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Saturday, January 24, 2026, 1:51 am

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राइजिंग भास्कर अभियान : “जेल सजा नहीं, सुधार का आधार” — अब जेलों में इंसानियत की हवा बहनी चाहिए

ब्रिटेन के एक NGO की रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारत की जेलें आज भी अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़माने की हालत में हैं, जहां कैदियों को इंसान नहीं, दोषी समझकर रखा जाता है।” राइजिंग भास्कर इसी सोच को बदलने के लिए एक नया राष्ट्रीय अभियान शुरू कर रहा है — “जेल सजा नहीं, सुधार का आधार”।

नॉर्वे, स्वीडन और जापान — में जेलों को ‘रीहैबिलिटेशन सेंटर’ के रूप में विकसित किया गया है। वहां कैदियों को पंखे, कूलर, स्वच्छ स्नानघर, किताबें, इंटरनेट और परिजनों से मुलाकात के अवसर तक की सुविधाएं दी जाती हैं। परिणामस्वरूप, ऐसे देशों में अपराधियों के दोबारा अपराध करने की दर (re-offending rate) 10% से भी कम है। भारत में यह दर 47% तक पहुंच चुकी है।

रिपोर्ट : डीके पुरोहित. लंदन 

भारत की जेलें — एक ऐसा शब्द जो सुनते ही हमारे मन में भय, अपराध और सजा की कठोर तस्वीर उभर आती है। पर क्या वाकई जेलें केवल अपराधियों को सजा देने का माध्यम हैं या समाज में सुधार लाने की प्रयोगशाला होनी चाहिए? यही सवाल ब्रिटेन के एक NGO की रिपोर्ट ने भारत की न्याय प्रणाली और प्रशासन के सामने रखा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “भारत की जेलें आज भी अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़माने की हालत में हैं, जहां कैदियों को इंसान नहीं, दोषी समझकर रखा जाता है।” राइजिंग भास्कर इसी सोच को बदलने के लिए एक नया राष्ट्रीय अभियान शुरू कर रहा है — “जेल सजा नहीं, सुधार का आधार”।

जेल में भी जीने का अधिकार

ब्रिटेन के NGO की 230 पन्नों की यह रिपोर्ट भारतीय जेल व्यवस्था पर गहराई से की गई स्टडी पर आधारित है। इसमें साफ कहा गया है कि जेल में कैदियों से उनकी मूलभूत सुविधाएं छीन लेना मानवाधिकार का उल्लंघन हैं।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनिया के कई देशों — जैसे नॉर्वे, स्वीडन और जापान — में जेलों को ‘रीहैबिलिटेशन सेंटर’ के रूप में विकसित किया गया है। वहां कैदियों को पंखे, कूलर, स्वच्छ स्नानघर, किताबें, इंटरनेट और परिजनों से मुलाकात के अवसर तक की सुविधाएं दी जाती हैं। परिणामस्वरूप, ऐसे देशों में अपराधियों के दोबारा अपराध करने की दर (re-offending rate) 10% से भी कम है। भारत में यह दर 47% तक पहुंच चुकी है।

राइजिंग भास्कर की मांगें: जेलों में सुधार के लिए 10 सूत्रीय संकल्प

राइजिंग भास्कर इस रिपोर्ट को आधार बनाकर एक 10 सूत्रीय सुधार संकल्प लेकर आया है, जिसे “मानवता के साथ न्याय” की दिशा में एक राष्ट्रीय मुहिम के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा।

  1. हर बैरक में पंखा, कूलर और पर्याप्त रोशनी:
    राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की जेलों में गर्मियों में कैदी 45 से 48 डिग्री तापमान में भी बिना पंखे के रहते हैं। राइजिंग भास्कर का कहना है कि जेल में सजा भले हो, पर यातना नहीं।
  2. सर्दियों में रज़ाई, बिस्तर और गर्म कपड़े का प्रावधान:
    कई जेलों में कैदियों को रातभर ठंड से कांपते देखा गया है। जेल प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर कैदी के पास पर्याप्त गर्म कपड़े और रज़ाई उपलब्ध हों।
  3. महिला बैरक में संलग्न स्नानघर और शौचालय:
    महिला कैदियों के लिए यह सबसे बड़ी जरूरत है। राइजिंग भास्कर मांग करता है कि महिला बैरक में let-bath attach व्यवस्था अनिवार्य की जाए ताकि सुरक्षा और गरिमा बनी रहे।
  4. हर बैरक में CCTV कैमरे:
    ताकि किसी कैदी के साथ शारीरिक या मानसिक उत्पीड़न की घटना हो तो साक्ष्य उपलब्ध हो सके। पारदर्शिता जेल में भी जरूरी है। कई बार जेल में सुसाइड के मामले होते हैं, ऐसे में पता लगाना मुश्किल होता है कि यह सुसाइड है या हत्या।
  5. गुणवत्तापूर्ण भोजन:
    कैदी भी मनुष्य हैं। उन्हें पौष्टिक और स्वच्छ भोजन का अधिकार है। राइजिंग भास्कर का सुझाव है कि जेल के भोजन की गुणवत्ता की जांच जिला प्रशासन के स्वतंत्र निरीक्षण पैनल द्वारा हर माह की जाए।
  6. कैदियों के साथ मानवीय व्यवहार:
    रिपोर्ट में कहा गया है कि जेल कर्मचारी और पुलिसकर्मी का व्यवहार अक्सर दंडात्मक होता है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें “मानव अधिकार और व्यवहारिक संवेदना” पर विशेष मॉड्यूल सिखाया जाए।
  7. उम्र और स्वास्थ्य के आधार पर रियायतें:
    70 वर्ष से अधिक उम्र के कैदियों, विशेष रूप से जो 7 साल से अधिक सजा काट चुके हैं, उन्हें मानवीय आधार पर रिहाई दी जाए। रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि उम्रकैद का अर्थ जीवनभर जेल नहीं होना चाहिए, बल्कि सुधार की संभावना देखते हुए पुनर्विचार होना चाहिए।
  8. पति-पत्नी अगर एक ही जेल में हों तो साथ मिलने का अवसर:
    मानवीय और पारिवारिक भावनाओं को देखते हुए, ऐसे दंपती को महीने में तीन दिन साथ समय बिताने का अवसर दिया जाए। इससे मानसिक स्थिरता और भावनात्मक सुधार में मदद मिलेगी।
  9. 6 महीने में एक बार 24 घंटे घर जाने की अनुमति:
    जो कैदी अच्छा आचरण दिखा चुके हों, उन्हें यह रियायत दी जाए कि वे हर छह महीने में एक बार अपने परिवार के साथ 24 घंटे बिता सकें।
    इसका प्रयोग दक्षिण कोरिया और स्वीडन में हो चुका है और परिणाम सकारात्मक रहे हैं।
  10. शिक्षा और तकनीक का अधिकार:
    जेलों में पुस्तकालय, पेन, डायरियां, कंप्यूटर और इंटरनेट की सीमित व नियंत्रित सुविधा दी जाए ताकि कैदी अपने कौशल को बढ़ा सकें। ज्ञान ही सुधार की सबसे बड़ी चाबी है।

रिपोर्ट में सबसे गंभीर तथ्य: 65% बंदी बिना फैसले के जेल में!

NGO रिपोर्ट का सबसे दर्दनाक खुलासा यही है — भारत की जेलों में 65 प्रतिशत बंदी ऐसे हैं जिनका अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ है। यानी वे “सजा भुगत रहे हैं बिना दोष सिद्ध हुए।” यह केवल अन्याय नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 — “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार” — का खुला उल्लंघन है। कई मामलों में तो बंदी दस साल से अधिक समय से विचाराधीन हैं। राइजिंग भास्कर का यह अभियान इन्हीं आवाज़ों को सामने लाने का प्रयास है।

आसाराम बापू प्रकरण और उम्रकैद की सीमा

रिपोर्ट ने एक विशेष सिफारिश की है — कि 70 वर्ष से ऊपर के कैदियों, जिन्होंने कम से कम सात वर्ष की कैद पूरी कर ली है, उन्हें रिहा कर देना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आसाराम बापू जैसे मामलों में भी मानवीय दृष्टि से पुनर्विचार किया जाना चाहिए। भारत में दया याचिका और विशेष रिहाई के प्रावधान पहले से मौजूद हैं; जरूरत है, उन्हें संवेदनशीलता के साथ लागू करने की।

जेल सुधार = राष्ट्र सुधार

राइजिंग भास्कर मानता है कि जेल केवल अपराधियों को बंद करने की जगह नहीं, बल्कि उन्हें सुधारकर समाज के योग्य नागरिक बनाने का स्थान होना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने कहा था — “हर पापी में एक संत छिपा होता है, बस उसे जगाने की जरूरत होती है।” यदि भारत अपने जेल सिस्टम को “दंड केंद्र” से “सुधार केंद्र” में बदल सके, तो यह न केवल अपराध दर घटाएगा बल्कि समाज में सकारात्मकता भी बढ़ाएगा।

विश्व में भारत की छवि और मानवीय सुधार का संकेत

संयुक्त राष्ट्र की Human Rights Council ने पहले ही सदस्य देशों से अपील की है कि जेलों में “मानवीय जीवन” सुनिश्चित किया जाए। भारत, जो खुद को “वसुधैव कुटुंबकम” की भूमि कहता है, उसके लिए यह कदम न केवल सुधार का, बल्कि अपनी सांस्कृतिक आत्मा के पुनर्जागरण का प्रतीक होगा। जब जेलों में भी मानवता का व्यवहार होगा, तभी “सुधार” का असली अर्थ स्थापित होगा।

सौ बातों की एक बात : “जेल में बंद शरीर, पर खुला मन”

राइजिंग भास्कर का यह अभियान सरकार, न्यायपालिका, और समाज तीनों से अपील करता है कि —

“जेल की दीवारें सजा का प्रतीक नहीं, सुधार का दरवाज़ा बनें।”

क्योंकि एक देश का असली सभ्य होना इस बात से तय होता है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों — चाहे वे जेल में हों या बाहर — के साथ कैसा व्यवहार करता है।

अब वक्त है कि भारत की जेलों में भी मानवीय हवा बहे। जहाँ अपराध का प्रायश्चित केवल बंद दीवारों के पीछे नहीं, बल्कि संवेदना, शिक्षा और सुधार की रोशनी में हो। राइजिंग भास्कर इस दिशा में पहला कदम बढ़ा चुका है —“जेल सजा नहीं, सुधार का आधार।” अब देश की संवेदनशील न्यायपालिका और जागरूक सरकार से उम्मीद है कि यह आवाज़ सिर्फ रिपोर्ट तक सीमित न रहे, बल्कि नीतियों में तब्दील हो।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor