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Saturday, December 6, 2025, 8:18 pm

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मातृश्री शरणम् संस्थान के संयोजक योगाचार्य दिलीप टाक की मान्यता — जब मनुष्य प्रकृति से जुड़ता है, तभी जीवन में सच्ची शांति और स्वास्थ्य लाभ संभव है

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सेवा ही साधना है, प्रकृति ही समाधान है। प्रकृति की अनदेखी करने से ही समस्याओं का जन्म होता है और अगर हम प्रकृति की साधना करेंगे तो प्रकृति हमारा सहयोग करेंगी। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन करने से आज चारों ओर विकृतियां पैदा हो रही हैं। यह कहना है मातृश्री शरणम संस्थान के संयोजक योगाचार्य दिलीप टाक (ऊँ दीप) का। प्रस्तुत है उनसे लिया साक्षात्कार।  

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

प्रकृति। योग। ध्यान। सेवा। संस्कार। संस्कृति। साधना। परोपकार। ये सारे शब्द मातृश्री शरणम् संस्थान के लिए बने हैं। संस्थान बिना किसी आड़ंबर के अपने मिशन में लगी हुई है। संस्थान का एक ही ध्येय वाक्य है- प्रकृति हमारे लिए और हम प्रकृति के लिए। यही बात ध्यान में रखते हुए संस्थान की ओर से प्राकृतिक पद्धति से उपचार उपलब्ध करवाया जाता है। ध्यान और योग शिविर लगाए जाते हैं। पौधरोपण, जीव-जंतु संरक्षण और पशु कल्याण कार्य किए जाते हैं। मानव सेवा से लेकर जीव सेवा तक हर दिशा में संस्थान राह बनाती जा रही है। संस्थान के संयोजक योगाचार्य दिलीप टाक उर्फ ऊँ दीप से राइजिंग भास्कर ने विशेष बातचीत की। यहां प्रस्तुत है संपादित अंश-

राइजिंग भास्कर : मातृश्री शरणम संस्थान की स्थापना किन उद्देश्यों से की गई थी?

योगाचार्य दिलीप : मातृश्री शरणम संस्थान की स्थापना का मूल उद्देश्य मनुष्य को फिर से प्रकृति के करीब लाना है। 2008 में हमने इसकी स्थापना की थी। आज की तेज़ रफ़्तार जिंदगी में लोग कृत्रिमता में खो गए हैं, जबकि समाधान तो प्रकृति के पास ही है। हमारा संस्थान प्रकृति के अनुरूप सेवाएं प्रदान करता है — पौधरोपण से लेकर जीव संरक्षण, गोशाला सेवा, चुग्गाघर संचालन और प्राकृतिक चिकित्सा के माध्यम से रोगों का निवारण तक। हमारी सोच सरल है — प्रकृति ही परमात्मा का साकार रूप है, और उसकी सेवा ही सच्ची साधना है।

राइजिंग भास्कर : हर साल दीपोत्सव पर संस्थान द्वारा विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, उसके बारे में बताइए।

योगाचार्य दिलीप : हां, दीपोत्सव हमारे लिए सिर्फ रोशनी का त्योहार नहीं, बल्कि सेवा का उत्सव है। हर साल शांति भवन, रामसागर चौराहा, मगरा पूंजला पर दीपोत्सव कार्यक्रम आयोजित होता है। इस दौरान जरूरतमंद परिवारों को घरेलू सामान, कपड़े, मिठाइयाँ और फल वितरित किए जाते हैं। हम अंध विद्यालयों और मानसिक रूप से विशेष बच्चों के स्कूलों में सामग्री बांटते हैं। गोशालाओं में लापसी खिलाई जाती है। हमारे कार्यकर्ता तन, मन और धन से पूरी निष्ठा के साथ इस सेवा में जुटते हैं।

राइजिंग भास्कर : आपके संस्थान की नजर में सेवा की परिभाषा क्या है?

योगाचार्य दिलीप : हमारे लिए सेवा का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख को अपना मानना है। हम कहते हैं — “सेवा कौन कर रहा है यह मत पूछो, हर सेवा पर आपका नाम ही लिखा है, बस यह याद रखना।” यही भावना हमारे हर कार्यकर्ता में रची-बसी है। चाहे कोई पौधा लगाना हो या किसी भूखे को भोजन देना — हर कार्य भगवान की पूजा के समान है।

राइजिंग भास्कर : कोरोना काल में संस्थान ने जो सेवा कार्य किए, उसके बारे में बताइए।

योगाचार्य दिलीप : वह समय पूरे समाज के लिए परीक्षा की घड़ी थी। उस दौरान हमने प्रतिदिन ताज़ा भोजन और सब्जियाँ तैयार कर वाहन द्वारा घर-घर पहुँचाई। कई परिवारों तक मदद उस समय पहुँची जब वे सबसे अधिक असहाय थे। हमने “सेवा का मेला” भी लगाया, जिसमें समर्थ व्यक्ति असमर्थों की सहायता करते थे — कोई राशन देता, कोई दवा, कोई श्रमदान करता। यह मेला वास्तव में मानवता का उत्सव बन गया।

राइजिंग भास्कर : संस्थान प्राकृतिक चिकित्सा को विशेष महत्व क्यों देता है?

योगाचार्य दिलीप : क्योंकि प्रकृति ही सबसे बड़ी चिकित्सक है। शरीर के सभी रोगों का कारण असंतुलन है, और यह संतुलन प्रकृति से ही लौटता है। हम बिना दवा, बिना खर्च, सिर्फ प्राकृतिक नियमों को अपनाकर रोगों से मुक्ति पा सकते हैं। प्रकृति में चमत्कार हैं, बस हमें उसे पहचानने और उससे जुड़ने की आवश्यकता है। इसी उद्देश्य से हम गांव-गांव “प्रकृति से समाधान शिविर” आयोजित करते हैं, जहाँ लोगों को सिखाया जाता है कि कैसे वे खुद अपने शरीर और मन का उपचार प्रकृति के माध्यम से कर सकते हैं।

राइजिंग भास्कर : योग और ध्यान शिविरों के आयोजन से लोगों को क्या लाभ हुआ है?

योगाचार्य दिलीप : हमारे शिविरों में सैकड़ों लोग अब तक लाभान्वित हो चुके हैं। श्री लाल बहादुर शास्त्री कॉलेज सहित कई स्थानों पर हमने योग और ध्यान शिविर लगाए हैं। योग से शरीर संतुलित होता है, ध्यान से मन शांत होता है — और जब मन-शरीर दोनों स्थिर होते हैं, तभी व्यक्ति जीवन के सच्चे अर्थ को समझ पाता है। हमारा लक्ष्य है कि हर व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को पहचान सके और प्रकृति के साथ एकात्म भाव से जी सके।

राइजिंग भास्कर : संस्थान की भविष्य की योजनाएं क्या हैं?

योगाचार्य दिलीप : हम “प्रकृति समाधान अभियान” को गांव-कस्बों तक पहुंचाना चाहते हैं। बाल कल्याण, मातृशक्ति जागरूकता, संस्कार और संस्कृति उत्थान जैसे विषयों पर भी कार्यक्रम नियमित रूप से चलते रहते हैं। हम चाहते हैं कि समाज के हर वर्ग तक यह संदेश पहुंचे — प्रकृति से जुड़ना ही जीवन का असली विकास है।

राइजिंग भास्कर : आपके अनुसार सेवा और आध्यात्मिकता का संबंध क्या है?

योगाचार्य दिलीप : सेवा और आध्यात्मिकता दो अलग चीज़ें नहीं हैं — दोनों एक ही धारा की दो दिशाएं हैं। जब आप निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं, तब ईश्वर आपके भीतर जागता है। हम माला, माइक और मंच से दूर रहते हैं, क्योंकि सच्ची सेवा के लिए प्रदर्शन की नहीं, समर्पण की आवश्यकता होती है। हमारी कोशिश यही रहती है कि हम बिना नाम-यश की इच्छा के, बस मानवता के लिए कार्य करते रहें।

राइजिंग भास्कर : अंत में आप समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?

योगाचार्य दिलीप : मेरा संदेश सरल है — प्रकृति से जुड़ो, क्योंकि वही तुम्हारा असली घर है। अपने आसपास के पेड़, पशु, पक्षी और मनुष्य — सबके प्रति प्रेम और संवेदना रखो। जब हम प्रकृति के नियमों के अनुसार जीते हैं, तो जीवन स्वयं सहज और शांत हो जाता है। हर व्यक्ति में चेतना है, बस उसे पहचानने की देर है।

संस्थान का संपर्क सूत्र : 

मातृश्री शरणम् संस्थान, मेन रोड, 

कीर्ति नगर, नियर माली संस्थान, मगरा पूंजला, जोधपुर- 342307

मोबाइल नंबर : 9460590031

 

Rising Bhaskar
Author: Rising Bhaskar


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