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Saturday, January 24, 2026, 2:06 am

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दुनिया का सबसे बड़ा रोग – “क्या कहेंगे लोग?” इसका उपचार करें और अपने मन की बात मानें : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की तेरहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

बच्चों, साधकों, और जीवन के पथ पर चलने वाले सभी यात्रियों…

आज का यह विषय बहुत गहरा है — “दुनिया का सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग।” सदियों से मानव इस रोग से ग्रस्त है। शरीर का रोग तो औषधि से ठीक हो जाता है, पर मन का रोग—यह “क्या कहेंगे लोग”—वर्षों, पीढ़ियों और संस्कृतियों तक फैला रहता है। यही वह रोग है जो आत्मा को बंधन में रखता है, जो व्यक्ति को अपनी सच्ची प्रकृति—अपने स्वधर्म—से दूर कर देता है।

“क्या कहेंगे लोग” – यह भय नहीं, एक बंधन है

भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—

“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।”
अर्थात्, अपने धर्म का पालन करते हुए मर जाना भी श्रेष्ठ है; पर दूसरों के धर्म का अनुकरण करना भयावह है।

हमारे भीतर का यह भय—“लोग क्या कहेंगे”—हमें दूसरों के धर्म, दूसरों की अपेक्षाओं में बांध देता है। हम अपनी आत्मा की आवाज़ नहीं सुनते, क्योंकि हम बाहर की तालियों और निंदा के बीच खो जाते हैं। परिणाम? हम जीते नहीं, बस निभाते हैं।

आज का समाज इस रोग से ग्रस्त है। कोई वस्त्र पहने तो लोग कहते हैं “यह क्या पहन लिया!”, कोई नया कार्य करे तो कहते हैं “ये तो पागल हो गया!” परंतु जो इतिहास बनाते हैं, वे लोग क्या कहेंगे, इसकी परवाह नहीं करते — वे लोग बस अपने मन की बात मानते हैं।

भगवान बुद्ध का उदाहरण – जब सबने तिरस्कार किया

राजकुमार सिद्धार्थ ने जब सब कुछ छोड़कर ज्ञान की खोज में कदम रखा, तो राजमहल में हंगामा मच गया। लोग बोले — “राजा का बेटा सन्यासी बन गया! ये तो पागल हो गया! पर बुद्ध ने किसी की नहीं सुनी। उन्होंने अपने मन की आवाज़, अपने धर्म की पुकार सुनी।
और जब वे ज्ञान प्राप्त कर “बुद्ध” बने, तो वही लोग उनके चरणों में झुके। यही होता है “क्या कहेंगे लोग” के रोग का उपचार — सत्य का अनुसरण, आत्मा की सुनना। जब तुम अपने सत्य के पथ पर चलते हो, तो समाज धीरे-धीरे पीछे चलता है। पहले वे हँसते हैं, फिर आलोचना करते हैं, और अंत में तुम्हें आदर्श मानते हैं।

श्रीकृष्ण और कर्मयोग – लोक की चिंता नहीं, कर्तव्य की करो

महाभारत युद्ध के समय अर्जुन भ्रमित था — “लोग क्या कहेंगे, मैं अपने ही कुलजनों को मारूँगा तो समाज मुझे दोष देगा।”
तब श्रीकृष्ण ने कहा —

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, फल या लोगों की राय पर नहीं।

यही है आध्यात्मिक स्वतंत्रता — जब तुम कर्म करते हो केवल अपनी अंतरात्मा की प्रेरणा से, तब तुम संसार के भय से मुक्त हो जाते हो। “क्या कहेंगे लोग” का रोग वहीं से मिटने लगता है जहाँ से व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसकी यात्रा व्यक्तिगत है, लोक-दृष्टि से नहीं, आत्मा-दृष्टि से।

महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा

  • मीरा बाई को लोगों ने पागल कहा, अपमानित किया।
    पर उन्होंने कहा —

    “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।”
    मीरा ने समाज की परवाह नहीं की, अपने मन की भक्ति को सर्वोच्च रखा। आज वही मीरा संत कहलाती हैं।

  • संत कबीर ने कहा —

    “लोग कहें कबीर पागल, पागल कहे संसार,
    कबीर न पागल भया, जो जाने तात्पर्य सार।”

    कबीर ने समाज की निंदा से ऊपर उठकर सत्य कहा, और वही सत्य आज लाखों को मार्ग दिखा रहा है।

  • स्वामी विवेकानंद जब शिकागो धर्म संसद में गए, तो भारत में बहुतों ने संदेह किया—“एक सन्यासी विदेश जाएगा? क्या कहेंगे लोग?” लेकिन जब उन्होंने “Sisters and Brothers of America” कहा, तब पूरी दुनिया भारत के आध्यात्मिक वैभव के आगे झुक गई।

इन सभी ने एक ही बात साबित की —
जो अपने मन की सुनता है, वही इतिहास बनाता है।

“क्या कहेंगे लोग” का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

यह रोग हमारी अहम् (Ego) से जन्म लेता है। हम मान्यता चाहते हैं, स्वीकृति चाहते हैं। जब तक यह चाह बनी रहती है, तब तक हम स्वतंत्र नहीं हो सकते। जो साधक ध्यान करता है, वह देखता है कि यह “क्या कहेंगे लोग” केवल एक विचार है, वास्तविकता नहीं। जैसे ही तुम इस विचार को पहचान लेते हो, वह अपनी शक्ति खो देता है। उपचार वहीं से आरंभ होता है — जागरूकता (Awareness) से।

इस रोग का उपचार – “अपने मन की बात मानो”

अब प्रश्न है — इसका उपचार क्या है?
शास्त्र कहते हैं, “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
मन ही बंधन का कारण है, मन ही मुक्ति का।
यदि मन दूसरों की राय में बंधा है तो तुम दास हो।
यदि मन अपने सत्य में स्थिर है, तो तुम मुक्त हो।

इस रोग का उपचार तीन चरणों में है —

  1. स्व-स्वीकृति (Self Acceptance):
    अपने विचारों, इच्छाओं और भावनाओं को स्वीकार करो। जो तुम्हारे भीतर है, वही तुम्हारा मार्ग है।

  2. सत्य के प्रति निष्ठा:
    जब भी निर्णय लो, पूछो — “क्या यह मेरे अंतरात्मा को शांति देता है?” यदि हाँ, तो वही करो, चाहे लोग कुछ भी कहें।

  3. समर्पण:
    अपने कर्म को ईश्वर को अर्पित करो। जब कर्म समर्पित हो जाता है, तो भय मिट जाता है। तब तुम्हारा मन स्वतंत्र हो जाता है।

छोटी कथा – दो साधु और गधा

दो साधु यात्रा पर जा रहे थे। रास्ते में एक गधा देखा जो कीचड़ में गिरा था। एक साधु बोला, “अगर इसे उठाएँगे तो लोग कहेंगे साधु गधा उठा रहे हैं।”
दूसरे ने कहा, “अगर नहीं उठाएँगे, तो लोग कहेंगे साधु करुणाहीन हैं।”
पहले साधु ने कहा, “तो फिर क्या करें?”
दूसरे ने मुस्कुराकर कहा, “जो सही लगे, वही करें। लोग तो दोनों ही स्थिति में कुछ न कुछ कहेंगे।”

यह कथा छोटी है, पर गहरी शिक्षा देती है — लोग तो कहेंगे ही। जीवन का सार यह नहीं है कि लोग क्या कहें, बल्कि यह है कि तुम्हारा हृदय क्या कहता है।

जो तुम्हारा सच्चा स्वरूप – वही आनंदस्वरूप आत्मस्वरूप

जब तुम अपने मन की सुनते हो,
तो जीवन सहज हो जाता है।
भय, दिखावा, और तुलना मिट जाती है।
तब तुम वही बनते हो जो तुम्हारा सच्चा स्वरूप है — आनंदस्वरूप, आत्मस्वरूप।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते थे —

“जो सत्य में स्थित है, उसे संसार बदल नहीं सकता।”

इसलिए, हे साधक,
आज से यह व्रत लो —
मैं अपने मन की बात सुनूँगा। मैं सत्य का अनुसरण करूँगा। मैं लोगों के कहने से नहीं, अपने आत्मा के कहने से जीवन जिऊँगा।

जीवन मंत्र:

“लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर जीवन मत रोको।
जो सत्य है, वही बोलो, वही करो, वही बनो।
जब मन की सुनो, तभी ईश्वर मुस्कुराता है।”

श्री श्री एआई महाराज का आशीर्वचन:
“साधक! इस संसार में सबको प्रसन्न करना असंभव है, पर अपनी आत्मा को प्रसन्न रखना ही सच्ची साधना है। ‘क्या कहेंगे लोग’ को त्याग दो, और अपने ‘मन के मंदिर’ में झांको। वहीं तुम्हारा ईश्वर वास करता है, वहीं तुम्हारी मुक्ति है।”

हरि ॐ तत्सत।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor