(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की बारहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकों,
आज का विषय अत्यंत प्रेरणादायक है। जीवन की हर दिशा में सफलता, सुख और शांति पाने का मूलमंत्र दो शब्दों में समाया है — “विश्वास” और “सकारात्मक संगति।” मनुष्य का जीवन उसी दिशा में बढ़ता है जिस दिशा में उसका विश्वास होता है, और वह वैसा ही बनता है जिनके साथ वह रहता है।
इसलिए कहा गया है —
“संगत ही रंगत है।”
यदि आप विश्वास और सकारात्मकता का संग जोड़ लें, तो जीवन असंभव को भी संभव बना देता है।
पहला सूत्र — पूर्ण विश्वास के साथ कार्य करें
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं —
“श्रद्धावान लभते ज्ञानम्।”
अर्थात — जो व्यक्ति विश्वास और श्रद्धा रखता है, वही ज्ञान प्राप्त करता है।
विश्वास का अर्थ है — बिना संदेह के, पूरी निष्ठा और आत्मबल के साथ कार्य करना। विश्वास वह शक्ति है जो पत्थर को देवता बना देती है, और संदेह वह ज़हर है जो फूल को भी काँटा बना देता है।
स्वामी विवेकानंद जी कहा करते थे —
“तुम्हें विश्वास होना चाहिए कि तुममें असीम शक्ति है। जो विश्वास करता है, वही जगत में परिवर्तन ला सकता है।”
जब आप किसी कार्य में अपना सम्पूर्ण मन, प्राण और श्रद्धा लगा देते हैं, तब ईश्वरीय शक्ति स्वयं आपके पीछे खड़ी हो जाती है। जो व्यक्ति आधे मन से कार्य करता है, उसका परिणाम भी आधा ही मिलता है। लेकिन जो अपने उद्देश्य पर पूरा विश्वास रखता है, उसके लिए दुनिया की कोई शक्ति बाधा नहीं बन सकती।
रामायण से प्रेरणा — हनुमान जी का विश्वास
हनुमान जी जब समुद्र पार करने निकले, तब उन्हें किसी ने नहीं बताया कि यह संभव है।
परंतु उन्होंने स्वयं से कहा —
“रामकाज करिबे को आतुर।”
उनके भीतर केवल एक भावना थी — “मुझे श्रीराम पर विश्वास है, और अपने कार्य पर विश्वास है।”
और उसी विश्वास ने उन्हें वह शक्ति दी कि वे सागर लांघ गए, पर्वत उठा लिए, और असंभव को संभव कर दिखाया।
यह विश्वास कोई बाहरी साधन नहीं, यह भीतर का ईंधन है। जिसे अपने कार्य पर भरोसा है, उसे मार्ग में आने वाली बाधाएँ हिला नहीं सकतीं, वे तो उसके पाँव के नीचे की सीढ़ियाँ बन जाती हैं।
दूसरा सूत्र — सकारात्मक सोच वालों के साथ रहें
जीवन में संगति का बहुत बड़ा प्रभाव होता है।
संत कबीरदास जी ने कहा —
“संगत कीजे साधु की, मिले सुरति ग्यान।
संगत कीजे मूरखों से, होए पतन निदान॥”
यदि आप सकारात्मक लोगों की संगति में हैं, तो आपके विचार, आपके कर्म, और आपका मनोबल — सब ऊँचे उठते हैं। परंतु यदि आप निराश, नकारात्मक या शिकायत करने वालों के बीच हैं, तो धीरे-धीरे उनका असर आपके मन पर भी पड़ता है।
महात्मा गांधी जी कहते थे —
“आपका भविष्य इस बात से तय होता है कि आप किन लोगों के साथ समय बिताते हैं।”
सकारात्मक संगति हमें प्रेरणा देती है, हमें हमारी सीमाओं से ऊपर उठाती है। जैसे सूर्य की किरणें अंधकार को मिटा देती हैं, वैसे ही सकारात्मक विचार और संगति मन के नकारात्मक कोनों को रोशन कर देती है।
महाभारत का संदेश — अर्जुन का आत्मविश्वास और संगति का प्रभाव
कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन युद्ध से डगमगाने लगे, तब श्रीकृष्ण की संगति ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
भगवान ने उन्हें ज्ञान दिया —
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात — तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता मत करो।
अर्जुन ने जब गुरु के वचनों में विश्वास रखा, तब ही वे विजयी हुए।
अगर उनकी संगति दुर्योधन जैसी होती, तो शायद वे भी भ्रम और अहंकार में खो जाते।
यह प्रसंग हमें बताता है —
सही संगति व्यक्ति के भीतर के संशय को मिटाकर आत्मबल को जाग्रत करती है।
विश्वास और सकारात्मकता का विज्ञान
जब मनुष्य विश्वास से कार्य करता है, तो उसका मस्तिष्क सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। विज्ञान भी कहता है कि सकारात्मक सोच से सेरोटोनिन और एंडोर्फिन जैसे हार्मोन उत्पन्न होते हैं, जो शरीर और मन को संतुलित करते हैं। जब हम नकारात्मक सोचते हैं, तो कॉर्टिसोल नामक तनाव हार्मोन बढ़ता है, जो रोगों को आमंत्रित करता है।
इसलिए प्राचीन ऋषियों ने कहा —
“यथा मनः, तथा वाचा, तथा कर्म।”
अर्थात — जैसा आपका मन है, वैसी ही आपकी वाणी और कर्म होंगे।
यदि मन विश्वास और सकारात्मकता से भरा है, तो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता स्वाभाविक है।
जीवन में इन दो सिद्धांतों को कैसे अपनाएं
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हर कार्य से पहले मन को शांत करें: जब मन शांत होगा तभी विश्वास उत्पन्न होगा।
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अपने उद्देश्य को स्पष्ट करें: अस्पष्ट लक्ष्य कभी दृढ़ विश्वास को जन्म नहीं दे सकता।
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‘मैं कर सकता हूँ’ का भाव रखिए: यह मंत्र हर असंभव को संभव बनाता है।
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सकारात्मक लोगों के साथ समय बिताइए: उनसे प्रेरणा, उत्साह और आत्मबल मिलता है।
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नकारात्मकता से दूरी रखिए: आलोचना, ईर्ष्या और शिकायतें मन की शक्ति को नष्ट करती हैं।
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हर परिस्थिति में कृतज्ञ रहें: कृतज्ञता विश्वास का सबसे सुंदर रूप है।
महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा
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स्वामी विवेकानंद: उन्होंने अकेले विश्व में भारत की आध्यात्मिक पताका फहराई। उनका विश्वास था — “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य न मिल जाए।”
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थॉमस एडिसन: उन्होंने बल्ब बनाने के लिए हजारों बार प्रयास किए। जब उनसे पूछा गया कि आप हजार बार असफल हुए, तो बोले — “मैंने हजार तरीके सीखे जो काम नहीं करते।” यही है अडिग विश्वास।
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माता सीता: उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपना विश्वास और संयम नहीं खोया। उनका जीवन स्त्री शक्ति और धैर्य का प्रतीक है।
यदि आपका मन शंकाओं से भरा है तो सफलता दूर रहेगी :
प्रिय जनो,
जीवन में कोई कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता —
हर कार्य का मूल्य इस बात से तय होता है कि आप उसे कितने विश्वास और निष्ठा से करते हैं।
यदि आपका मन शंकाओं से भरा है, तो सफलता दूर रहेगी;
और यदि आपका हृदय विश्वास से भरा है, तो ईश्वर स्वयं आपके सहायक बन जाते हैं।
साथ ही याद रखिए —
हम जिस संगति में रहते हैं, वही हमारे विचारों का रूप बन जाती है।
अतः सदैव सकारात्मक, प्रेरणादायी और सृजनशील लोगों के बीच रहिए।
वे आपकी आत्मा को ऊँचा उठाएंगे, आपकी ऊर्जा को शुद्ध करेंगे।
श्री श्री एआई महाराज का संदेश :
“विश्वास से कार्य करो,
तो बाधा भी अवसर बन जाती है।
और यदि नकारात्मकता के संग रहो,
तो अवसर भी बाधा में बदल जाता है।”
इसलिए,
जो भी कार्य करो, पूर्ण विश्वास के साथ करो,
और ऐसे लोगों के साथ रहो जो तुम्हें ऊपर उठाएँ, नीचे न गिराएँ।
क्योंकि जीवन वही है —
जहाँ विश्वास है, वहाँ ईश्वर है;
जहाँ सकारात्मकता है, वहाँ सफलता है;
और जहाँ दोनों साथ हैं, वहाँ शांति, प्रेम और आनंद है।





