“न्याय केवल अदालत में नहीं, निर्णय में बसता है। और जब निर्णय लंबित रहता है, तो न्याय मौन हो जाता है।”
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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भारत को आज़ादी मिले सात दशक से अधिक समय हो चुका है। संविधान लागू होने के साथ ही जब राजस्थान का गठन हुआ, तब जोधपुर में राजस्थान हाईकोर्ट की स्थापना हुई। यहीं से राज्यभर की न्यायिक कार्यवाही संचालित होती थी। परंतु कुछ वर्षों बाद प्रशासनिक सुविधा और भौगोलिक संतुलन के नाम पर जयपुर में हाईकोर्ट की एक बेंच स्थापित कर दी गई।
लेकिन जोधपुर के वकीलों के मन में एक टीस रही। यहां के वकील चाहते हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट एकीकृत रहे और जोधपुर में ही एकीकृत हाईकोर्ट हो। इसको लेकर पचास वर्षों से अधिक समय से जोधपुर के अधिवक्ता इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि हाईकोर्ट को पुनः एकीकृत कर दिया जाए, जैसा प्रारंभ में था।
यह विरोध केवल नाराजगी का प्रतीक नहीं, बल्कि न्यायिक असमानता और प्रशासनिक विभाजन के प्रति गहरी पीड़ा का परिणाम है। और यह प्रश्न अब भी जीवित है —
“अगर न्यायालय स्वयं न्याय नहीं करेगा, तो जनता किससे उम्मीद रखे?”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राजस्थान का गठन 1949 में हुआ। इसके बाद राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय — राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर — स्थापित किया गया। संविधान के अनुच्छेद 214 के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रावधान है।
परंतु बाद में भौगोलिक सुविधा और जनहित के तर्क पर जयपुर में एक स्थायी बेंच की स्थापना की गई।
यहीं से विवाद शुरू हुआ।
जोधपुर के अधिवक्ताओं का मानना है कि —
“राजस्थान का असली हाईकोर्ट जोधपुर में है, बेंच की स्थापना संविधान की मूल भावना और एकीकृत न्याय प्रणाली के विपरीत है।”
50 साल पुराना आंदोलन — हर महीने की आखिरी तारीख “बहिष्कार दिवस”
लगभग 1970 के दशक से जोधपुर हाईकोर्ट और उससे संबद्ध निचली अदालतों के अधिवक्ता हर महीने के अंतिम कार्य दिवस पर न्यायिक कार्यों का बहिष्कार करते हैं।
यानी, साल के 12 दिन न्यायिक कामकाज ठप रहता है।
50 साल में यह आंकड़ा 600 दिनों के न्यायिक बहिष्कार तक पहुंच चुका है।
कई बार आम जनता, न्यायार्थी और मुवक्किल सवाल करते हैं —
“क्या इस बहिष्कार से न्याय की प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती?”
“क्या न्याय पाने के लिए जनता को वकीलों के आंदोलन की कीमत चुकानी चाहिए?”
लेकिन दूसरी ओर वकीलों का जवाब है —
“हम न्याय प्रणाली की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, न कि उसे रोकने के लिए।”
आंदोलन के मूल तर्क
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संवैधानिक आधार:
अधिवक्ताओं का कहना है कि संविधान में राज्य के लिए एक ही उच्च न्यायालय का प्रावधान है।
दो स्थानों से एक ही हाईकोर्ट का संचालन करना न केवल प्रशासनिक असुविधा है, बल्कि संविधान की भावना का भी उल्लंघन है। -
न्यायिक असमानता:
समान मामलों में जयपुर और जोधपुर से अलग-अलग आदेश आने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे कानून की एकरूपता प्रभावित होती है। -
न्यायिक संसाधनों का विभाजन:
बेंच प्रणाली से न्यायिक अधिकारी, स्टाफ, बजट और मामलों का विभाजन होता है, जिससे फाइलों के स्थानांतरण, सुनवाई में देरी और निर्णयों में भ्रम की स्थिति बनती है। -
राजस्थान की “न्यायिक राजधानी” कौन?
जयपुर राजधानी है, परंतु जोधपुर हाईकोर्ट की ऐतिहासिक और संवैधानिक पहचान रखता है।
वकीलों का कहना है — “राजस्थान का सर्वोच्च न्यायिक केंद्र जोधपुर ही है, न कि जयपुर।”
दूसरी ओर — जयपुर बेंच के समर्थक क्या कहते हैं?
जयपुर बेंच के पक्षधर तर्क देते हैं कि राजस्थान भौगोलिक रूप से विशाल है। पूर्वी जिलों के नागरिकों को जोधपुर तक पहुंचने में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती थी, जिससे समय और धन दोनों की हानि होती थी। इसलिए जयपुर में बेंच की स्थापना जनसुविधा के दृष्टिकोण से उचित कदम था।
अर्थात यह विवाद अब सिर्फ न्यायालय के स्थान का नहीं, बल्कि न्याय तक पहुंच (Access to Justice) की परिभाषा का प्रश्न बन गया है।
50 साल की खामोशी — जिम्मेदारी किसकी?
यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठता है —
“अगर यह मांग जायज है, तो निर्णय क्यों नहीं लिया जा रहा?”
“अगर यह अनुचित है, तो आंदोलन पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही?”
कानूनी और प्रशासनिक हल खोजने की जिम्मेदारी न्यायपालिका और सरकार — दोनों की है।
परंतु पिछले 50 वर्षों में न तो कोई स्पष्ट नीति बनी, न कोई निर्णायक आदेश आया।
इससे दो संदेश जाते हैं —
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न्यायिक नेतृत्व में निर्णय की कमी,
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राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव।
जज साहब, अब तो करो फैसला!
ज्यूडिशरी में यह बात लंबे समय से उठ रही है कि “त्वरित न्याय” होना चाहिए। फिर इस मामले में 50 साल की देरी क्यों? क्या यह विडंबना नहीं कि न्याय के मंदिर में स्वयं न्याय की प्रतीक्षा हो रही है? हर महीने जोधपुर के अधिवक्ता न्यायिक कार्य का बहिष्कार करते हैं, और यह परंपरा “न्याय का प्रतीक” नहीं बल्कि “न्याय की त्रासदी” बन चुकी है।
आंदोलन के दुष्परिणाम
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मुवक्किलों को नुकसान:
हर महीने का एक कार्य दिवस ठप होने से हजारों मामलों की सुनवाई स्थगित होती है।
अनुमानतः 50 सालों में लगभग 5 लाख से अधिक मामलों की तारीखें प्रभावित हुई हैं। -
वकीलों की युवा पीढ़ी पर असर:
नए अधिवक्ताओं का कहना है कि पुराने मुद्दे का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
उनकी आजीविका पर असर पड़ता है और न्यायिक विश्वास कमजोर होता है। -
जनता की धारणा पर चोट:
आम जनता के बीच यह संदेश जाता है कि “अगर वकील ही अदालत का बहिष्कार करेंगे, तो न्याय कौन दिलाएगा?”
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव
यह विषय न तो केवल न्यायपालिका से जुड़ा है, न केवल वकीलों से — यह नीतिगत निर्णय का विषय है।
राज्य सरकारें चाहे किसी भी दल की हों, उन्होंने इस विवाद को “संवेदनशील” कहकर टालना ही आसान समझा। पिछले वर्षों में कई बार प्रस्ताव आए, परंतु कोई भी सरकार स्पष्ट घोषणा करने का साहस नहीं दिखा सकी। दरअसल, जयपुर और जोधपुर — दोनों क्षेत्रों की राजनीतिक संवेदनशीलता इस निर्णय को “राजनीतिक बारूद” बना देती है।
क्या हर माह के बहिष्कार की अनुमति उचित है?
यह भी एक अहम प्रश्न है। न्यायिक कार्यों का बहिष्कार किसी संवैधानिक अधिकार के तहत नहीं आता।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने कई बार वकीलों के “वर्क बॉयकॉट” को अनुचित ठहराया है। फिर भी 50 सालों से यह परंपरा चल रही है — जैसे यह कोई “अनलिखित अनुमति” बन गई हो। क्या अब समय नहीं आ गया कि सुप्रीम कोर्ट स्वयं इस पर जल्द फैसला करे? अगर मांग उचित है तो उस पर फैसला दिया जाए, और यदि अनुचित है, तो वकीलों से अपेक्षा की जाए कि वे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें।
संभावित समाधान
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एकीकृत हाईकोर्ट का पुनर्गठन या स्पष्ट नीति:
या तो हाईकोर्ट एक स्थान से संचालित हो, या दोनों केंद्रों की भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित की जाए। -
सरकार की मध्यस्थता:
राज्य और केंद्र सरकार मिलकर इस विवाद पर स्थायी आयोग बनाएं, जिसकी सिफारिश बाध्यकारी हो। -
जनहित व सुलह मार्ग:
दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों के बीच खुला संवाद मंच बने, ताकि न्यायिक कार्य बाधित न हो।
50 सालों की प्रतीक्षा — आखिर कब तक?
पांच दशक बीत चुके हैं।
अनेक जज आए और रिटायर हुए, कई अधिवक्ता इस दुनिया में नहीं रहे, पर आंदोलन अब भी वहीं का वहीं है।
आज जोधपुर हाईकोर्ट के गलियारों में यह सवाल गूंजता है —
“क्या हर माह का बहिष्कार केवल परंपरा बनकर रह जाएगा?”
“क्या न्याय का यह मामला भी किसी फाइल में धूल खाता रहेगा?”
न्यायालय से न्याय की अपेक्षा
न्यायपालिका देश की आत्मा है। जब वही संस्था किसी मुद्दे पर दशकों तक निर्णय टालती है, तो जनता का भरोसा डगमगा जाता है। जोधपुर के वकीलों की यह लड़ाई केवल एक शहर की नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की साख से जुड़ी है। अब और देरी न्याय के मूल सिद्धांत — “Justice delayed is justice denied” — का अपमान होगी।
राज. हाईकोर्ट के एक सीनियर वकील से राइजिंग भास्कर की सीधी बात:
राभा : आंदोलन की पृष्ठभूमि क्या है?
सीनियर वकील : आजादी के बाद जब राजस्थान का गठन हुआ तो विभिन्न राज्यों की विशिष्ट पहचान बनी। जयपुर राज्य की राजधानी बना। बीकानेर शिक्षा की राजधानी और जोधपुर न्यायिक राजधानी। मगर इमरजेंसी में जयपुर में हाईकोर्ट की एक अन्य बैंच स्थापित की गई।
राभा : फिर झगड़ा किस बात का है?
सीनियर वकील : यहीं से झगड़े की शुरुआत हुई। जोधपुर के वकील चाहते हैं एकीकृत न्यायालय हो। पूरी तरह से जोधपुर से ही न्यायिक व्यवस्था संचालित हो।
राभा : क्या केवल राजस्थान में ही दो बैंच है या अन्य राज्यों में भी?
सीनियर वकील : महाराष्ट्र में दो बैंच है। मध्यप्रदेश में भी। सुविधानुसार अन्य राज्यों में ऐसा गठन किया गया।
राभा : फिर जोधपुर के वकील क्या चाहते हैं?
सीनियर वकील : वकील चाहते हैं कि एकीकृत हाईकोर्ट जोधपुर में ही हो।
राभा : 50 साल से प्रत्येक माह के अंतिम दिन कार्य बहिष्कार होता है, उचित है?
सीनियर वकील : दरअसल वकील भी चाहते हैं कि माह के अंतिम दिन काम से छुटकारा मिले। एसोसिएशन भी नहीं चाहती कि उनके कार्यकाल में समस्या का निराकरण हो जाए। बस ऐसे ही चलता आ रहा है।
राभा : कुल मिलाकर वकील खुद नहीं चाहते समस्या का हल हो?
सीनियर वकील : नहीं ऐसा नहीं है। पर एसोसिएशन के पदाधिकारी भी नहीं चाहते कि उनके कार्यकाल में समस्या हल हो। फिर साल या दो साल बाद चुनाव हो जाते हैं और वर्षों से आंदोलन चला आ रहा है।
राभा : आखिर इस समस्या का निराकरण करेगा कौन?
सीनियर वकील : मामला सुप्रीम कोर्ट के स्तर का है। वहीं से निराकरण होगा।
Author: Dilip Purohit
Group Editor




