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Thursday, February 19, 2026, 5:55 am

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वात्सल्य धारा चैरिटेबल ट्रस्ट और कैलाश की करुणा — राजू व्यास अपनी पेंशन और चंद्रा हर्ष व्यास अपने वेतन से करते हैं मानव सेवा

सन 2003 में जब जोधपुर में वात्सल्य धारा चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना हुई तब किसी ने नहीं सोचा था कि राजू व्यास और चंद्रा हर्ष व्यास का सेवा का सफर इतना सफल होगा कि पूरे जोधपुर में ही नहीं देश भर में इसकी चर्चा होगी। उनका मानव सेवा का यह आंदोलन वृहद आकार ले चुका है। इस ट्रस्ट की प्रेरणा उन्हें मिली दिगंबर जैन संत मुनि पुलक सागर जी महाराज से — जिनकी करुणा और मानव सेवा की भावना ने उन्हें भीतर तक छू लिया।

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

हम जोधपुर में राजू व्यास के फार्म हाउस पर पहुंचने के लिए ऑटो से रवाना हो चुके हैं। शाम का समय है। अचानक बारिश शुरू हो जाती है। जोधपुर की सड़कों पर पानी के रैलों के बीच हमारा ऑटो राजू व्यास के फार्म हाउस के सामने आकर रुकता है। मौसम की नजाकत को देखते हुए राजू व्यास हमारा इंतजार कर रहे हाेते हैं। जैसे ही हम ऑटो से उतरते हैं वे एंबुलेंस में बिठाकर अपने आवास पर ले जाते हैं। फार्म हाउस खेती से आच्छादित हैं और सरसों और कनेर के फूलों की सौंधी सुंगध चारों तरफ पसरी हुई है। इधर कपास पर तिरपाल रखा हुआ है ताकि कपास भीग ना जाए। फार्म हाउस में ट्यूबवेल भी है। जहां पर मोक्ष वाहन की धुलाई और साफ-सफाई व रखरखाव होता है। एक तरफ मोक्ष वाहन भी खड़ा है। एक रूम में कुछ चिकित्सा उपकरण, ऑक्सीजन सिलेंडर आदि भी रखे थे। छोटी-छाेटी पगडंडी से हम उनके आवास पर पहुंचे। राजू व्यास के पुत्र डॉ. हरिनारायण व्यास ने दरवाजा खोला और राधे-राधे के अभिवादन के साथ घर में प्रवेश किया। थोड़ी ही देर में राजू व्यास की धर्मपत्नी चंद्रा हर्ष व्यास चाय के साथ हमारे साथ आकर बैठती हैं और बातों का सिलसिला शुरू होता है।

जोधपुर की तपती रेत पर अगर कोई ठंडी छांव बनकर समाज को राहत देता है, तो वह हैं — राजू व्यास और उनकी धर्मपत्नी चंद्रा हर्ष व्यास। दोनों पति-पत्नी ने अपने जीवन को पूरी तरह मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। एक ओर राजू व्यास, जो सेवानिवृत्त हेड मास्टर हैं, अपनी पेंशन राशि को दूसरों के कल्याण में लगाते हैं, तो दूसरी ओर चंद्रा हर्ष व्यास, जो उम्मेद महिला अस्पताल में सीनियर नर्सिंग ऑफिसर हैं, अपने वेतन का हिस्सा समाज सेवा में अर्पित करती हैं।

प्रेरणा से प्रारंभ हुआ वात्सल्य का प्रवाह

सन 2003 में जब जोधपुर में वात्सल्य धारा चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना हुई तब किसी ने नहीं सोचा था कि राजू व्यास और चंद्रा हर्ष व्यास का सेवा का सफर इतना सफल होगा कि पूरे जोधपुर में ही नहीं देश भर में इसकी चर्चा होगी। उनका मानव सेवा का यह आंदोलन वृहद आकार ले चुका है। इस ट्रस्ट की प्रेरणा उन्हें मिली दिगंबर जैन संत मुनि पुलक सागर जी महाराज से — जिनकी करुणा और मानव सेवा की भावना ने उन्हें भीतर तक छू लिया।

मुनि पुलक सागर जी न केवल इस ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष और संरक्षक हैं, बल्कि देशभर में उनके मार्गदर्शन में कई ट्रस्टी काम कर रहे हैं — दिल्ली में अंकित जैन, गया में राजेश जैन, भोपाल में प्रदीप मामा और जोधपुर में राजू व्यास स्वयं इस सेवा के स्तंभ हैं।

सेवा के चार आयाम — मानवता का विस्तार

वात्सल्य धारा ट्रस्ट का उद्देश्य है मानव सेवा, आहार सेवा, पौधरोपण और शिक्षा।

1. मानव सेवा:

इस सेवा के तहत मोक्ष वाहन (शव वाहन) और एंबुलेंस सेवा पूरी तरह निशुल्क उपलब्ध करवाई जाती है। जाति, धर्म या वर्ग का कोई भेद नहीं — हर व्यक्ति को समान सम्मान के साथ अंतिम यात्रा का साधन मिलता है। राजू व्यास कहते हैं, “अंतिम संस्कार भी जीवन का हिस्सा है, और इसमें मदद करना सबसे बड़ी मानवता है।”
आज तक वे 10,000 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार करवाने में सहयोग कर चुके हैं — यह केवल सेवा नहीं, बल्कि मानव करुणा का जीवंत उदाहरण है।

2. आहार सेवा:

हर रविवार दिल्ली, नागपुर, भोपाल, इंदौर जैसे शहरों में गरीबों को निशुल्क सात्विक भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस सेवा में सैकड़ों स्वयंसेवक जुड़े हुए हैं। राजू व्यास बताते हैं कि “किसी भूखे को भोजन कराना ही सच्ची पूजा है।”

3. पौधरोपण:

मुनि पुलक सागर जी के सान्निध्य में देशभर में 725 ‘पुलक मंच’ बनाए गए हैं — जो निशुल्क पौधे वितरित करते हैं और पौधरोपण करते हैं। संयोजिका शोभा ताई (पुणे, महाराष्ट्र) के मार्गदर्शन में यह हरियाली का अभियान चल रहा है।

राजू व्यास कहते हैं, “एक पौधा लगाना, एक जीवन देने जैसा है।”

4. शिक्षा:

महाराष्ट्र के उपलाट स्थित जिन शरणम तीर्थ में 1 से 9वीं तक के बच्चों के लिए निशुल्क आवास और शिक्षण की व्यवस्था की गई है। यहां कोई शुल्क नहीं लिया जाता — हर बच्चे को वही अवसर मिलता है जो किसी सम्पन्न परिवार के बच्चे को मिलता है।

“कैलाश की करुणा” — पीड़ा में सहारा

2012 में मुनि पुलक सागर जी के निर्देशन में ही कैलाश की करुणा संस्था की स्थापना की गई, जिसने हजारों बीमार और असहाय लोगों को घर बैठे मेडिकल उपकरण उपलब्ध करवाए।
सर्जिकल बेड, ऑक्सीजन सिलेंडर, वाटर बेड, एयर बेड, निम्बोलाइज मशीन, सक्शन मशीन — सब बिना शुल्क, बिना जाति भेद और बिना चंदे के दिए जाते हैं। जब मरीज ठीक हो जाते हैं, तो उपकरण वापस लेकर कीटाणु रहित कर पुनः उपयोग में लाए जाते हैं।
जोधपुर, जैतारण और रांची में यह सेवा जीवन की डोर थामे हुए है।

सेवा का विज्ञान, मनोविज्ञान और अध्यात्म

राजू व्यास सेवा को केवल कर्म नहीं, बल्कि चार आयामों में समझते हैं — अध्यात्म, मनोविज्ञान, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान

  • अध्यात्म: “सेवा के बदले हमें पुण्य मिलता है।”

  • मनोविज्ञान: “सेवा मन से की जाती है, जिससे आत्मा तृप्त होती है।”

  • विज्ञान: “सेवा का फल अवश्य मिलता है; यह शरीर और मन को स्वस्थ रखती है।”

  • सामाजिक विज्ञान: “मनुष्य सामाजिक प्राणी है, इसलिए समाज के लिए कार्य करना उसका धर्म है।”

उनकी धर्मपत्नी चंद्रा हर्ष व्यास कहती हैं, “जब हम सेवा करते हैं, तब लगता है जैसे भगवान के दर्शन हो रहे हों। दर्द बांटने से ही जीवन सार्थक होता है।”

कोरोना काल का करुण अध्याय

जब पूरा देश लॉकडाउन में था, तब राजू व्यास ने पुष्टिकर महिला महाविद्यालय (सिवांची गेट) में क्वारेंटाइन सेंटर खोला।
आनंद पुरोहित के नेतृत्व में वहां रहने, खाने और चिकित्सा की सभी सुविधाएं निशुल्क दी गईं। सैकड़ों लोगों को इस सेवा से जीवन-सहारा मिला।

अगली पीढ़ी भी उसी राह पर

राजू व्यास के पुत्र डॉ. हरिनारायण व्यास, जिन्होंने एमबीबीएस किया है, अपने माता-पिता से प्रेरित हैं। वे कहते हैं — “मेरे पिता ने जो राह दिखाई है, वही असली चिकित्सा है — शरीर ही नहीं, आत्मा का उपचार।”

पांच बार कैलाश-मानसरोवर यात्रा — सेवा का प्रतिफल

राजू व्यास और चंद्रा हर्ष व्यास के जीवन में सेवा का पुण्य ही शायद वह अदृश्य शक्ति है, जिसने उन्हें पांच बार कैलाश-मानसरोवर यात्रा का अवसर दिलाया। वे इसे किसी साधारण यात्रा के रूप में नहीं, बल्कि सेवा के प्रतिफल के रूप में देखते हैं।
राजू व्यास मुस्कराते हुए कहते हैं, “हमने कुछ नहीं किया, बस सेवा की — बाकी सब भगवान ने करवा दिया।”

माटी के दीप — मानवता की जीवंत मिसाल

आज जब समाज में स्वार्थ और भौतिकता का बोलबाला है, तब राजू व्यास और चंद्रा हर्ष व्यास जैसे लोग मानवता के सच्चे दीपक हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि सेवा का कोई धर्म, जाति या सीमा नहीं होती।
उनका जीवन यह सिखाता है कि यदि मन में करुणा है और कर्म में निस्वार्थता, तो वही जीवन सफल है। राजू व्यास और चंद्रा हर्ष व्यास की कहानी सिर्फ एक दंपती की नहीं, बल्कि उस भारत की है — जहां सेवा ही साधना है, और करुणा ही धर्म।

 

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor