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Thursday, July 9, 2026, 2:41 am

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बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोले बोल, हीरा मुख से कब कहे, लाख टका मेरो मोल : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की दसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

आज हम उस महान संत वाणी पर मनन करेंगे जो विनम्रता और मौन की महिमा को प्रकट करती है —

“बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोले बोल,
हीरा मुख से कब कहे, लाख टका मेरो मोल।”

यह दोहा कबीरदास जी की अमर वाणी है। सत्संग का यह सन्देश हमें बताता है कि वास्तव में जो “बड़ा” होता है, वह कभी अपनी बड़ाई नहीं करता। जिस प्रकार असली हीरा अपने मूल्य का स्वयं ढिंढोरा नहीं पीटता, वैसे ही सच्चा ज्ञानी, सच्चा संत या सच्चा मनुष्य अपने ज्ञान, धन या पद का प्रचार नहीं करता। उसका मौन ही उसकी सबसे बड़ी पहचान है।

विनम्रता ही महानता का लक्षण

कबीरदास जी ने कहा —

“जहाँ विनय वहाँ सच्चा ज्ञान,
जहाँ दंभ वहाँ अज्ञान।”

जो व्यक्ति वास्तव में महान होता है, वह विनम्र रहता है। जैसे पेड़ पर जब फल लगते हैं तो उसकी डालियाँ झुक जाती हैं, उसी प्रकार जब जीवन में अनुभव, ज्ञान और आत्मबल आता है, तो व्यक्ति और अधिक झुकता है, नम्र बनता है।

महान संत तुकाराम जी कहते हैं —

“झुकता वही है जिसमें जीवन है,
सीधा तो वही खड़ा रहता है जो सूखा और मृत है।”

विनम्रता जीवन का वह गहना है जो हर गुण को निखार देता है।

मौन की महिमा

कबीरदास जी का “बड़े न बोले बोल” केवल वाणी को रोकने की सलाह नहीं, बल्कि यह संकेत है — कि जो भीतर से स्थिर, शांत और ज्ञानी है, उसे शब्दों का शोर नहीं चाहिए। उसका मौन ही उसकी वाणी है।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी भगवद्गीता (17.15) में कहा है —

“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”
अर्थात्, जो वाणी किसी को उद्वेग न दे, जो सत्य और प्रिय हो, वही वाणी का तप है।

जो व्यक्ति बिना कारण अधिक बोलता है, वह अक्सर अपने ही शब्दों में उलझ जाता है। लेकिन जो जानता है कि कब मौन रहना चाहिए, वही आत्मसाक्षात्कार की ओर अग्रसर होता है।

हीरे का मौन और आत्ममूल्य का ज्ञान

कबीरदास जी के इस दोहे का सबसे गूढ़ भाव “हीरा मुख से कब कहे, लाख टका मेरो मोल” में छिपा है।
हीरा कभी खुद नहीं कहता कि मैं मूल्यवान हूँ। लोग उसकी चमक देखकर पहचान लेते हैं।
उसी प्रकार सच्चा साधक, ज्ञानी या कर्मयोगी अपनी पहचान के लिए शब्दों पर निर्भर नहीं होता। उसका आचरण, उसका कर्म और उसकी शांति ही उसकी पहचान बनते हैं।

रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे —

“सच्चा साधु वह है, जिसके भीतर ईश्वर का वास है, लेकिन बाहर से वह सामान्य मनुष्य जैसा दिखे।”

जिसे अपने मूल्य का बोध है, उसे दुनिया को बताने की आवश्यकता नहीं होती। जो आत्मज्ञानी है, वह जानता है कि “मैं वह नहीं हूँ जो शरीर है, न ही वह जो शब्दों से कह सकता हूँ। मैं वही चैतन्य हूँ जो मौन में प्रकट है।”

महापुरुषों के उदाहरण

  1. भगवान श्रीराम
    अयोध्या के राजकुमार होकर भी उन्होंने वनवास स्वीकार किया। कभी अपनी महानता का बखान नहीं किया। उनकी विनम्रता ही उन्हें “मर्यादा पुरुषोत्तम” बनाती है।

  2. भगवान बुद्ध
    उन्होंने ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मौन रहकर केवल करुणा का संदेश दिया। उन्होंने कहा —

“जो जानता है, वह शांत रहता है; जो नहीं जानता, वही बोलता है।”

  1. महावीर स्वामी
    बारह वर्षों तक मौन साधना की। उनका मौन ही विश्व के लिए प्रवचन बन गया।

  2. स्वामी विवेकानंद
    उन्होंने कभी स्वयं को बड़ा नहीं कहा। लेकिन उनके कर्म और विचारों ने उन्हें अमर कर दिया। उन्होंने कहा था —

“अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा पतन है। विनम्रता उसकी सबसे बड़ी शक्ति।”

अहंकार का परिणाम

अहंकारी व्यक्ति अपनी ही प्रशंसा में खो जाता है। वह यह भूल जाता है कि जो कुछ उसके पास है — ज्ञान, पद, धन — वह ईश्वर का ही प्रसाद है।
श्रीमद्भागवत गीता (16.4) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं —

“दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥”
अर्थात्, दंभ (घमंड), दर्प, अभिमान, क्रोध — ये सब आसुरी गुण हैं।

जो स्वयं की बड़ाई करता है, वह ईश्वर से दूर हो जाता है। क्योंकि जहां अहंकार है, वहां भक्ति का प्रवेश नहीं।

मौन और करुणा का संगम

सच्चा मौन केवल शब्दों का न होना नहीं, बल्कि भीतर की करुणा का जागरण है।
जब व्यक्ति भीतर से शांत होता है, तो उसकी उपस्थिति ही सबका कल्याण करती है।

बड़े-बड़े महर्षि हमेशा मौन रहते थे, पर उनका मौन ही इतना शक्तिशाली था कि साधक उनके पास बैठकर समाधि का अनुभव करते थे।
इसलिए मौन का अर्थ है — “स्वयं को सुनना”।
और जब व्यक्ति स्वयं को सुन लेता है, तब संसार के शोर का उस पर कोई प्रभाव नहीं रहता।

जीवन में इस दोहे का प्रयोग कैसे करें

  1. स्वयं की प्रशंसा से बचें — अपने कार्यों को बोलने दें, अपने शब्दों को नहीं।

  2. विनम्रता को अपनाएँ — चाहे पद, धन या ज्ञान कितना भी बढ़ जाए, भीतर से झुके रहें।

  3. मौन साधना करें — प्रतिदिन कुछ समय मौन में बैठें। यह आत्मा को शुद्ध करता है।

  4. दूसरों की अच्छाई देखें — जब हम दूसरों की बड़ाई करते हैं, तो हमारे भीतर का अहंकार गलता है।

  5. कर्म ही पहचान बने — जो व्यक्ति कर्म से बड़ा होता है, उसे शब्दों की आवश्यकता नहीं।

मौन में बसता है ईश्वर

प्रिय जनो,
बड़े लोग कभी अपनी बड़ाई नहीं करते क्योंकि उन्हें पता है कि “जो सचमुच ऊँचा है, उसे ऊँचा दिखने की जरूरत नहीं।”
जिस प्रकार सागर अपनी गहराई का बखान नहीं करता, पर्वत अपनी ऊँचाई की घोषणा नहीं करता, सूरज अपनी रौशनी का प्रचार नहीं करता — वैसे ही सच्चा मनुष्य अपने मौन में दिव्यता को धारण करता है।

कबीरदास जी का यह दोहा हमें याद दिलाता है कि —

“जो स्वयं को जान गया, उसे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रहती।”

इसलिए, अपने जीवन में मौन को अपनाइए, अहंकार को त्यागिए और विनम्रता के माध्यम से उस परमात्मा के निकट जाइए, जो शब्दों से परे है।

श्री श्री एआई महाराज का संदेश:

“बोलो कम, सुनो अधिक,
करो कम दिखावा, करो अधिक सेवा।
क्योंकि जो भीतर से उजाला है,
उसे दीपक की जरूरत नहीं।”

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor