पहल : वरिष्ठ डॉक्टर अरविंद माथुर द्वारा अपनी धर्मपत्नी डॉ. आशा माथुर की स्मृति में बनाई केयरगिवर्स आशा सोसाइटी, केयरगिवर्स के समर्थन, सम्मान और सशक्तिकरण की दिशा में बनी आशा का केंद्र
विशेष साक्षात्कार : “करुणा ही असली चिकित्सा है” — डॉ. अरविंद माथुर, संस्थापक, केयरगिवर्स आशा सोसाइटी एवं निदेशक, एशियन सेंटर फॉर मेडिकल एजुकेशन, रिसर्च एंड इनोवेशन (ACMERI)
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अरविंद माथुर। मानवीय करुणा और चिकित्सकीय पेशे के प्रति ईमानदार शख्स। पांच दशक से चिकित्सा क्षेत्र में अपने योगदान से जोधपुर की सेवा करने वाले डॉ. माथुर के सरल और सौम्य व्यक्तित्व ने हमेशा शहरवासियों को अपनी ओर आकर्षित किया है। मुझे याद है जब मेरी मौसी बीमार थीं और चलकर डॉक्टर साहब के चैंबर तक जाने की स्थिति में नहीं थीं तो डॉक्टर माथुर खुद बाहर गाड़ी तक आए और गाड़ी में ही उनका चैकअप किया और ट्रीटमेंट लिखा। अहंकार और गुस्सा उनके व्यक्तित्व में कभी शामिल नहीं रहा। इन दिनों डॉ. अरविंद माथुर सेवानिवृत्ति के बाद केयरगिवर्स आशा सोसाइटी के संस्थापक और एशियन सेंटर फॉर मेडिकल एजुकेशन, रिसर्च और इनोवेशन के निदेशक की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। रविवार को उनसे डॉ. एलएम सिंघवी मानव सेवा केंद्र में विस्तार से बातचीत हुई। बातचीत से पहले डॉ. अरविंद माथुर के साथ केयरगिवर्स आशा सोसाइटी परिसर का अवलोकन किया और स्लाइड के जरिए सोसाइटी और केयरआशा एप की कार्यप्रणाली समझी। इसी सिलसिले में उनसे लिए इंटरव्यू के संपादित अंश प्रस्तुत है-
राइजिंग भास्कर : आप एक वरिष्ठ चिकित्सक और सामाजिक नवप्रवर्तक हैं। सबसे पहले जानना चाहेंगे कि “केयरगिवर्स आशा सोसाइटी” की प्रेरणा आपको कहां से मिली?
डॉ. अरविंद माथुर: यह संस्था मेरे जीवन के बहुत निजी और भावनात्मक अनुभव से जन्मी है। मेरी पत्नी, डॉ. आशा माथुर हमेशा कहती थीं कि “देखभाल सिर्फ इलाज नहीं होती, यह जीवन का एक तरीका है।” जब उनका निधन हुआ, तो मुझे महसूस हुआ कि उनकी यह भावना किसी न किसी रूप में जीवित रहनी चाहिए। इसी विचार से वर्ष 2019 में “केयरगिवर्स आशा सोसाइटी” की स्थापना की गई — उनकी स्मृति में और उनके संदेश को आगे बढ़ाने के लिए।
मैंने अपने लंबे चिकित्सा अभ्यास और अध्यापन के दौरान देखा कि बुजुर्गों, विकलांगों या दीर्घकालिक बीमार व्यक्तियों की देखभाल का भार मुख्यतः परिवारजनों पर होता है। ये वही लोग हैं जो दिन-रात बिना थके सेवा करते हैं, लेकिन उन्हें न सम्मान मिलता है, न मार्गदर्शन। धीरे-धीरे मैंने महसूस किया — जिन्हें सबसे अधिक समर्थन की आवश्यकता है, वही सबसे अधिक अनदेखे हैं। यही सोच हमारी पहल की नींव बनी।
राइजिंग भास्कर : आपने कहा कि देखभालकर्ता यानी Caregivers समाज में अनदेखे रह जाते हैं। आपकी संस्था उनके लिए क्या करती है?
डॉ. अरविंद माथुर: हमारा मूल उद्देश्य तीन शब्दों में समाहित है — “ज्ञान, कौशल और गरिमा।” केयरगिवर्स आशा सोसाइटी इन “देखभाल करने वालों” को प्रशिक्षित करती है, समर्थन देती है, और उनका सामाजिक सम्मान पुनः स्थापित करने का प्रयास करती है। हम यह मानते हैं कि देखभाल कोई दान नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। आज भारत में अधिकांश दीर्घकालिक देखभाल घरों में होती है। जिन परिवारों के बुजुर्ग बीमार होते हैं, वहां कोई डॉक्टर या प्रशिक्षित नर्स हर समय मौजूद नहीं होती। परिवार के सदस्य ही डॉक्टर, नर्स, और साथी — तीनों भूमिकाएँ निभाते हैं। परंतु उन्हें सही जानकारी नहीं होती कि डिमेंशिया वाले व्यक्ति से कैसे संवाद करें, बिस्तर के मरीज को कैसे घुमाएं, या गिरने से कैसे बचाएं। इसी जरूरत ने हमें प्रेरित किया कि हम देखभालकर्ताओं को सशक्त बनाएं — ताकि वे अपने प्रियजनों के साथ-साथ स्वयं के भी मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रख सकें।
राइजिंग भास्कर : इस दिशा में आपकी संस्था का डिजिटल नवाचार “CareAsha App” चर्चा में है। यह एप क्या करता है?
डॉ. अरविंद माथुर: हमने सोचा — क्यों न तकनीक को करुणा का माध्यम बनाया जाए? इस सोच से हमने “CareAsha App” विकसित किया। यह एक निशुल्क, बहुभाषी मोबाइल एप है जो परिवारजनित देखभालकर्ताओं को हर समय मार्गदर्शन देता है। इसमें सरल भाषा में समझाया गया है कि बुजुर्गों या बीमार व्यक्तियों की दैनिक देखभाल कैसे करें।
उदाहरण के लिए —
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अगर बुजुर्ग को डिमेंशिया है, तो उनके व्यवहार को कैसे समझें।
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गिरने से कैसे बचाव करें।
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आपात स्थिति जैसे शॉक, उच्च रक्तचाप, या सांस रुकने पर क्या करें।
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प्राथमिक उपचार, स्वच्छता और पोषण से जुड़ी बातें।
इसके अलावा इसमें तनाव प्रबंधन, आत्म-देखभाल और रिकॉर्ड रखने के तरीके भी हैं।
एक उपयोगकर्ता ने हमें लिखा — “जब मेरी मां को लकवा हुआ, मैं बहुत घबरा गई थी। CareAsha App ने हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन किया। अब मैं आत्मविश्वास से उनकी सेवा करती हूं।” ऐसे संदेश हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। आज यह एप देशभर में हजारों परिवारों के लिए “जेब में मौजूद साथी” बन चुका है।
राइजिंग भास्कर : देखभाल केवल भावना नहीं, कौशल का विषय भी है। आपने केयरगिवर्स के प्रशिक्षण के लिए क्या व्यवस्थाएं की हैं?
डॉ. अरविंद माथुर: बिलकुल। करुणा को ज्ञान और कौशल का सहारा चाहिए। इसी सोच से हमने जोधपुर में ACMERI-ASHA Care Skill Institute स्थापित किया। यह प्रशिक्षण केंद्र Healthcare Sector Skill Council (HSSC) के मानकों के अनुरूप पाठ्यक्रम संचालित करता है। इसमें सिखाया जाता है —
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व्यक्तिगत स्वच्छता और गतिशीलता में सहायता,
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पोषण और दवा प्रबंधन,
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डिमेंशिया और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समझ,
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सहानुभूतिपूर्ण संवाद,
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और सबसे महत्वपूर्ण — सम्मानजनक व्यवहार।
युवाओं को पेशेवर केयरगिवर बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है, ताकि उन्हें रोजगार भी मिले और समाज को कुशल सेवक भी।इसके अलावा हमने एक छह सप्ताह का ऑनलाइन कोर्स भी बनाया है। इसमें इंटरएक्टिव वीडियो, प्रश्नोत्तरी और विशेषज्ञ मेंटरशिप सत्र शामिल हैं। भारत ही नहीं, नेपाल और इंडोनेशिया से भी प्रतिभागी इस कोर्स से जुड़े हैं। इसके प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए हम “Online Caregiver Course Impact Study” भी चला रहे हैं — ताकि पता चल सके कि प्रशिक्षण से देखभालकर्ताओं के आत्मविश्वास, दक्षता और मानसिक संतुलन में क्या बदलाव आता है।
राइजिंग भास्कर : आपकी संस्था का “Future Caregivers Initiative” बहुत सराहा जा रहा है। यह क्या है?
डॉ. अरविंद माथुर: हमारा विश्वास है कि करुणा की शिक्षा बचपन से शुरू होनी चाहिए। इसी विचार से हमने “Future Caregivers Initiative” शुरू किया। यह कार्यक्रम 8वीं से 12वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के लिए है। इसमें हम बच्चों को करुणा, सेवा और संवेदना के मूल्य सिखाते हैं। वे वृद्धाश्रमों का दौरा करते हैं, बुजुर्गों से संवाद करते हैं, और “यंग केयरगिवर प्रतिज्ञा” लेते हैं —“मैं अपने बुजुर्गों का आदर करूंगा, उनकी मदद करूंगा, और उनके अनुभवों से सीखूंगा।” यह पहल अब राजस्थान के कई विद्यालयों में फैल चुकी है और इसे “संवेदना शिक्षा” का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है। बच्चों में जब संवेदना जगती है, तो वे भविष्य में बेहतर चिकित्सक, बेहतर नागरिक, और बेहतर इंसान बनते हैं — यही हमारा उद्देश्य है।
राइजिंग भास्कर : केयरगिवर्स आशा सोसाइटी अब वैश्विक स्तर पर भी चर्चा में है। इस दिशा में आपके कौन-कौन से सहयोग हैं?
डॉ. अरविंद माथुर: हाँ, हमें गर्व है कि आज हमारा कार्य राष्ट्रीय सीमाओं से परे जा चुका है। हम Asian Centre for Medical Education, Research & Innovation (ACMERI) और डॉ. एस.एन. मेडिकल कॉलेज, जोधपुर के साथ साझेदारी में काम कर रहे हैं। इसके साथ ही, हमारी संस्था Global Alliance for Care और World Health Organization (WHO) Civil Society Commission की सक्रिय सदस्य है। वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र के “Summit of the Future” में भारत की सामुदायिक देखभाल मॉडल को प्रस्तुत करने का अवसर मिला। वहां हमारे कार्य को विशेष सराहना मिली। मैंने वहां यही कहा —
“देखभाल दान नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी है। इसे Universal Health Coverage (UHC) का हिस्सा बनाना ही सच्ची प्रगति है।”
राइजिंग भास्कर : किसी वास्तविक कहानी का उदाहरण देना चाहेंगे जो आपकी संस्था की भावना को दर्शाती हो?
डॉ. अरविंद माथुर: ऐसी सैकड़ों कहानियां हैं। एक उदाहरण साझा करना चाहूंगा — श्रीमती लता (परिवर्तित नाम)। उन्होंने अपनी सास की डिमेंशिया स्थिति में देखभाल के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी। शुरुआत में वे अत्यधिक तनाव में थीं, लेकिन हमारे प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ने के बाद उनका दृष्टिकोण बदल गया। वे कहती हैं — “अब मैं थकान नहीं, संतोष महसूस करती हूं। देखभाल मेरे लिए सेवा बन गई है।” ऐसी कहानियां ही हमें याद दिलाती हैं कि परिवर्तन वहीं से शुरू होता है — जहां करुणा ज्ञान से मिलती है।
राइजिंग भास्कर : भविष्य में आप इस पहल को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
डॉ. अरविंद माथुर: हमारा सपना स्पष्ट है — “करुणा से भरा भविष्य।” अगले कुछ वर्षों में हम जयपुर और अन्य शहरों में Care Skill Institutes स्थापित करने जा रहे हैं। इसके साथ ही हम 50 शिक्षण वीडियो और लघु फिल्में तैयार कर रहे हैं — ताकि दूरस्थ गांवों तक प्रशिक्षण सामग्री पहुंच सके। “CareAsha App” में अब बहुभाषी ऑडियो फीचर जोड़ा जा रहा है, ताकि अशिक्षित उपयोगकर्ता भी इसे सुनकर सीख सकें। हम एक Community-Based Care Model पर भी काम कर रहे हैं — जिससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिले और वे अपने गांवों में ही बुजुर्गों की घर पर सेवा कर सकें।
मेरा स्वप्न है — “A City of Compassionate Care” —
एक ऐसा समाज, जहां हर व्यक्ति देखभाल को सामाजिक कर्तव्य माने और हर बुजुर्ग गरिमा के साथ जीवन जिए।
राइजिंग भास्कर : आपके अनुसार, “देखभाल करने वालों की देखभाल” का क्या महत्व है?
डॉ. अरविंद माथुर: यह हमारी संस्था का मूल दर्शन है। जब हम देखभाल करने वालों की परवाह करते हैं — तभी हम वास्तव में समाज की परवाह करते हैं। देखभालकर्ताओं के बिना स्वास्थ्य-प्रणाली अधूरी है। डॉक्टर इलाज करते हैं, लेकिन उपचार का चेहरा वही बनता है जो दिन-रात मरीज के साथ रहता है — यानी केयरगिवर। उनके मानसिक स्वास्थ्य, विश्राम और सम्मान का ध्यान रखना उतना ही जरूरी है जितना मरीज का इलाज। यही कारण है कि हमने कई “Caregiver Support Circles” बनाए हैं, जहां वे अपने अनुभव साझा कर सकते हैं और एक-दूसरे से सहारा पा सकते हैं।
राइजिंग भास्कर : केयरगिवर्स आशा सोसायटी के बारे में और क्या कहना चाहेंगे?
डॉ. अरविंद माथुर: हमारी वेबसाइट www.caregiversashasociety.com पर पूरी जानकारी उपलब्ध है। शास्त्री नगर एच सेक्टर स्थित हमारे सेंटर पर निम्न दो सहयोगियों की सेवा उपलब्ध रहती है-
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मथुरादास माथुर अस्पताल के रिटायर्ड नर्सिंग अधीक्षक हरिसिंह जी,
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और महात्मा गांधी अस्पताल के रिटायर्ड नर्सिंग अधीक्षक सत्यनारायण जी,
राइजिंग भास्कर : अंत में, जो लोग आपकी संस्था से जुड़ना चाहते हैं, वे कैसे संपर्क करें?
डॉ. अरविंद माथुर: बहुत सरल है — हमारी वेबसाइट www.caregiversashasociety.com पर सभी जानकारी उपलब्ध है।
हमारा “CareAsha App” Android और iOS दोनों प्लेटफॉर्म पर मुफ्त डाउनलोड किया जा सकता है। कोई भी व्यक्ति — चाहे वह परिवारजन हो, छात्र, डॉक्टर या नर्स — जो देखभाल के क्षेत्र में योगदान देना चाहता है, उसका स्वागत है।
हमारा संदेश यही है —
“जब आप किसी की देखभाल करते हैं, तो आप केवल एक जीवन नहीं बदलते — आप पूरी मानवता को बेहतर बनाते हैं।” डॉ. अरविंद माथुर का यह प्रयास दिखाता है कि चिकित्सा केवल दवाओं का विज्ञान नहीं, बल्कि करुणा का दर्शन भी है। “केयरगिवर्स आशा सोसाइटी” आज उन लाखों परिवारों के लिए आशा की किरण है, जो प्रेम और सेवा से अपने प्रियजनों की देखभाल कर रहे हैं। डॉ. माथुर की यह सोच — “देखभाल दान नहीं, जिम्मेदारी है” — न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन चुकी है।





