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Thursday, July 9, 2026, 5:30 am

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राइजिंग भास्कर अभियान : देव जगे, आप कब जगोगे? खर्चीली शादियों से बचें; आर्थिक रूप से टूट रहे हैं मध्यम परिवार, कुछ सुझाव…

आज ‘लोन पर बारात’, ‘कर्ज़ में कन्यादान’ और ‘इंवेंट प्लानर की चमक’ मध्यम वर्ग की मजबूरी बन गई है। शादी का खर्च लाखों से बढ़कर अब कई बार 10 से 40 लाख रुपये तक पहुंच जाता है — वह भी तब जब परिवार की वार्षिक आय 6 से 8 लाख रुपये के बीच हो। नतीजा यह कि शादी के वर्षों बाद तक परिवार EMI, उधारी और कर्ज़ के बोझ तले दबा रहता है।
“सादगी में सौंदर्य है, प्रेम में प्रतिष्ठा है, और संयम में समृद्धि है। जब समाज इस सूत्र को समझेगा, तभी मध्यम वर्ग सच्चे अर्थों में खुशहाल होगा।”
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो संस्कृतियों का मिलन माना जाता है। परंतु पिछले दो दशकों में इस पवित्र बंधन का स्वरूप धीरे-धीरे सामाजिक प्रतिस्पर्धा और दिखावे का मैदान बन गया है। विशेषकर मध्यम वर्ग के लिए शादी अब उत्सव से अधिक आर्थिक संकट का पर्याय बन चुकी है।

जहां पहले विवाह सरल रस्मों के साथ सम्पन्न होते थे, वहीं आज ‘लोन पर बारात’, ‘कर्ज़ में कन्यादान’ और ‘इंवेंट प्लानर की चमक’ मध्यम वर्ग की मजबूरी बन गई है। शादी का खर्च लाखों से बढ़कर अब कई बार 10 से 40 लाख रुपये तक पहुंच जाता है — वह भी तब जब परिवार की वार्षिक आय 6 से 8 लाख रुपये के बीच हो। नतीजा यह कि शादी के वर्षों बाद तक परिवार EMI, उधारी और कर्ज़ के बोझ तले दबा रहता है।

समस्या की जड़: दिखावे और सामाजिक दबाव की मानसिकता

“लोग क्या कहेंगे” — यही चार शब्द हैं जो आज हर मध्यम वर्गीय पिता, भाई और दूल्हा-दुल्हन के दिल में गूंजते हैं।
समाज में प्रतिष्ठा दिखाने की होड़ ने विवाह समारोह को प्रतिस्पर्धा का मंच बना दिया है।

1. “लोगों की नजर में भव्य शादी”

हर कोई चाहता है कि उसकी बेटी या बेटे की शादी इलाके में यादगार हो। सजावट, लाइटिंग, बैंड-बाजा, डिजाइनर कपड़े, फाइव स्टार कैटरिंग — ये सब प्रतिष्ठा का प्रतीक मान लिए गए हैं।
परंतु इस दिखावे की कीमत चुकाता है वही मध्यम वर्गीय परिवार, जिसकी आमदनी सीमित और खर्च असीमित है।

2. बढ़ती बाजार मानसिकता

इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां, डेस्टिनेशन वेडिंग ट्रेंड, थीम-बेस्ड रिसेप्शन और सोशल मीडिया पोस्ट्स ने विवाह को व्यावसायिक तमाशा बना दिया है।
एक हालिया सर्वे के अनुसार राजस्थान के बड़े शहरों में मध्यम वर्गीय परिवार औसतन 18 लाख रुपये खर्च कर रहे हैं — जिसमें 35% राशि सिर्फ सजावट और लाइटिंग पर खर्च होती है।

3. “शादी एक-दो दिन की, कर्ज़ कई सालों का”

अक्सर माता-पिता अपने बच्चों की शादी के लिए PF तोड़ देते हैं, सोना गिरवी रख देते हैं या लोन लेते हैं
यह मानसिकता ‘सामाजिक मान’ बचाने के लिए आर्थिक आत्मघात जैसी है। कई बार यही आर्थिक दबाव परिवार को विवाद, मानसिक तनाव और पारिवारिक कलह की ओर धकेल देता है।

आंकड़ों से समझें गंभीरता

  • नेशनल सर्वे ऑन सोशल स्पेंडिंग (2024) के अनुसार, भारत में प्रति शादी औसत खर्च ₹13.7 लाख है, जबकि औसत घरेलू वार्षिक आय ₹6.5 लाख।

  • ग्रामीण क्षेत्रों में 1.5 लाख से 5 लाख और शहरी मध्यम वर्ग में 10से 40 लाख तक खर्च आम बात हो चुकी है।

  • लगभग 62% परिवार शादी के खर्च के लिए उधार या लोन का सहारा लेते हैं।

  • इनमें से 70% परिवारों को कर्ज़ चुकाने में 2 से 10 साल लग जाते हैं।

  • 40% परिवारों ने माना कि शादी के खर्च ने उनके बच्चों की शिक्षा, मकान या स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं को प्रभावित किया।

सामाजिक उदाहरण:

  1. जयपुर का शर्मा परिवार:
    एक मध्यमवर्गीय शिक्षक परिवार ने बेटी की शादी में ₹12 लाख खर्च किए, जिसमें ₹5 लाख लोन था। अगले चार साल EMI भरने में निकल गए, और दूसरी बेटी की पढ़ाई पर असर पड़ा।

  2. जोधपुर के वर्मा दंपती:
    उन्होंने बेटे की डेस्टिनेशन वेडिंग गोवा में की — कुल खर्च ₹18 लाख। शादी के बाद उन्हें किराए का घर छोड़कर छोटा फ्लैट लेना पड़ा क्योंकि जमा पूंजी खत्म हो गई।

  3. कोटा की अग्रवाल फैमिली:
    “लोगों ने कहा आपकी बेटी की शादी बहुत भव्य रही। अग्रवाल फैमिली अब पछता रही है और कहती है “काश हमने दिखावे के बजाय अपनी बेटी के भविष्य में निवेश किया होता।”

सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव

  • शादी के बाद आर्थिक तनाव, जोड़े पर भी असर डालता है।

  • कई बार परिवारों के बीच रिश्तों में दरार पड़ जाती है — “हमने ज़्यादा खर्च किया, उन्होंने कम किया” जैसी मानसिकता पनपती है।

  • युवा पीढ़ी में शादी को बोझ समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है, क्योंकि वे देखते हैं कि विवाह के बाद घरवाले वर्षों तक आर्थिक संकट में रहते हैं।

समाधान: कैसे बचें खर्चीली शादियों के जाल से

यह आवश्यक नहीं कि ‘भव्य’ शादी ही ‘खुशहाल’ हो। शादी जीवनभर की जिम्मेदारी की शुरुआत है, आर्थिक बर्बादी की नहीं।

1. सामूहिक विवाह को बढ़ावा दें

आज कई सामाजिक संगठन और मंदिर ट्रस्ट सामूहिक विवाह का आयोजन करते हैं।

  • इसमें सजावट, पंडाल, भोजन आदि का सामूहिक खर्च होता है।

  • औसतन खर्च प्रति जोड़ा केवल ₹25,000 से ₹50,000 तक सीमित रहता है।

  • सबसे बड़ी बात: कोई दिखावा नहीं, कोई प्रतियोगिता नहीं।
    राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह से हजारों परिवारों ने कर्ज़ से मुक्ति पाई है।

2. दिन में शादी करें, रात में नहीं

रात की शादी में बिजली, लाइटिंग, जनरेटर और सजावट पर खर्च कई गुना बढ़ जाता है।
अगर शादी सुबह या दोपहर के समय की जाए, तो बिजली खर्च में 60% तक की बचत संभव है।
इसके साथ ही ‘सूर्य की साक्षी में विवाह’ को शास्त्रों में भी शुभ माना गया है।

3. इवेंट की सादगी अपनाएं

थीम-बेस्ड सजावट, महंगे गेटअप और डेस्टिनेशन शादियों की जगह स्थानीय स्तर पर साधारण आयोजन करें।

  • कम मेहमान, सीमित व्यंजन

  • बिना बैंड-बाजा, DJ के पारंपरिक संगीत

  • प्लास्टिक और फिजूल सजावट से बचें

4. खर्च को साझा करें

पुराने समय में सारा खर्च दुल्हन पक्ष उठाता था। यह असंतुलित और अन्यायपूर्ण प्रथा है।
आधुनिक समाज में दोनों पक्ष समान रूप से खर्च साझा करें
इससे आर्थिक बोझ आधा हो जाएगा और विवाह की साझेदारी का असली अर्थ भी प्रकट होगा।

5. गिफ्ट के बजाय ‘ग्रीन गिफ्ट’ या दान की परंपरा

महंगे उपहारों के बजाय पेड़ लगाना, शिक्षा या अनाथालय में दान करना जैसी परंपरा विकसित की जा सकती है।
यह समाज के लिए भी लाभदायक है और विवाह को आध्यात्मिक गरिमा प्रदान करती है।

6. ‘शादी बचत योजना’ शुरू करें

शादी के दिन की तैयारी वर्षों पहले से होनी चाहिए।

  • बैंक में विवाह बचत खाता खोलें।

  • लोन या उधार की बजाय छोटी बचत करें।

  • परिवार की आर्थिक स्थिति के अनुसार ‘बजट सीमा’ तय करें और उसका पालन करें।

7. सरकारी या सामुदायिक हॉल का उपयोग करें

महंगे होटल, रिज़ॉर्ट या फाइव स्टार बैंक्वेट की जगह सरकारी विवाह स्थल या सामुदायिक हॉल उपयोग करें।
इससे लाखों रुपये बचाए जा सकते हैं।

8. सोशल मीडिया दिखावे से बचें

Instagram और Facebook की ‘पिक्चर परफेक्ट’ शादी का दबाव मध्यम वर्ग को और गहरे फंदे में डाल देता है। “लोग क्या कहेंगे” की जगह “हम क्या झेलेंगे” सोचें।

नीति स्तर पर आवश्यक सुधार

  • सरकार सामूहिक विवाह प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार करे।

  • विवाह उद्योग में फिजूलखर्ची पर टैक्स इंसेंटिव या पेनल्टी का प्रावधान हो।

  • शिक्षा में ‘वित्तीय साक्षरता’ को विषय बनाया जाए ताकि आने वाली पीढ़ी आर्थिक समझ के साथ फैसले ले सके।

  • समाजसेवी संगठनों को ‘सादगी से विवाह’ को सांस्कृतिक अभियान बनाना चाहिए।

समाज में सकारात्मक उदाहरण

  1. राजस्थान के जोधपुर में “सामूहिक विवाह : पिछले कुछ वर्षों में 400 से अधिक सामूहिक विवाह हुए। इसमें ₹20,000 औसतन खर्च प्रति जोड़ा आया।

  2. आर्य समाज में फेरे :  — हर वर्ष आर्य समाज में जोड़े फेरे लेते हैं। इससे आर्थिक बचत होती है।

विवाह का असली सौंदर्य सादगी में है

विवाह जीवन की नई शुरुआत है, आर्थिक बोझ का अंत नहीं। मध्यम वर्ग को चाहिए कि वह दिखावे के इस जाल से बाहर निकले और अपने जीवन की प्राथमिकताओं को समझे। शादी के एक दिन की चमक के लिए वर्षों की मेहनत दांव पर लगाना समझदारी नहीं। हमारा समाज तभी स्वस्थ और संतुलित बन सकता है, जब विवाह उत्सव अपनी पवित्रता और सादगी में लौटे। “जहां प्रेम का दीप जलता है, वहां रोशनी के बल्बों की जरूरत नहीं होती।”

इन बातों पर गौर करने की जरूरत

  1. खर्चीली शादियां मध्यम वर्ग के लिए आर्थिक संकट का कारण बन रही हैं।

  2. दिखावे की प्रवृत्ति, सामाजिक दबाव और बाजारवाद ने समस्या को बढ़ाया है।

  3. समाधान हैं —

    • सामूहिक विवाह,

    • दिन में आयोजन,

    • सादगीपूर्ण इवेंट,

    • खर्च साझा करना,

    • सोशल मीडिया दिखावे से परहेज,

    • सरकारी हॉल का उपयोग,

    • शादी बचत योजना शुरू करना।

  4. विवाह का उद्देश्य सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं, जीवन की साझेदारी है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor