(हमारा यह रिपोर्ट प्रकाशित कर राजस्थान हाईकोर्ट से आग्रह है कि प्रसंज्ञान लेकर इस मामले में कार्रवाई करे और दोषी भ्रष्ट तंत्र को सजा दे और तालाब के आगार की जमीन पर बसी सारी बस्ती को अतिक्रमण मानकर ध्वस्त करवाएं। ये नियमन नहीं सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा है और जैसलमेर के कलेक्टरों को लूट की खुली छूट से रोका जाए।…संपादक)
सूली डूंगर, जैसलमेर का ऐतिहासिक भूभाग, जहां से शहर का हर कोण दिखता था — अब अतिक्रमण, होटल, धर्मशालाओं और निजी इमारतों के जंगल में दब चुका है। राजाओं की अदालत में जहां कभी न्याय की अंतिम सांस ली जाती थी, वहां आज न्याय की लाश पड़ी है।
कभी पूर्व कलेक्टर ललित के. पंवार ने एक सुंदर सपना देखा था — कलाकारों की एक कॉलोनी बसाने का। उन्होंने कलाकारों को निःशुल्क भूखंड दिए ताकि कला का केंद्र बने, संस्कृति सांस ले सके। पर जैसलमेर की धरती पर भू-माफियाओं ने सपनों को भी हजम कर लिया।
सूली डूंगर के चारों ओर कभी तालाबों की श्रृंखला थी — गफूर का भट्ठा के पास मूल तालाब और जीवणियाई तालाब था। ये न केवल शहर की जल-आपूर्ति का प्राचीन स्रोत थे, बल्कि जैसलमेर की पारंपरिक जल संस्कृति की रीढ़ थे। आज ये तालाब नहीं, बस स्मृति के मलबे हैं। इन तालाबों के किनारे की अरबों की जमीनें अब माफियाओं के कब्जे में हैं। स्कूल, सामुदायिक भवन, सरकारी दफ्तर — सब कुछ वहां खड़ा है जहां कभी पानी बहता था। जमीनें लूटी गईं, कागजों पर नियमन हुआ, और प्रशासन ने आंखें मूंद लीं। नगर पालिका से नगर परिषद बनी, पर नीयत वही रही — लूट की।
दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
कभी इस शहर को “स्वर्णनगरी” कहा जाता था। रेगिस्तान की गोद में बसा, इतिहास और वैभव की सुगंध से महकता जैसलमेर आज सत्ता, स्वार्थ और सड़ांध से भर चुका है।
और इसका सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है — सूली डूंगर, वह पहाड़ी जहां कभी राजाओं के ज़माने में अपराधियों को सूली पर चढ़ाया जाता था। आज सूली पर कोई अपराधी नहीं, पूरा जैसलमेर लटकाया जा चुका है।
कभी इतिहास की गवाही, अब भ्रष्टाचार की कब्रगाह
सूली डूंगर, जैसलमेर का ऐतिहासिक भूभाग, जहां से शहर का हर कोण दिखता था — अब अतिक्रमण, होटल, धर्मशालाओं और निजी इमारतों के जंगल में दब चुका है। राजाओं की अदालत में जहां कभी न्याय की अंतिम सांस ली जाती थी, वहां आज न्याय की लाश पड़ी है। कभी पूर्व कलेक्टर ललित के. पंवार ने एक सुंदर सपना देखा था — कलाकारों की एक कॉलोनी बसाने का। उन्होंने कलाकारों को निःशुल्क भूखंड दिए ताकि कला का केंद्र बने, संस्कृति सांस ले सके। पर जैसलमेर की धरती पर भू-माफियाओं ने सपनों को भी हजम कर लिया।
वे कलाकार आज गुमनाम हैं, और उनकी जमीनों पर होटल, लॉज, दुकानें और आलीशान इमारतें खड़ी हैं।
कला के मंदिरों की जगह पैसे के महल खड़े हैं।
सूली डूंगर की गोद अब भ्रष्टाचार की गोद
सूली डूंगर के चारों ओर कभी तालाबों की श्रृंखला थी — गफूर का भट्ठा के पास मूल तालाब और जीवणियाई तालाब था। ये न केवल शहर की जल-आपूर्ति का प्राचीन स्रोत थे, बल्कि जैसलमेर की पारंपरिक जल संस्कृति की रीढ़ थे। आज ये तालाब नहीं, बस स्मृति के मलबे हैं। इन तालाबों के किनारे की अरबों की जमीनें अब माफियाओं के कब्जे में हैं। स्कूल, सामुदायिक भवन, सरकारी दफ्तर — सब कुछ वहां खड़ा है जहां कभी पानी बहता था। जमीनें लूटी गईं, कागजों पर नियमन हुआ, और प्रशासन ने आंखें मूंद लीं। नगर पालिका से नगर परिषद बनी, पर नीयत वही रही — लूट की।
तीस साल की साजिश — जब हर अफसर ने सूली डूंगर को सूली पर चढ़ाया
पिछले तीस सालों में जैसलमेर में जितने भी कलेक्टर, चेयरमैन, इंजीनियर और नेता आए —
सब इस “लूट तंत्र” का हिस्सा बने। सूली डूंगर और उसके आसपास की हर इंच जमीन एक-एक कर निगली जाती रही। हर प्रशासनिक फाइल ने एक और चोरी को वैधता दी। यहां तक कि पत्रकार भी चुप रहे। जो बिक गए, उन्होंने कलम गिरवी रख दी। जो नहीं बिके, उन्होंने खामोशी को सुरक्षा कवच बना लिया। लूट इतनी आम हो गई कि पूरा शहर इस बहती गंगा में उतर गया। राजनीतिज्ञ, वकील, बिजनेसमैन, आम आदमी — हर कोई इस लूट का हिस्सा बना। हर किसी ने अपना टुकड़ा काटा, और सूली डूंगर की आत्मा को चीर दिया।
अब नया नाटक — विकास के नाम पर मृत्यु का उत्सव
अब, जब सब कुछ लुट चुका है —कलेक्टर प्रताप सिंह और विधायक छोटूसिंह जनता के सामने एक नया स्वांग रच रहे हैं। कहा जा रहा है — “सूली डूंगर को टूरिस्ट स्पॉट बनाया जाएगा, यहां सनसेट पॉइंट विकसित होगा।”
5 करोड़ रुपए खर्च होंगे। नगर परिषद आयुक्त लजपाल सिंह सोढ़ा, पूर्व सभापति हरिवल्लभ कल्ला, अधीक्षण अभियंता श्रीकांत जांगिड़, सहायक अभियंता अयूब अली, कनिष्ठ अभियंता सुशील यादव —
सब फोटो खिंचवाने में व्यस्त हैं, जबकि सूली डूंगर की आत्मा तड़प रही है।
यह शिलान्यास नहीं — यह एक शवयात्रा का उत्सव है। सूली डूंगर को सूली पर चढ़ा कर “विकास” का तमाशा किया जा रहा है।
विकास या दिखावा?
कलेक्टर प्रताप सिंह का दावा है कि यहां प्रवेश द्वार, पार्किंग, गार्ड रूम, कियोस्क, किड्स प्ले एरिया, वाटर बॉडी, बारादरी, झरोखे, शौचालय, ट्रेक फाउंटेन, स्कल्पचर और बाहरी दीवारों की मरम्मत होगी। कागजों में सब सुंदर दिखता है। पर सवाल ये है —
क्या किसी ने पूछा कि जिस भूमि पर यह “विकास” होगा, वह भूमि अतिक्रमित और जल भराव क्षेत्र है? क्या किसी ने यह जांचा कि उस जमीन का भूगर्भीय स्वरूप क्या है? क्या किसी ने यह सोचा कि जहां से अपराधियों की फांसी की कहानी शुरू होती थी, वहां अब बच्चों का प्ले एरिया बनाया जा रहा है? इतिहास का अपमान भी शायद ऐसा नहीं होता।
अतिक्रमण के नीचे दबी जिम्मेदारियां
सूली डूंगर के नीचे फैला अतिक्रमण अब कानूनी रूप से “मान्य” हो चुका है। सरकारी फाइलों में दर्ज है कि वहां घर, होटल और दुकानें हैं — यानी “स्थायी संरचनाएं।” जब अपराध स्थायी हो जाए, तो न्याय अस्थायी हो जाता है। नगर परिषद (पूर्व में नगरपालिका) के अधिकारी, जिनका काम शहर की रक्षा करना था, उन्होंने खुद लूट की रेखाएं खींचीं। प्रत्येक प्लॉट, प्रत्येक माप, प्रत्येक नक्शा — भ्रष्टाचार की नई गवाही बन गया।
पत्रकारों की खामोशी — सबसे बड़ा अपराध
जैसलमेर की मीडिया भी इस पूरे खेल की सहभागी रही। किसी ने सवाल नहीं उठाया कि कलाकारों की जमीनें किनके नाम हुईं। किसी ने यह नहीं बताया कि गफूर भट्ठा और जीवणियाई तालाब की सीमा आज कहां खत्म होती है। किसी ने यह नहीं लिखा कि नगर परिषद के कितने इंजीनियरों ने इन निर्माणों की मंजूरी दी। पत्रकारों ने सिर्फ कार्यक्रम कवरेज की —“कलेक्टर महोदय ने शिलान्यास किया, विधायक ने बटन दबाया, तालियां बजीं।” और असली खबर मर गई।
जनता भी दोषी — जब शहर ही अपराधी बन जाए
जैसलमेर की जनता भी इससे अछूती नहीं। हर किसी ने देखा कि जमीनें लूटी जा रही हैं, तालाब पटाए जा रहे हैं, सूली डूंगर खोखला हो रहा है। पर किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। क्योंकि सबको कुछ न कुछ मिला। किसी को प्लॉट मिला, किसी को होटल का ठेका, किसी को लाइसेंस। और जो नहीं मिला, वह भी डर गया — क्योंकि सच बोलना अपराध हो गया।
एक पत्रकार की पीड़ा — जब शहर की आत्मा कराह उठे
राइजिंग भास्कर ने इस पूरे मामले की तह तक जाने की कोशिश की। फाइलें मांगीं, नक्शे देखे, पुराने राजस्व रिकॉर्ड खंगाले। पर हर दस्तावेज में एक ही बात लिखी थी —“नियमित कर दिया गया।” यह “नियमितीकरण” नहीं, यह जुर्म को वैध करने की प्रक्रिया है। शहर के एक हिस्से का दफन होना कागजों पर “विकास” कहलाया। सूली डूंगर के नीचे जो जमीनें हथियाई गईं, उनकी कीमत आज अरबों में है। और सरकार उस पर पांच करोड़ का “सनसेट पॉइंट” बना रही है। यानी लूट का स्मारक।
इतिहास मिटा, पर सवाल बाकी हैं
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किसने कलाकारों की कॉलोनी की जमीनें बेचीं?
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किसने मूल तालाब और जीवणियाई तालाब को भरकर सरकारी भवनों की नींव डाली?
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किसने अतिक्रमण की फाइलों पर हस्ताक्षर किए?
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और किसके आदेश से यह सब “नियमित” किया गया?
जब तक ये सवाल अनुत्तरित हैं, तब तक जैसलमेर की हर ईंट गवाह है कि शहर बिक चुका है।
अंत में – सूली डूंगर पर एक शहर लटका है
आज जब आप सूली डूंगर से सूर्यास्त देखेंगे, तो वह सिर्फ एक प्राकृतिक दृश्य नहीं होगा —वह इस शहर की ईमानदारी का डूबता सूरज होगा। कलेक्टर प्रताप सिंह, विधायक छोटूसिंह, नगर परिषद के अधिकारी, इंजीनियर —सबके चेहरे पर मुस्कान है, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे “पर्यटन” बढ़ा रहे हैं।
पर हकीकत यह है कि उन्होंने इतिहास को कंक्रीट में दफन कर दिया है। वे भूल गए हैं कि सूली डूंगर सिर्फ एक पहाड़ी नहीं —वह जैसलमेर की आत्मा थी। और आज वह आत्मा सूली पर झूल रही है, ठंडी हवा में उसकी फुसफुसाहट सुनाई देती है —
“मुझे बचाया जा सकता था…
पर तुम सबने मुझे बेच दिया।”








