राइजिंग भास्कर के सीईओ और ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित को देव दिवाली के बाद मुंबई बुलाया गया था, ताकि इस साझेदारी पर औपचारिक बातचीत हो सके। मगर उन्होंने अपने शुभचिंतकों और वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों से विचार-विमर्श के बाद यह फैसला लिया कि वे धन के बजाय जनविश्वास को अपनी असली पूंजी मानेंगे।
पुरोहित ने कहा कि “राइजिंग भास्कर का उद्देश्य सिर्फ विस्तार नहीं, बल्कि विचारों का विस्तार है। हमें 100 करोड़ नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों का आशीर्वाद चाहिए। वही हमारी सच्ची ताकत है।”
मुंबई से राही शुभम की रिपोर्ट
दिवाली से पहले मीडिया जगत में एक बड़ी हलचल देखने को मिली थी, जब उद्योगपति अनिल अंबानी ने देश के उभरते मीडिया नेटवर्क राइजिंग भास्कर ग्रुप के साथ साझेदारी का प्रस्ताव रखते हुए 100 करोड़ रुपये की सहयोग राशि की पेशकश की थी। यह प्रस्ताव सीधे तौर पर समूह के सीईओ एवं ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित को भेजा गया था। दिलचस्प बात यह रही कि इस संभावित साझेदारी पर मुकेश अंबानी की भी सहमति बताई जा रही थी। यानी यह पहला मौका होता जब अंबानी बंधु किसी एक मीडिया समूह को संयुक्त रूप से समर्थन देने की दिशा में आगे बढ़ते।
लेकिन, इस संभावित ‘मेगा डील’ पर अब विराम लग गया है। राइजिंग भास्कर ग्रुप के सीईओ दिलीप कुमार पुरोहित ने इस प्रस्ताव को ससम्मान अस्वीकार कर एक ऐसा संदेश दिया है, जिसने पूरे मीडिया और कॉर्पोरेट जगत का ध्यान खींच लिया है।
पुरोहित को देव दिवाली के बाद मुंबई बुलाया गया था ताकि इस साझेदारी पर औपचारिक बातचीत हो सके। मगर उन्होंने अपने शुभचिंतकों और वरिष्ठ संपादकीय सहयोगियों से विचार-विमर्श के बाद यह फैसला लिया कि वे धन के बजाय जनविश्वास को अपनी असली पूंजी मानेंगे।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा —
“राइजिंग भास्कर का उद्देश्य सिर्फ विस्तार नहीं, बल्कि विचारों का विस्तार है। हमें 100 करोड़ नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों का आशीर्वाद चाहिए। वही हमारी सच्ची ताकत है।”
निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रतीक बना राइजिंग भास्कर
पिछले तीन वर्षों में राइजिंग भास्कर ग्रुप ने बिना किसी बड़े कॉर्पोरेट सहयोग के भी मीडिया जगत में अपनी अलग पहचान बनाई है। इस अवधि में समूह ने देश-दुनिया से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर निष्पक्ष, बेबाक और निर्भीक पत्रकारिता की मिसाल पेश की है।
कभी यह मंच भटकी हुई राजनीति को दिशा देता है, तो कभी भ्रष्ट नौकरशाही और अपराध के खिलाफ अपनी सशक्त कलम से चोट करता है। समूह की संपादकीय नीति ‘राष्ट्रहित सर्वोपरि’ पर आधारित है, और यही सिद्धांत इसे आम मीडिया हाउसों से अलग बनाता है।
पुरोहित का कहना है,
“हम कम लिखते हैं, लेकिन जब लिखते हैं तो असर छोड़ते हैं। हमारी रगों में देशभक्ति और जनसेवा का खून दौड़ता है। यही हमारी पत्रकारिता की पहचान है।”
प्रेरणा अमिताभ बच्चन से
दिलचस्प बात यह है कि दिलीप कुमार पुरोहित का यह निर्णय एक प्रेरणादायक क्षण से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि जिस दिन अनिल अंबानी का प्रस्ताव आया, उसी दिन उन्होंने सोशल मीडिया पर अमिताभ बच्चन का एक पुराना वीडियो देखा। उस वीडियो में अमिताभ बताते हैं कि अपने कठिन समय में जब अनिल अंबानी ने उनकी मदद की पेशकश की थी, तो उन्होंने बड़े विनम्र स्वर में कहा था — “मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ूंगा।”
इस प्रसंग से प्रभावित होकर पुरोहित ने कहा —
“अमिताभ बच्चन पर करोड़ों का कर्ज था, लेकिन उन्होंने किसी की सहायता पर निर्भर न रहकर अपने दम पर वापसी की। राइजिंग भास्कर भी उसी आत्मनिर्भरता की राह पर है। हम पर कोई कर्ज नहीं, कोई दबाव नहीं। हमारी कलम स्वतंत्र है, और स्वतंत्र ही रहेगी।”
राष्ट्र की आवाज़ बनना ही लक्ष्य
पुरोहित ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया का दायित्व सिर्फ खबर देना नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनना है। उन्होंने कहा कि राइजिंग भास्कर किसी भी राजनीतिक दल या कॉर्पोरेट घराने के प्रति झुकाव नहीं रखता। उनका लक्ष्य जनता के भरोसे और राष्ट्रहित की दृष्टि से पत्रकारिता करना है।
“हम उन 140 करोड़ देशवासियों का विश्वास अर्जित करना चाहते हैं जो सच्ची खबरों की तलाश में हैं। राइजिंग भास्कर का प्रत्येक शब्द देश के प्रति समर्पित है — और यही हमारी असली पूंजी है,” उन्होंने कहा।
आर्थिक नहीं, नैतिक शक्ति ही पहचान
राइजिंग भास्कर की यह पहल आज के मीडिया परिदृश्य में एक नई मिसाल पेश करती है। जहां अधिकतर मीडिया संस्थान बड़े उद्योग समूहों के प्रभाव में काम करते हैं, वहीं इस समूह ने दिखाया है कि पत्रकारिता का असली बल पूंजी नहीं, निष्ठा और नैतिकता होती है।
इस निर्णय से राइजिंग भास्कर की छवि और मजबूत हुई है। मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम ने न केवल समूह की साख बढ़ाई है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि मीडिया जब स्वतंत्र होता है, तब वह वास्तव में ‘चौथा स्तंभ’ कहलाने के योग्य बनता है।
दिलीप कुमार पुरोहित के शब्दों में —
“हम धन के साथ नहीं, धर्म के साथ खड़े हैं। देशभक्ति और सत्य की राह कठिन जरूर है, लेकिन यही वह राह है जो अंततः भारत को विश्वगुरु बनाएगी।”
निर्णय आत्मसम्मान और स्वाधीनता से प्रेरित
राइजिंग भास्कर ग्रुप का 100 करोड़ का प्रस्ताव ठुकराना सिर्फ एक कारोबारी निर्णय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, स्वाधीनता और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गया है। जहां एक ओर यह निर्णय मीडिया की आत्मा को पुनर्जीवित करता है, वहीं दूसरी ओर यह आने वाले समय में पत्रकारिता की नई परिभाषा लिखता है — “न धन चाहिए, न दामन में सौदा — बस देश की सच्ची आवाज़ बने रहना हमारा मकसद है।”









