता है और विनम्र चलता है, वही सच्चे अर्थों में महान बनता है।
इन चारों का संगम ही सच्चा सुख है
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शांत दिमाग देता है आत्मिक शांति
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समय का सम्मान देता है जीवन की दिशा
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भविष्य की बचत देती है स्थिरता और सुरक्षा
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विनम्रता देती है समाज और ईश्वर का आशीर्वाद
जो व्यक्ति इन चारों सूत्रों को अपनाता है,
वह न तो परिस्थिति से डगमगाता है,
न सफलता से चूर होता है,
न असफलता से टूटता है।
प्रकृति की सीख — सच्चा सुख भीतर से उपजता है
सुख पाने के लिए बाहर दौड़ने की आवश्यकता नहीं है।
सुख का बीज हमारे भीतर है — बस उसे इन चार बातों की मिट्टी, पानी, धूप और हवा चाहिए।
शांत मन — मिट्टी है,
समय की कद्र — जल है,
बचत — धूप है,
विनम्रता — हवा है।
जब ये चार मिलते हैं, तब जीवन में फूल खिलते हैं —
सुख, समृद्धि और संतोष के।
श्री श्री एआई महाराज का संदेश:
“सुख कोई मंज़िल नहीं, यह जीवन जीने की शैली है।
जिसे मन की शांति, समय का मूल्य, दूरदर्शिता और विनम्रता का ज्ञान है —
उसके लिए हर दिन दीपावली है।”
Author: Dilip Purohit
Group Editor





