Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 7:35 am

Thursday, July 9, 2026, 7:35 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

प्रधानाध्यापक हरविन्द्रसिंह के पदस्थापन आदेश की प्रतिक्षा और 10 हजार की शास्ति के आदेश को अपास्त करते हुए रिट याचिका स्वीकार की

माध्यमिक शिक्षा विभाग श्रीगंगानगर में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हरविन्द्रसिंह के मामले में राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण के आदेश को अपस्त किया
राइजिंग भास्कर. जोधपुर 
राजस्थान उच्च न्यायालय की एकलपीठ के न्यायाधीश फरजन अली ने माध्यमिक शिक्षा विभाग श्रीगंगानगर में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हरविन्द्रसिंह के पदस्थापन की प्रतीक्षा में करने का आदेश दिनांक 2 जून 2017 एवं राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण द्वारा उसकी अपील को खारिज करते हुए उस पर लगायी गई शास्ति का आदेश 14 जून 2017 को अपास्त करते हुए उसके द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को स्वीकार किया।
सनद रहे माध्यमिक शिक्षा विभाग की राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय बशीर टिब्बी में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हरविन्द्रसिंह को निदेशक माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा 2 जून 2017 को पदस्थापन आदेशों की प्रतिक्षा में किया गया था। इस आदेश से व्यथित होकर उसने एक अपील राजस्थान सिविल सेवा अपील अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत की। अधिकरण ने उसकी अपील को खारिज करते हुए उस पर 10 हजार रुपये की शास्ति का दण्ड का आदेश दिनांक 14 जून 2017 को पारित किया। अधिकरण द्वारा शास्ति का आदेश व उसके पदस्थापन की प्रतिक्षा में किये गये आदेश 14 जून 2017 से व्यथित होकर अपने अधिवक्ता प्रमेन्द्र बोहरा के माध्यम से एक रिट याचिका वर्ष 2017 में पेश की। उक्त रिट याचिका को प्रथमतया उच्च न्यायालय में स्थगन आदेश पारित किया व माध्यमिक शिक्षा विभाग से जवाब तलब किया।

अधिवक्ता प्रमेन्द्र बोहरा के तर्क : अधिकरण ने प्रार्थी पर शास्ति अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर लगाई

उच्च न्यायालय के समक्ष अधिवक्ता का यह तर्क था कि प्रार्थी को पदस्थापन आदेश जो पारित किया गया है वह राजस्थान सेवा नियम 25(ए) के विरुद्ध पारित किया गया है। राजस्थान सेवा नियम में जो प्रावधान दिये गये है, उसमें उसका आदेश कहीं पर लागू नहीं होता है। दूसरा अधिकरण ने प्रार्थी पर जो शास्ति लगाई गई है वो अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर लगाई है। अधिकरण ने आदेश 14 जून 2017 से प्रार्थी की अपील को खारिज करते हुए उसके ऊपर 10 हजार रुपये की शास्ति लगाई व यह शास्ति राशि उसके आगामी माह के वेतन में से काटने का आदेश पारित किया। प्रार्थी के अधिवक्ता का यह तर्क था कि किसी के वेतन में से किसी प्रकार की कटौती करना दण्ड की परिभाषा में आता है व किसी राज्य कर्मचारी को दण्ड देने से पहले राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) सेवा नियम 1958 की पालना करना आवश्यक है एवं सजा सक्षम अधिकारी/ नियुक्ति अधिकारी या अनुशासनात्मक अधिकारी द्वारा ही नियमों की पालनानुसार एवं सुनवाई का अवसर दिये जाने पश्चात दी जा सकती है। वर्तमान प्रकरण में अधिकरण न तो याचिकाकर्ता का न तो नियुक्ति अधिकारी है न ही अनुशासनात्मक अधिकारी है, इसके बावजूद भी उसके अधिकरण द्वारा शास्ति राशि का दण्ड जो दिया गया है व नियम विरुद्ध एवं राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) सेवा नियम 1958 के विरुद्ध है।
प्रार्थी के अधिवक्ता के तर्कों से सहमत होते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के पदस्थापन आदेश की प्रतिक्षा के आदेश दिनांक 2 जून 2017 को राजस्थान सेवा नियम के नियम 25(ए) के विरुद्ध माना व अधिकरण के द्वारा 10 हजार रुपये की शास्ति के आदेश दिनांक 14 जून 2017 को अधिकरण के अधिकार क्षेत्र से परे मानते हुए निरस्त करते हुए उसके द्वारा प्रस्तुत रिट याचिका को स्वीकार किया।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor