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Thursday, July 9, 2026, 4:18 am

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हिंदू धर्म प्रचार-प्रसार फाउंडेशन की पहल— “सड़क से संस्कार तक : निर्धन श्रमिकों के बच्चों के जीवन में शिक्षा की नई रोशनी”

जोधपुर के पूर्वी पाल सेक्टर-सी में हिंदू धर्म प्रचार-प्रसार फाउंडेशन ने उठाया अनोखा बीड़ा — मजदूरों के बच्चों को शिक्षा, संस्कार और देशभक्ति की राह पर अग्रसर करने का संकल्प

दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर 

9783414079 diliprakhai@gmail.com

जोधपुर की औद्योगिक नगरी में जहां दिन भर फैक्ट्रियों की मशीनें गूंजती रहती हैं, वहीं उन्हीं फैक्ट्रियों के बाहर कुछ नन्हें जीवन अपनी दिशा खोजने को भटकते रहते थे। ये वही बच्चे हैं जिनके माता-पिता सुबह से शाम तक मेहनत की रोटी कमाने के लिए मजदूरी पर निकल जाते हैं। बच्चे दिन भर बासनी द्वितीय चरण और नई श्रमिक (डर्बी) कॉलोनी की गलियों में बेसहारा घूमते रहते थे। कोई ताश की गड्डी में किस्मत तलाश रहा था, कोई नशे की धुंध में बचपन खो रहा था, तो कोई सड़क किनारे चोरी-छिपे वक्त काट रहा था। लेकिन इस अंधेरे के बीच एक दीया जल उठा — हिंदू धर्म प्रचार-प्रसार फाउंडेशन के रूप में।

भटकते बचपन को मिली दिशा

पूर्वी पाल सेक्टर-सी स्थित इस फाउंडेशन ने जब इस समाजिक समस्या को देखा, तो उन्होंने इसे नजरअंदाज नहीं किया। संस्था के डायरेक्टर पंडित भूपेंद्र मन्ढोली ने बताया कि एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे पास की फैक्ट्रियों के बाहर खेलते-खेलते झगड़ रहे थे। पूछने पर पता चला कि वे किसी स्कूल में नहीं जाते। उनके माता-पिता सुबह काम पर चले जाते हैं और शाम को लौटते हैं, तब तक बच्चे सड़कों पर समय बिताते हैं। यहीं से मन्ढोली जी के मन में विचार आया — “अगर इन बच्चों तक शिक्षा नहीं जा सकती, तो शिक्षा को इनके पास लाया जाए।”

संस्था का संकल्प — “हर बच्चे तक पहुंचे शिक्षा का दीप”

इस सोच को साकार रूप देने के लिए फाउंडेशन ने बासनी द्वितीय चरण, नई श्रमिक कॉलोनी में एक छोटा-सा शिक्षा केंद्र शुरू किया। शुरुआत में यह कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था। बच्चों को बैठाना, ध्यान केंद्रित करवाना, पढ़ाई के प्रति रुचि जगाना — सब कुछ नया और कठिन था। लेकिन फाउंडेशन के स्वयंसेवकों ने हिम्मत नहीं हारी।

धीरे-धीरे बच्चों को खेल-खेल में अक्षर सिखाए जाने लगे। उन्हें कहानी सुनाने, चित्र बनाने और नाटक के माध्यम से नैतिक मूल्य समझाने का प्रयास किया गया। आज इस केंद्र में बच्चे रोजाना शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

शिक्षा के साथ संस्कार भी

पंडित भूपेंद्र मन्ढोली कहते हैं —

“हमारा उद्देश्य केवल बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें संस्कारवान और जिम्मेदार नागरिक बनाना है। शिक्षा तभी सार्थक है जब वह चरित्र का निर्माण करे।”

संस्था बच्चों को प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ संस्कार शिक्षा भी देती है। उन्हें ‘नमस्ते’ बोलना, बड़ों का सम्मान करना, साफ-सफाई रखना, दूसरों की मदद करना, और देश के प्रति गर्व महसूस करना सिखाया जाता है।
हर दिन की शुरुआत “वंदे मातरम्” और “भारत माता की जय” के उद्घोष से होती है। बच्चों को कहानियों के माध्यम से भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, चाणक्य, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी जैसे आदर्शों से परिचित कराया जाता है।

फैक्ट्री मजदूरों की उम्मीद की किरण

इन बच्चों के माता-पिता, जो सुबह से शाम तक मेहनत करते हैं, आज चैन की सांस ले पा रहे हैं। एक मजदूर ने बताया कि —

“पहले मेरा बेटा दिन भर सड़कों पर घूमता था। अब वह पढ़ने जाता है। घर आकर हमें भी कहानियाँ सुनाता है और कहता है कि अब वह बड़ा होकर पुलिस वाला बनेगा।”

इसी तरह एक मजदूर महिला ने बताया कि —

“पहले मेरी बेटी जिद करती थी बाहर खेलने जाने की, अब रोज समय पर क्लास जाती है। उसे अब अक्षर पहचानने आने लगे हैं। मुझे गर्व होता है कि वह कुछ सीख रही है।”

देशभक्ति और संस्कृति का संगम

संस्था का यह केंद्र केवल पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि संस्कृति और देशभक्ति का विद्यालय बन चुका है। यहां हर सप्ताह बच्चों को भारतीय पर्वों और त्यौहारों का महत्व बताया जाता है। रक्षा बंधन पर बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं, गणेश चतुर्थी पर मिट्टी से गणेश जी की मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, और स्वतंत्रता दिवस पर बच्चे तिरंगा लहराते हुए देशभक्ति गीत गाते हैं। संस्था का मानना है कि “संस्कृति से जुड़ाव ही सच्ची शिक्षा का आधार है।” बच्चों को यह सिखाया जाता है कि “भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक परिवार है।”

संघर्ष से सेवा तक की कहानी

फाउंडेशन की शुरुआत कुछ ही स्वयंसेवकों से हुई थी। न तो कोई बड़ा फंड था, न कोई सरकारी सहयोग। फिर भी पंडित भूपेंद्र मन्ढोली और उनकी टीम ने दृढ़ निश्चय किया कि किसी एक बच्चे का भी जीवन संवर गया तो यह प्रयास सफल माना जाएगा।
उन्होंने समाज के जागरूक नागरिकों से सहयोग मांगा — किसी ने किताबें दीं, किसी ने स्लेट-पेंसिल, तो किसी ने बच्चों के लिए नाश्ते की व्यवस्था कर दी। आज धीरे-धीरे यह छोटा प्रयास एक आंदोलन का रूप ले रहा है। जोधपुर और आसपास के कई समाजसेवी इस मुहिम से जुड़ना चाहते हैं।

बदलते चेहरे, बदलती कहानियाँ

अब जो बच्चे पहले सड़क किनारे झगड़ते थे, वही अब “अ, आ, इ, ई” लिखना सीख रहे हैं। कोई कविताएँ याद कर रहा है, तो कोई अपने छोटे भाई को भी साथ लाया है। कई बच्चों में अद्भुत परिवर्तन देखा गया है — वे अब चोरी-छिपे खेलने या गलत संगत में समय बिताने की बजाय शिक्षा की राह पर चलने लगे हैं। संस्था का सपना है कि आने वाले वर्षों में ये बच्चे सरकारी विद्यालयों में प्रवेश लेकर आगे पढ़ाई जारी रखें।

भविष्य की दिशा — “हर झुग्गी में शिक्षा”

हिंदू धर्म प्रचार-प्रसार फाउंडेशन अब अपने इस मॉडल को शहर के अन्य श्रमिक इलाकों में भी लागू करने की योजना बना रहा है।
पंडित भूपेंद्र मन्ढोली बताते हैं —

“हम चाहते हैं कि कोई भी बच्चा अंधकार में न रहे। हमारा लक्ष्य है कि जोधपुर के हर श्रमिक क्षेत्र में ऐसा एक केंद्र खुले, ताकि शिक्षा हर झुग्गी तक पहुंचे।”

भविष्य की आहट सुनाई दे रही 

यह कहानी केवल कुछ बच्चों की नहीं, बल्कि एक विचार की जीत की कहानी है। एक ऐसा विचार जो मानता है कि परिस्थितियाँ नहीं, दृष्टिकोण जीवन बदलता है। जहां समाज ने इन बच्चों को नजरअंदाज किया, वहीं हिंदू धर्म प्रचार-प्रसार फाउंडेशन ने उन्हें अपनाया।
आज इन गलियों में जहां पहले शोर और झगड़े गूंजते थे, वहीं अब बच्चों की मधुर आवाजें सुनाई देती हैं —“गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा…”

ये स्वर सिर्फ प्रार्थना नहीं, बल्कि भविष्य की आहट हैं —
एक ऐसे भारत की, जहां हर बच्चा शिक्षित, संस्कारवान और देशभक्त होगा।

फाउंडेशन से संपर्क का पता :

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor